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राज्य कृषि समाचार (State News)

रायपुर : रायगढ़ का ‘केलो’ जंवाफूल चावल बना ब्रांड, देशभर में बढ़ी मांग; बेंगलुरु से कारगिल तक पहुंची खुशबू

04 अप्रैल 2026, रायपुर: रायपुर : रायगढ़ का ‘केलो’ जंवाफूल चावल बना ब्रांड, देशभर में बढ़ी मांग; बेंगलुरु से कारगिल तक पहुंची खुशबू – छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र का ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल अब अपनी विशिष्ट सुगंध, स्वाद और उत्कृष्ट गुणवत्ता के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली यह धान की किस्म आज किसानों के लिए आय का मजबूत माध्यम बनती जा रही है। प्रशासन और कृषि विभाग के सहयोग से इस उत्पाद को संगठित रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे इसकी पहुंच स्थानीय बाजार से निकलकर देश के विभिन्न हिस्सों तक हो गई है। जैविक पद्धति से की जा रही खेती और बेहतर विपणन व्यवस्था ने इसकी लोकप्रियता को लगातार बढ़ाया है।

छत्तीसगढ़ सरकार, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और कृषि मंत्री राम विचार नेताम के मार्गदर्शन में किसानों की आय बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। कृषि उन्नति योजना और भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना जैसी पहल से किसानों को आर्थिक मजबूती मिली है। यही कारण है कि अब किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ जंवाफूल जैसी लाभकारी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।

कृषि विभाग के अनुसार, जंवाफूल धान की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है, जो लैलूंगा की विशेष जलवायु में विकसित होती है। दिन में गर्मी और रात में हल्की ठंडक इस फसल की गुणवत्ता को खास बनाती है। यही वजह है कि इस चावल की मांग छत्तीसगढ़ से बाहर भी तेजी से बढ़ रही है और यह बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना, लद्दाख और कारगिल जैसे क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। वर्तमान में इसका बाजार मूल्य करीब 150 रुपये प्रति किलो है, जिससे किसानों को बेहतर लाभ मिल रहा है।

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किसानों को मिल रहा बेहतर मुनाफा

लैलूंगा के किसान चंद्रशेखर पटेल बताते हैं कि जंवाफूल चावल की खेती अब उनके लिए लाभ का सौदा बन गई है। उन्होंने इस वर्ष 4 एकड़ में खेती कर प्रति एकड़ 1 लाख रुपये से अधिक की आय प्राप्त की। कम लागत, कम पानी की जरूरत और बेहतर बाजार मिलने से किसान इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

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जैविक खेती से बढ़ी मांग

ग्राम खैरबहार के किसान भवानी पंडा पूरी तरह जैविक पद्धति से खेती करते हैं। वे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बजाय हरी खाद का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। जैविक उत्पादन होने के कारण उपभोक्ताओं के बीच इस चावल की मांग लगातार बढ़ रही है।

खेती का तेजी से हो रहा विस्तार

प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बीज उपलब्ध कराया जा रहा है। किसान समूहों और एफपीओ के माध्यम से उत्पादन और विपणन को संगठित किया जा रहा है। पिछले वर्ष जहां करीब 700 एकड़ में इसकी खेती हुई थी, वहीं इस वर्ष इसे बढ़ाकर 2000 एकड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे अधिक से अधिक किसान इस लाभकारी फसल से जुड़ सकें।

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