अब मंडियों में अलग-अलग बिकेंगी प्राकृतिक और रासायनिक फसलें
30 जून 2025, भोपाल: अब मंडियों में अलग-अलग बिकेंगी प्राकृतिक और रासायनिक फसलें – मध्यप्रदेश में प्राकृतिक खेती को लेकर अब सरकार नई दिशा में कदम बढ़ा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि राज्य की मंडियों में अब प्राकृतिक और रासायनिक तरीकों से उगाई गई फसलों की अलग-अलग व्यवस्था की जाएगी। यानी उपज की बिक्री और खरीद के समय पहचान में कोई कठिनाई न हो, इसके लिए दोहरी व्यवस्था की जाएगी।
मुख्यमंत्री जबलपुर के मानस भवन में आयोजित ‘प्राकृतिक खेती के नाम एक चौपाल’ कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में प्राकृतिक खेती की संभावनाएं काफी व्यापक हैं और इसके लिए योजनाएं तैयार की जाएंगी। मुख्यमंत्री ने कृषि मंत्री को निर्देश दिए कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं बनाई जाएं।
डॉ. यादव ने यह भी कहा कि पश्चिमी सोच के प्रभाव में रासायनिक खेती को बढ़ावा मिला, लेकिन अब भारतीय ज्ञान और गौ-आधारित खेती की ओर फिर से लौटने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “मैंने खुद खेती की है और रासायनिक खादों के बिना खेती का अनुभव किया है। अब हम गौशालाओं के माध्यम से प्राकृतिक खेती को फिर से जीवन में लाना चाहते हैं।”
दूध में ‘देशी बनाम विदेशी’ बहस भी छेड़ी गई
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने दुग्ध उत्पादन का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य में दुग्ध उत्पादन को 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। फैट के आधार पर दूध खरीद की व्यवस्था को लेकर उन्होंने सवाल उठाया और दावा किया कि देशी गाय के दूध को नजरअंदाज किया गया है जबकि भैंस के दूध को अधिक लाभदायक बताया गया।
“प्राकृतिक खेती जीवन के लिए वरदान” – आचार्य देवव्रत
इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि उन्होंने स्वयं 5 एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती की शुरुआत की थी और पहले ही साल बेहतर उत्पादन मिला। उन्होंने कहा कि जंगलों में बिना खाद-पानी के पेड़ फले-फूले रहते हैं, उसी तरह खेती भी प्राकृतिक तरीके से की जा सकती है। उन्होंने आगाह किया कि रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता घटती है और कीट मित्र जीव नष्ट हो जाते हैं।
देवव्रत ने किसानों से अपील की कि वे रासायनिक खेती से दूरी बनाएं और प्रकृति से जुड़ें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जैविक और प्राकृतिक खेती में फर्क है, और किसानों को सही जानकारी देकर उन्हें जागरूक किया जाना चाहिए।
लोक निर्माण मंत्री बोले – “प्राकृतिक खेती सिर्फ कल्पना नहीं, वैज्ञानिक आधार है”
लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती को सिर्फ परंपरागत ज्ञान मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने ऋषि पाराशर द्वारा रचित ‘वृक्षोर्वेद’ और ‘बृहद संहिता’ का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्षा पूर्वानुमान जैसे विषयों पर भी हमारे पारंपरिक ग्रंथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।
किसानों में दिखा उत्साह, बड़ी संख्या में पहुंचे कार्यक्रम में
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों की उपस्थिति रही। इसके अलावा कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंषाना, महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू, सांसद सुमित्रा बाल्मीकि और अजय विश्नोई सहित कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी भी मौजूद थे।
सरकार की ओर से प्राकृतिक खेती के प्रति यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब देशभर में रासायनिक खेती के दुष्परिणामों को लेकर चिंता बढ़ रही है। अब देखना यह होगा कि मंडियों में फसलों के लिए बनाई जा रही दोहरी व्यवस्था और प्राकृतिक खेती को लेकर बनने वाली योजनाएं जमीनी स्तर पर कितना असर डालती हैं।
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