आईटी नौकरी छोड़कर दक्षिण कन्नड़ में रैंबुतान-मैंगोस्टीन की खेती, अब ₹60 लाख तक सालाना टर्नओवर
22 सितंबर 2026, सुलिया (दक्षिण कन्नड़, कर्नाटक): आईटी नौकरी छोड़कर दक्षिण कन्नड़ में रैंबुतान-मैंगोस्टीन की खेती, अब ₹60 लाख तक सालाना टर्नओवर – बेंगलुरु में करीब आठ साल आईटी क्षेत्र में नौकरी करने के बाद 2017 में अपने गांव लौटे चेतन शेट्टी आज रैंबुतान, मैंगोस्टीन और सुपारी जैसी प्रीमियम फसलों की खेती से सालाना ₹25 से 60 लाख तक का टर्नओवर हासिल कर रहे हैं। दक्षिण कन्नड़ जिले के सुलिया तालुक के बेल्लारे गांव में उनका “अवे मंजण्णा शेट्टी फैमिली फार्म्स” आज विदेशी फलों की खेती का एक जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।
35 वर्षीय चेतन ने बेंगलुरु में नौकरी के दौरान ही किराए के घर में शौकिया तौर पर मशरूम उगाकर आसपास के होटलों को बेचना शुरू किया था। इसी शौक ने उन्हें खेती की ओर मोड़ दिया और आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़कर अपनी 11 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर पूरी तरह खेती करने का फैसला किया।
11 एकड़ में विदेशी फलों का बगीचा
आज उनके खेत में 650 रैंबुतान के पेड़, 100 से ज्यादा मैंगोस्टीन के पेड़, एवोकाडो, 2,500 से अधिक सुपारी के पेड़, काली मिर्च की 800 बेलें, नारियल के 300 पेड़ और हल्दी की खेती एक साथ हो रही है। खेत के आधुनिकीकरण में उन्होंने अब तक करीब ₹18 लाख का निवेश किया है।
इस विविधता का नतीजा यह है कि अकेले सुपारी से ही उन्हें हर साल करीब ₹12 लाख की स्थिर आय मिल जाती है। रैंबुतान बाजार में ₹200 से 400 प्रति किलो और मैंगोस्टीन पीक सीजन में ₹750 प्रति किलो तक बिकता है। कुल मिलाकर उनका सालाना टर्नओवर ₹25 से 60 लाख के बीच रहता है, जिसमें से शुद्ध मुनाफा करीब ₹15 लाख तक पहुंचता है।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती और तकनीक से समाधान
हर सफलता की तरह चेतन के रास्ते में भी चुनौतियां आईं। जलवायु परिवर्तन के असर से उनका रैंबुतान उत्पादन साल 2022 के 5,500 किलो से घटकर 2024 में सिर्फ 400 किलो रह गया था।
इस झटके से उबरने के लिए उन्होंने मौसम के अनुकूल फसल प्रबंधन अपनाया और बेंगलुरु, मुंबई, पुणे, दिल्ली, अमृतसर व हैदराबाद तक अपने फलों को पहुंचाने के लिए मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क खड़ा किया। साथ ही उन्होंने Zepto और Farmizen जैसे एग्री-टेक प्लेटफॉर्मों से भी साझेदारी की, ताकि फल सीधे शहरी ग्राहकों तक पहुंच सकें।
चेतन कहते हैं, “यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है, बल्कि अपने काम से मिलने वाले सुकून की बात है।” वे आगे बताते हैं कि रैंबुतान की बिक्री से हुई कमाई से ही उन्होंने गांव में अपना नया घर बनाया है।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture


