फसल की खेती (Crop Cultivation)राज्य कृषि समाचार (State News)

बैंगन के प्रमुख रोग, लक्षण एवं एकीकृत प्रबंधन

लेखक:धनेश्वरी साहू, डॉ. विनोद कुमार निर्मलकर, डॉ. आर.के.एस. तिवारी एवं डॉ. एस.के. वर्मा क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र बिलासपुर, छत्तीसगढ़

31 अगस्त 2026, भोपाल: बैंगन के प्रमुख रोग, लक्षण एवं एकीकृत प्रबंधन – बैंगन सब्जी की एक मुख्य फसल है इससे अधिक उपज व आमदनी के लिये यह आवश्यक होता है कि इसमे होने वाले रोगों का समय पर पहचान कर नियंत्रण विधि अपनाये जाये ।

1. आर्द्र गलन (Damping-off):-

लक्षण: यह बीमारी पौधशाला में लगती है इसमे कुछ बीज जमने के पहले ही सड़कर मर जाते है और कुछ जमने के बाद गलकर गिर जाते है। यह बीमारी बरसात के समय और अधिक उग्र हो जाती है।

प्रबंधनः

  1. बुवाई से पहले जून-जुलाई की तेज धूप में क्यारियों को 30 दिनों के लिए 250 गेज की पारदर्शी पॉलीथीन से ढक दें, जिससे हानिकारक फफूंद नष्ट हो जाते हैं।
  2. एक ही भूमि पर लगातार पौधशाला नही बनाना चाहिऐ ।
  3. नर्सरी में बीजों को बहत घने न बोएं. अन्यथा नमी के कारण रोग जल्दी फैलता है।
  4. नर्सरी में पानी को कर Page 1 / दें सिंचाई हमेशा वारविधि या हल्की करें।
  5. बीजों को बहुत घने न बोएं और क्यारियों (Raised beds) को जमीन से थोड़ा ऊंचा रखें।
  6. मई-जून मे पौधशाला की मिटटी को पॉलीथीन से ढ़ककर आंशिक रूप से रोगकारक फफूँद से मुक्त कर ले। उसके पश्चात नर्सरी बेड को कैप्टान की 3 ग्राम प्रति ली. घोल बनाकर अच्छी तरह भिगा ले। अथवा मृदा उपचार हेतु ट्राइकोडर्मा विरिडी का 2 किलोग्राम को 1 क्विंटल गोबर की खाद में मिलाकर 15 दिन छाया में रखे फिर मृदा तैयार करके उसमें मिला दें।
  7. रोग से बचाव के लिये बीजों को बोआई पुर्व 2.5 ग्राम प्रति कि. की दर से थायरम अथवा कार्बेन्डाजिम अथवा 10 ग्राम प्रति किलो की दर से ट्राइकोडर्मा विरिडी से उपचार करना चाहिये।
  8. बीज के जमने के बाद 2 पत्ते वाले अवस्था में एक बार पुनः कैप्टान का 2 ग्राम प्रति ली. का घोल बनाकर अच्छी तरह पौधशाला में छिडकाव कर दें।

2.फोमोप्सिस अंगमारी (Phomopsis Blight):-

लक्षण : यह बैगन की प्रमुख बीमारी है जो पत्तियों के गुच्छों और फलों को प्रभावित करता है। संक्रमित पत्तियों पर छोटे- छोटे गोलाकार धब्बे उभर आते है जो अनियमित आकार के साथ सलेटी से भूरे रंग के होते है। जिसके कारण पौधे के प्रभावित भाग में अंगमारी हो जाती है। संक्रमित फलों पर छोटे-छोटे, डूबे हुए, हल्के और धूमिल धब्बों के लक्षण दिखाई देते है जो बाद में सड़ा हुआ क्षेत्र बनने के लिए एक दूसरे में मिल जाते है। बुरी तरह से संक्रमित फलों का गूदा सड़ जाता है।

