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राज्य कृषि समाचार (State News)

आओ फिर से दीप जलाएं

संस्कृत से आए ‘दीपावली’ शब्द का अर्थ है। ‘प्रकाश की श्रृंखला’ दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक पर्व है। दीप हमारी सनातन और शाश्वत शक्ति का प्रतीक है। युग बीते लेकिन एक चीज जो स्थाई है वह है दीपों की आराधना, अर्चना। मनुष्य को ज्योतिर्मय करने का दायित्व इस दीप ने वहन किया है।

दीपक शब्द की बारीकी समझें तो ‘दीप्यते दीपयति वा स्वं परं च’ अर्थात् जो स्वयं प्रकाशित हो तथा दूसरों को भी प्रकाशित करे उसे दीपक कहते हैं। शब्द कल्पद्रुम आदि ग्रंथों में इनके बारह नाम दिये है यथा दीप, प्रदीप, स्नेहाश, दीपक, कज्जलध्वज, शिखातरू, गृहमणि, ज्योसना वृक्ष, दरोन्धन, दोषातिलक, दोषास्य और नयनोत्सव।

ऋषि कहते हैं दीपक की एक, दो बाती सुख-शांति बढ़ाती हैं, तीन वृतिकाएं  त्रिवर्ग धन, अर्थ और काम साधन करती है, चार वृतिकाएं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चार पुरूषार्थ सुलभ कराती है। पांच बातियाँ सभी पाप को नष्ट करती हैं। ग्यारह बातियाँ सर्वसौभाग्य प्रदायिनी होती है और हजार बातियाँ राजयोग सुलभ कराती हैं।

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दीपावली के दिन कम से कम 9 दिये अवश्य जलायें। माता वैष्णोदेवी के 9 रूप है और देवी लक्ष्मी के भी 9 रूप हैं। एक जलता हुआ दीया स्नेह बिखराता है हर्ष और उल्लास लुटाता है और रिश्तों की लौ को महकाने का संदेश देता है। दीपक अपने होने पर गर्व और सिर उठाकर हर अंधेरे को दूर करता है। वह हर हाल में अपने मकसद पर डटे रहने का संदेश भी देता है शांति से। दीप का बाहरी हिस्सा गर्म होता है और अंदर का कम तापमान रखता है अर्थात् आग बाहर पर मन तो शांत हो। दीप से सीखें तो दीपावली संपूर्ण हो। उसका उजास दिल के आंगन में उतार लें तो जीवन सम्पूर्ण हो दीपक प्रकाश का जनक, ज्ञान का प्रतीक और वातावरण का शोधक होता है। अंधकार हो न हो दीप जलेगा तो उजाला तो होगा। एक सादा दीपक भी शानदार लौ कर सकता है। दीप दिखता कैसा है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दीप माटी का हो पीतल का या चांदी का जब तक जले नहीं तब तक केवल पात्र  है। दैदीप्यमान हो जाये तो दीप है। उजास है रोशनी है, राह दिखाने वाला है दीपक का  उजाला दूर से ही नजर आ जाता है, यह अपने आकार, सुंदरता, निर्माण से नहीं कर्तव्य से चमकता है।

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पंचतत्व से निर्मित यह काया एक दीपक की तरह है, इसमें ममता रूपी स्नेह अर्थात् तेल रहता है स्नेह और तेल पर्यायवाची शब्द है। जब तक मनुष्य के जीवन में स्नेह रहता है, उसका जीवन मूल्यवान बना रहता है। दीप जलाएं संबंधों, संवेदना और प्यार के, दीप जलाएं आशा के, दीप जलाएं, खुशियों के, धैर्य, संतोष के, उम्मीदों के। उजाले बिखेर दो और सब रोशन कर दो जिससे रंग भी दिखे, राह भी दिखे आंखों का भरोसा और अपनों की उष्मा और स्नेह नजर आये। सिर्फ अपना ही दीपक न जलाएं, बल्कि एक दीपक पड़ोसी के लिये, मित्र के लिये, रिश्तेदार के लिये, शुभचिंतकों के लिये भी जलाएं।
अटल जी की अंधेरे पर चोट करती कविता की
पंक्तियां यूं हैं-

आओ फिर से दीप जलाएं,
भरी दुपहरी में अंधियारा,
सूरज परछाई से हारा,
अंतरतम का नेह निचोड़े,
बुुझी हुई बाती सुलगाएं,
आओ फिर से दीप जलाएं।

  • डॉ. साधना गंगराड़े