राज्य कृषि समाचार (State News)

सरंक्षित खेती में पौध संरक्षण

डाॅ आशीष कुमार त्रिपाठी, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र,सागर-।।, दवरी (म.प्र.)

20 दिसंबर 2025, भोपाल: सरंक्षित खेती में पौध संरक्षण – जलवायु परिवर्तन की परिस्थ्तिि में पाली हाउस एवं शेड नेट हाउस में किसान सरंक्षित खेती अपनाकर प्रकृतिक आपदा से फसल नुकसान से बचाया जा सकता है ग्रीन हाउस कृषि श्रेष्ठ आधुनिक कृषि तकनीक के रूप में आई है जिसके प्रयोग से उन जगहों पर भी फसलों का उत्पादन संभव हुआ जहाँ पहले संभव न था। कृषि में फसलों के लिये उचित पर्यावरण प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है जिसके फलस्वरूप उत्पादकता की उच्चतम सीमा प्राप्त हो सके। ग्रीन हाउस कृषि से फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता बढ़ी है। पॉलीहाउस तकनीक द्वारा उगाई गई सब्जियों की गुणवता बहुत अच्छी होती है और अच्छे दाम मिलते हैं, खासकर जब बेमौसम में इनका उत्पादन किया जाये इसलिए यह तकनीक हमारे देश में सब्जी उत्पादकों के लिए वरदान सिद्ध हो रही है तथा तेजी से प्रचलित भी हो रही है I

ग्रीन हाउस के अन्दर फसलोत्पादन में खासकर सब्जी उत्पादन में प्रजाति या चयन एक महत्त्वपूर्ण कारक है, इसलिये ग्रीनहाउस में अच्छी गुणवत्ता वाले अधिक उपज देने वाली संकर प्रजातियों का ही उपयोग करना चाहिए। ग्रीन हाउस में उत्पादित सब्जियों में टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च, सलाद, हरी प्याज, बंदगोभी, सेम, मटर पालक, बैंगन, भिंडी, कद्दू मूली आदि मुख्य हैं। फूलों में गुलाब कार्नेशन, जरबेरा, गुलदाउदी, बिगोनिया आदि मुख्य हैं। अच्छी गुणवत्ता युक्त स्ट्राबेरी भी ग्रीनहाउस में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है।

सिंचाई के लिये बूँद-बूँद सिंचाई विधि का प्रयोग लाभप्रद होता है। ग्रीनहाउस के अन्दर सफाई अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि पुरानी पत्तियों आदि को न निकालने से रोग आक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। खीरा व टमाटर जैसी फसलों में प्रूनिंग व ट्रेनिंग की भी आवश्यकता होती है। वैसे तो अवांछित वृद्धि व पुरानी पत्तियों को निकालने के लिये प्रत्येक फसल में प्रूनिंग की आवश्यकता पड़ती है। कीट-व्याधि नियंत्रण के लिये समय पर कीटनाशक व फफूंदीनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहना चाहिए। ग्रीनहाउस के अंदर एकलिंगाश्रयी पौधों के लिये पर-परागण की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य हाथ से किया जाता है। परागण के लिये मादा फूल के ऊपर नर फूल के परागण को छोड़ देते हैं, इससे फल प्रतिशत भी बढ़ जाता है। यह कार्य प्रातः 8-10 बजे तक किया जाता है।

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ग्रीन हाउस तकनीक स¢ उगायी जाने वाली सब्जियों में कई प्रकार के रोगों, कीडों-मकोड़ांे एवं निमेटोड का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। इसलिए ग्रीन हाउस एवं पॉलीहाउस में कीटों तथा रोगों के प्रबन्धन में कम से कम तथा आवश्यकतानुसार रसायनों का प्रयोग करें और इसके साथ-साथ जैविक नियंत्रण विधि भी अपनाएं इस तरह एकीकृत प्रबन्धन करते हुए हम भूमि की उत्पादकता लम्बे समय तक बना कर रख सकते हैं ।

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भूमि का उपचार:-पॉलीहाउस में या अन्य जगह भूमि का उपचार दो तरह से किया जा सकता है, जैसे- सौर ऊर्जा द्वारा एवं जैविक विधि द्वारा ।

जैविक विधि से पौध संरक्षण

पौधशाला का स्थान प्रति वर्ष बदल दें

जैविक विधि द्वारा भूमि उपचार:-

अ) ट्राईकोडरमा से पौध उपचार:- ट्राईकोडरमा विरिडी या ट्राईकोडरमा हारजिएनम फफूद पौधे की जड़ के चारों तरफ सुरक्षित परत बन जाती है जिससे हानिकारक फफूंद आक्रमण नही कर सकती। पौध को लगाने से पहले 200 ग्राम ट्राईकोडरमा प्रति 20 लीटर पानी में घोल कर 10 मिनट तक डुबो कर रखें ।