प्रबंधनः

  1. खेत में 3 से 4 साल का फसल चक्र अपनाएं। इस दौरान बैंगन, टमाटर या मिर्च जैसी फसलों को न दोहराएं।
  2. पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखें (जैसे पंक्तियों में 60 सेमी) और जल निकासी की अच्छी व्यवस्था करें।
  3. खेत में अधिक सिंचाई से बचें। खेत में जलभराव न होने दें, क्योंकि नमी और गर्म मौसम इस फंगस के लिए अनुकूल होते हैं।
  4. रोगमुक्त पौधों से प्राप्त बीजों को पौधे लगाने के लिए उपयोग करना चाहिए।
  5. खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखने पर 2-3 ग्राम प्रति ली. की दर पर कार्बेन्डाजिम 12% + मैन्कोजेब 63% WP अथवा 2 ग्राम प्रति ली. की दर पर क्लोरोथालोनिल के साथ छिड़काव करें।
  6. रोग के नियंत्रण के लिए जिनेब 75% WP का 1.5 2 किलोग्राम को 750 से 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  7. रोग नियंत्रण के लिए डाईफेनोकोनाजोल 03% WS का 250 ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर अथवा इप्रोडियोन 50% WP का 2.25 3 किलोग्राम को लगभग 1000 लीटर पानी में मिलाकर अथवा पाइराक्लोस्ट्रोबिन 20% WG का 500 ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

3. अल्टरनेरियों पर्ण चित्तियों (Alternaria Leaf Spot):

लक्षणः इस रोग के कारण विशिष्ट प्रकार के केंद्रीय गोलों के साथ पर्ण चित्तियों बन जाती है। ये धब्बे अधिकतर अनियमित होते है और पत्तियों के काफी बड़े क्षेत्र को घेर लेते है। बहुत ज्यादा प्रभावित पत्तियाँ गिर जाती है प्रभावित फलों पर इसके लक्षण बड़े गहरे धब्बों के रूप में दिखाई पड़ते है संक्रमित फल पीले पड़ जाते है और असमय ही गिर जाते है।

    प्रबंधनः

    1. पौधे के प्रभावित भागों को हटाकर नष्ट कर देना चाहिए।
    2. गर्मियों में गहरी जुताई करें। रोग के अवशेषों (पुरानी पत्तियों और टहनियों) को इकट्ठा करके जला दें या नष्ट कर दें।
    3. पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखें ताकि हवा का संचार अच्छा हो और नमी कम रहे, जिससे फफूंद न पनपे।
    4. पत्तियों को गीला करने के बजाय हमेशा जड़ों में पानी दें। सुबह के समय सिंचाई करें।
    5. रोग नियंत्रण के लिए डाईफेनोकोनाजोल 03% WS का 250 ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर अथवा इप्रोडियोन 50% WP का 2.25 3 किलोग्राम को लगभग 1000 लीटर पानी में मिलाकर अथवा पाइराक्लोस्ट्रोबिन 20% WG का 500 ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

    4. जीवाणुजन्य म्लानी (Bacterial Wilt):-

    लक्षण : इसके विशिष्ट लक्षण पत्तियों के गुच्छे के मुरझाने के बाद पूरे पौधे का नष्ट हो जाना है इस रोग में पौधा का पीला पडना, पूरे पौधा या कुछशाखाओं का सुख कर अचानक मर जाना प्रमुख पहचान है।

