इंदौर कृषि महाविद्यालय के विस्थापन का विरोध जारी

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28 जुलाई 2022, इंदौर । इंदौर कृषि महाविद्यालय के विस्थापन का विरोध जारी – कृषि महाविद्यालय, इंदौर की ज़मीन छीनकर उसे अन्यत्र विस्थापित करने का मुद्दा इन दिनों गरमाया हुआ है।  कृषि के वर्तमान और पूर्व छात्रों के धरना और विरोध प्रदर्शन के समर्थन में विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं,संयुक्त किसान मोर्चा और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के आने से विरोध का स्वर और मुखर हो गया है ।

उल्लेखनीय है कि करीब एक सदी पुरानी कृषि अनुसन्धान की ज़मीन पर शहर सघन वन विकसित करने के नाम पर इंदौर कृषि महाविद्यालय की भूमि हथियाने की कवायद एक बार फिर शुरू हो गई है। गत दिनों जिले के प्रशासनिक अधिकारियों ने कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता से महाविद्यालयीन गतिविधियों एवं अनुसन्धान कार्यों की जानकारी ली थी। स्मरण रहे कि इंदौर के कृषि महाविद्यालय की ज़मीन को जबरन लेने की कोशिश पहले भी दो बार हो चुकी है। पहले मेट्रो प्रोजेक्ट और उसके बाद जिला अदालत के नए भवन के लिए भी यह ज़मीन लेने के प्रयास किए गए थे,जिसका राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्व विद्यालय , ग्वालियर , महाविद्यालय प्रबंधन , विद्यार्थियों के संगठन और भारतीय किसान संघ ने संयुक्त रूप से विरोध किया, तो फिर यह मामला ठंडा पड़ गया था। यही नहीं तब यह ज़मीन लेने के मामले में पद्मश्री स्वर्गीय कुट्टी मेनन ,पद्मश्री श्री भालू मोढ़े और किसान नेता श्री शिव कुमार कक्काजी ने भी विरोध दर्ज़ कराया था।

अब तीसरी बार कृषि महाविद्यालय की इस ज़मीन पर  शहर सघन वन विकसित करने के नाम पर लेने और कृषि महाविद्यालय को कहीं और विस्थापित करने  के सरकारी प्रयास शुरू हुए हैं, जिनका कृषि के वर्तमान और पूर्व छात्रों द्वारा निरन्तर धरना प्रदर्शन कर विरोध किया जा रहा है। इस विरोध में अब विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ता के शामिल होने से कृषि छात्रों को बल मिला है। आंदोलन के समर्थन में गत दिनों पूर्व केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री और कांग्रेस नेता श्री अरुण यादव शासकीय कृषि महाविद्यालय पहुंचे थे।श्री यादव ने इस महाविद्यालय में हुए विभिन्न अनुसंधान और विभिन्न बीजों की कई किस्में  विकसित होने का जिक्र कर कहा कि उसी संस्थान को अब साजिश के तहत खत्म किया जा रहा है। यह मालवा-निमाड़ के किसानों और कृषि विद्यार्थियों के साथ धोखा है। इंदौर के शासकीय कृषि महाविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाने की तैयारी हो चुकी थी, लेकिन राज्य सरकार इंदौर में विश्वविद्यालय बनाने के बजाय महाविद्यालय की जमीन छीनना चाह रही है। यह मामला विधानसभा में उठाया जाएगा सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर भी महाविद्यालय पहुंचीं थी और उन्होंने भी आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन कर सम्बोधित किया था। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता भी इसके विरोध में है। अब संयुक्त किसान मोर्चा ने भी विरोध कर छात्रों कोसमर्थन देने का फैसला किया है।

इंदौर कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ शरद चौधरी ने कृषक जगत को बताया कि गत दिनों जिला प्रशासन के अधिकारियों के दल ने कृषि महाविद्यालय में की जा रही गतिविधियों की जानकारी लेकर महाविद्यालय का मुआयना किया था। बाद में कृषि महाविद्यालय ने जिला प्रशासन को सौंपे अपने प्रतिवेदन में अपना पक्ष रखते हुए करीब सौ साल पुराने,124 हेक्टर में फैले महाविद्यालय के ऐतिहासिक महत्व, 550 छात्रों के शिक्षण, जारी कृषि गतिविधियों, अनुसंधान कार्यों और दीर्घावधि की परियोजनाओं की विस्तृत जानकारी देकर बताया कि यहां जारी गतिविधियों से ग्रीन ज़ोन तो बनता ही है,ऑक्सीज़ोन स्वतः निर्मित होता है। तापमान भी सुधरता है और प्रदूषण की भी समस्या नहीं रहती है।

यहां इस बात का उल्लेख प्रासंगिक है कि एल्युमनी एसोसिएशन, एग्री अंकुरण संस्था एवं किसान संगठन लम्बे अर्से  से इंदौर कृषि महाविद्यालय को कृषि विश्व विद्यालय बनाने की मांग कर रहे हैं। जिस पर कृषि मंत्री श्री कमल  पटेल ने सहमति देते हुए आश्वस्त कर कहा था कि इंदौर कृषि महाविद्यालय को कृषि विश्व विद्यालय बनाया जाएगा, इस प्रस्तावित कृषि विश्वविद्यालय का कार्यक्षेत्र संपूर्ण मालवा एवं निमाड़ क्षेत्र रहेगा। नया कृषि विश्वविद्यालय आने से इस क्षेत्र में एग्रीकल्चर की नई रिसर्च का रास्ता खुलेगा एवं बहुत सारे रिसर्च स्कॉलर निकलेंगे। श्री पटेल ने तो इंदौर में बनने वाले कृषि विश्वविद्यालय का नामकरण  श्री अटल बिहारी वाजपेयी कृषि विश्वविद्यालय भी कर दिया था। लेकिन एक साल में ही समय ने ऐसी करवट बदली कि जिस कृषि महाविद्यालय को कृषि विवि बनाया जा रहा था , उसे ही विस्थापित करने की तैयारी की जा रही है। यह विरोधाभासी स्थिति विचारणीय है। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि अनुसंधान से जुड़ी भूमि की संरचना तैयार होने में वर्षों लग जाते हैं ,ऐसे में यदि इस कृषि महाविद्यालय को अन्यत्र विस्थापित कर भी दिया गया, तो अनुसन्धान के कार्यों में तो बाधा आएगी ही, जो प्रयोग अभी चल रहे हैं उसके नतीजों पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।अनुसन्धान कार्यों के लिए अनुकूल ज़मीन आसानी से कहाँ मिलेगी? यदि कहीं मिल भी गई, तो फिर इस विस्थापन का क्या औचित्य रहेगा ? इस पर सरकार को विचार करने की ज़रूरत है।

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