राज्य कृषि समाचार (State News)किसानों की सफलता की कहानी (Farmer Success Story)

मध्यप्रदेश: स्ट्रॉबेरी की खेती ने बदली बड़वानी के किसान की तकदीर, लाखों में पहुंची आमदनी  

09 मार्च 2026, भोपाल: मध्यप्रदेश: स्ट्रॉबेरी की खेती ने बदली बड़वानी के किसान की तकदीर, लाखों में पहुंची आमदनी – कहते हैं कि अगर किसी बात को जुनून बना लिया जाए, तो असंभव को भी सम्भव किया जा सकता हैं। ऐसी ही कहानी है बड़वानी जिले के ग्राम सालीटांडा के युवा प्रगतिशील किसान हिमांशु डावर की। जिस फल को कभी दुकानदार ने यह कहकर देने से मना कर दिया था कि तुम नहीं खरीद पाओगे, आज हिमांशु उसी स्ट्रॉबेरी की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं और जिले में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं।

उन्होंने साबित किया है कि यदि संकल्प और सही तकनीक का साथ हो, तो खेती मुनाफे का सौदा बन सकती है। युवा कृषक  हिमांशु डावर आज क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। 1000 पौधों से शुरू हुआ सफर हिमांशु ने अपने नवाचार की शुरुआत वर्ष 2019 में की थी। इन्टरनेट और परिचितों से मिली जानकारी उपरांत उन्होंने मात्र 1000 पौधों के साथ प्रयोग शुरू किया था। आज, 7 वर्षों के कड़े अनुभव और मेहनत के बाद, वे 1.5 एकड़ भूमि पर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। इस वर्ष उन्होंने पुणे से लाई गई उन्नत विंटर डाउन प्रजाति के 16,000 पौधे रोपे हैं।

इस सीजन में अब तक लगभग 40 क्विंटल स्ट्रॉबेरी का उत्पादन हो चुका है, जिसकी तुड़ाई मार्च-अप्रैल तक निरंतर जारी रहेगी। स्थानीय बाजारों के अलावा इंदौर और खरगोन जैसे शहरों में स्ट्रॉबेरी मांग अनुसार विक्रय करते हैं। उद्यानिकी विभाग से उन्हें राज्य स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। साथ ही वर्ष 2023-24 में उन्हें आत्मा परियोजना के तहत जिला स्तरीय उद्यानिकी कृषक पुरस्कार से भी नवाजा गया। शासकीय योजनाओं का मिला संबल हिमांशु की सफलता में शासन की योजनाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

वर्ष 2025-26 के लिए एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत 0.50 हेक्टेयर स्ट्रॉबेरी की खेती हेतु ₹24,000 की सब्सिडी भी स्वीकृत की गई है। साथ ही राज्य योजना के तहत 1.25 हेक्टेयर हेतु ₹60,000 का अनुदान प्राप्त हुआ। जिससे वह स्ट्रॉबेरी की खेती के साथ इंटरक्रॉपिंग के तहत संतरे की बागवानी भी कर हैं। हिमांशु की यह सफलता की कहानी दर्शाती है कि कैसे आधुनिक तकनीक और शासन की योजनाओं के समन्वय से किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं। उनकी यह उपलब्धि जिले के अन्य किसानों को भी पारंपरिक फसलों के स्थान पर बागवानी फसलों को अपनाने की ओर प्रेरित कर रही है। 

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