      प्रबंधनः

      1. रोग के प्रति सहनशील किस्मों जैसे अर्कानीलकंठ, अर्कानिधि, बनारस ज्यांटग्रीन, एस. एम. 56 आदि का प्रयोग करना चाहिए।
      2. रोग नियंत्रण के लिए खेत में कम से कम 3 वर्षों तक बैंगन या अन्य सोलेनेसी (जैसे- टमाटर, मिर्च) कुल की फसलें न लगाएं। इसके बजाय धान या भिंडी या लोबिया या गोभी वर्गीय फसलों को शामिल करें
      3. संक्रमित पौधों को जड़ सहित तुरंत उखाड़ कर नष्ट कर दें। खेत की गहरी जुताई करके धूप लगने दें ताकि जीवाणु नष्ट हो सकें।
      4. बैगन की रोपाई हमेशा उठी हुई क्यारियों (Raised beds) पर करें ताकि जलभराव न हो। जलभराव से जीवाणु तेजी से फैलते हैं।
      5. निराई-गुड़ाई करते समय ध्यान रखें कि पौधों की मुख्य जड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे (घाव होने से जीवाणु अंदर प्रवेश करते हैं)।
      6. बोआई से पहले बीजों को 30 मिनट के लिए 1 ग्राम/4 ली. पानी की दर पर स्ट्रेप्टोसायक्लिन के घोल में डुबोना चाहिए अथवा 2-3 ग्राम/ली. पानी की दर पर कार्बेन्डाजिम 12% + मैनकोजेब 63 % WP तथा 7 ग्राम / एकड़ की दर पर स्ट्रेप्टोसायक्लिन के साथ मृदा को भिगोए या छिड़के।
      7. मृदा उपचार के लिए स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस 1.0% WP का 2.5 किलोग्राम को 02 क्विंटल गोबर खाद के साथ मिलाकर 15 दिन छाया में रखें एवं मृदा तैयार करके प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करके तुरंत पानी का छिड़काव करे।

      5. बैंगन की छोटी पत्ती (Little Leaf of Brinjal):-

      लक्षण: प्रारंभ मे संक्रमित पौधों की पत्तियाँ हलके पीले रंग की होती है। पत्तियों आकार मे छोटी एवं बेढंगापन दिखती है। रोगग्रस्त पौधे छोटी डीलडौल तथा स्वस्थ पौधे की अपेक्षा ज्यादा षाखाओं, जडों और पत्तियों वाले होते है। वृत छोटे हो जाते है, पत्तियों के केंद्र में कई कलियों उभर आती है और पोरियों भी छोटी हो जाती है, जिससे पौधों का रूप झाडीनुमा हो जाती है। फूलों के हिस्से बेढंगे होते है संक्रमित पौधा पर फल नही लगते है। किंतु यदि कोई फल लग जाए, तो वह कठोर हो जाता है और पकता नही।

      प्रबंधनः

      1. रोगरोधी किस्में पूसा क्लस्टर, मंजरी गोटा आदि लगाये ।
      2. संक्रमित पौधो को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए ।
      3. खेत और उसके आसपास मौजूद खरपतवारों (जैसे जंगली बैंगन) को हटाते रहें, जो इन कीटों के वैकल्पिक मेजबान होते हैं।
      4. फसल चक्र में बैंगन के बाद दूसरी फसलें (जैसे अनाज वाली फसलें) उगाएं।
      5. कीटों का संचरण रोकने के लिए एसीफेट 75% एस. पी. की 400 500 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए।
      6. मेटासिस्टाक्स या रोगर की 002 मि. ली. दवा प्रति ली. पानी में घोल कर छिड़काव करे

      6. जड़ विगलन सूत्रकृमि (Root Knot Nematode):-

      लक्षण : संक्रमित पौधे की जड़ों पर छोटी-बड़ी गांठदार सूजन बन जाती है। जड़ें सामान्य से अधिक मोटी, सिकुड़ी हुई और विकृत हो जाती हैं। पौधे की बढ़वार अचानक रुक जाती है और वे बौने रह जाते हैं। पर्याप्त पानी और खाद देने के बावजूद, पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और समय से पहले गिरने लगती हैं। तेज धूप में पौधे अक्सर मुरझा जाते हैं क्योंकि नेमाटोड जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पौधे पानी और पोषक तत्व अवशोषित नहीं कर पाते। फूल झड़ने लगते हैं और बैंगन का आकार छोटा रह जाता है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है।

      प्रबंधनः

      1. खेत में हमेशा एक ही फसल न उगाएं। बैंगन के बाद गेंदा या धान जैसी फसलें लगाने से नेमाटोड की संख्या कम होती है।
      2. गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें, जिससे नेमाटोड धूप से नष्ट हो जाएं।
      3. लक्षण दिखने पर पेसिलोमाइसिस का 2 लीटर प्रति एकड़ की दर से सिचाई पानी के साथ या ड्रिप के माध्यम से जड़ के पास दें।

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