ट्राईकोडरमा से भूमि उपचार:- 1 से 2 किलोग्राम ट्राईकोडरमा को 1 किंवटल नमी वाली तथा अच्छी तैयार हुई गोबर की खाद में मिलाकर, छायावाली जगह में 10 से 15 दिन तक पॉलीथीन शीट से ढककर रख दें हर तीसरे दिन इस मिश्रण को पलटते रहना चाहिए ताकि ट्राईकोडरमा सुचारू रूप से पनप सके इस तरह यह मिश्रण (एक क्विटल) एक एकड़ भूमि में बिखेर कर मिट्टी में मिला दें

ब) सूडोमोनास द्वारा पौध तथा भूमि उपचार – सूडोमोनास फ्लोरिसेन्स जीवाणु पाऊडर फॉर्मूलेशन का उपयोग जीवाणु मुझन तथा जड़गांठ सूत्रकृमि आदि रोगों में लाभकारी है I

बीज का उपचार- 10 ग्राम ‘सूडोमोनास पाऊडर को 100 से 200 मिलीलीटर पानी में घोलकर पेस्ट बना लें तथा 1 किलोग्राम बीज को इस पेस्ट से उपचारित करें I

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नर्सरी में क्यारियों का उपचार- 50 ग्राम स्यूडोमोनास को प्रति लीटर पानी में घोलकर प्रति वर्ग मीटर की दर से क्यारियों का उपचार करेंद्य
भूमि उपचार- यदि आप बहुवर्षीय फसल उगा रहे हैं, तो बीज बोने के 30, 60 तथा 90 दिन बाद 20 ग्राम सूडोमोनास प्रति लीटर पानी में घोलकर भूमि की ड्रेचिंग करें I

सीधा या प्रत्यक्ष फील्ड में प्रयोग- 1 से 2 किलोग्राम स्यूडोमोनास को 100 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाएं तथा अब उचित नमी वाले मिश्रण को 15 दिन तक छाया में रहने दें, 15 दिन के बाद मिश्रण को दो टन गोबर की खाद में मिलाकर एक एकड़ क्षेत्र में प्रयोग करें I

सरंक्षित खेती में हानिकारक कीटों का नियंत्रण

ग्रीन नेट हाउस एवं पाॅली हाउस को स्वच्छ रखें व खरपतवारों को नष्ट करना चाहिए। खरपतवार मुक्त रखें ताकि कीटों का आश्रय खत्म हो जाये।

बुवाई पूर्व खेत में मृदा उपचार हेतु 50 कि.ग्रा. गोबर की पकी खाद में मोटाराइजियम एनासोफ्लाई द्वगुणित कर जमीन में फैल जाए तत्पष्चात इसे एक एकड़ क्षेत्र में फैलाकर मिलाये ।
रस चूसक कीटों से बचाव हेतु बीज को बोने के पहले इमिडाक्लोप्रिड 600 एफÛ एस़Û (48 प्रतिशत) अथवा थायोमेथोक्सेम 70 डब्ल्यू.पी. की 3 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति कि.ग्रा. बीज का उपचार कर बोयें इससे 25-30 दिनों तक रसचूसक कीटों का प्रकोप नहीं होता और उस समय तक प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती है।

रसचूसक कीटों से बचाव हेतु पीले व नीले चिपचिपे प्रपंच 150 प्रति है. के मान से लगायें।

प्रकाष प्रपंच (160 वाट मर्करी वेपर वल्व वाला) के उपयोग से प्रतिदिन प्रौढ़ कीटों को नष्ट करें।

ग्रीन नेट हाउस एवं पाॅली हाउस में 8-10 फेरोमेन ट्रेप लगायें जिससे नर कीट के प्रौढ़ों को प्रजनन से रोका जा सके। यदि 8 पंतगे प्रतिदिन लगातार तीन दिन तक मिले तब इसके नियंत्रण की कार्यवाही शुरू कर देनी चाहिए।

हरी इल्ली, फल छेदक कीट की रोकथाम हेतु बुबाई के 35-40 दिन बाद जैविक कीटनाशी एन.पी.व्ही. 250 एल.ई. प्रति हेक्टेयर या वैसीलस थूरिजियेल्सिस 1000 ग्राम प्रति हेक्टेयर के मान से शाम के समय छिड़काव किया जा सकता है।

खड़ी फसल में इमिडाक्लोप्रिड 50 मि.ली. सफेद मक्खी के लिए ऐसिटामिप्रिड 50 ग्राम मात्रा 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

सौर ऊर्जा के उपयोग से पौधशाला की भूमि को रोगाणु रहित करें

पौधशाला में क्यारियां बनाने से एक महीना पहले नीम की खली 500 ग्राम से 1 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से अच्छी तरह मिट्टी में मिला दें और बाद में मिट्टी की सिंचाई कर लें

पौधशाला में स्वस्थ व प्रमाणित बीजों का ही प्रयोग करें

बीजों को पौधशाला में बोने से पहले भूमि में जैविक फफूंदनाशक ‘ट्राईकोडरमा विरिडी’ गोबर की खाद में मिलाकर 50 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से डालें I

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