मानव एवं कृषि दोनों के लिए नुकसानदेह खरपतवार गाजर घास

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23 अगस्त 2022, बालाघाट: मानव एवं कृषि दोनों के लिए नुकसानदेह खरपतवार गाजर घास – गाजर घास ना केवल खेती को नुकसान पहुंचा रहा है अपितु हमारे स्वास्थ्य को भी बहुत नुकसान पहुंचाता है एवं इसके कारण मनुष्यों में त्वचा से संबंधित अनेकों रोग से एलर्जी एग्जिमा एवं बुखार तथा दमा जैसी बीमारियां भी होती है, पशुओं के लिए यह खरपतवार विषैला होता है ण् इस खरपतवार के कारण भूमि की उत्पादकता बड़ी तेजी से कम होती है एवं यह खरपतवार जहां उगता है वहां पर कई तरह के अन्य खरपतवार समाप्त हो गए हैं इसमें बीजों की संख्या भी बहुत अधिक मात्रा में होती है इस कारण यह तेजी से फैलता है। इस प्रकार की जानकारी कृषि वैज्ञानिकों ने गत दिनों गाजर घास खरपतवार के उन्मूलन के लिए जागरूकता अभियान में दी ण् कृषि विज्ञान केंद्र बालाघाट द्वारा 16 अगस्त से 22 अगस्त के बीच गाजर घास खरपतवार के उन्मूलन के लिए जागरूकता अभियान का आयोजन वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. आर.एल. राऊत के अगुवाई में आयोजित किया गया। अभियान के दौरान कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. एन.क.े बिसेन ए उपसंचालक कृषि श्री राजेश खोबरागडे पादप प्रजनन वैज्ञानिकएडॉ. उत्तम बिसेन कृषि महाविद्यालय बालाघाट एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ आर एल राऊत के द्वारा किसानों को गाजर घास से होने वाले नुकसान एवं उनके नियंत्रण के तौर तरीकों के बारे में जानकारी प्रदान की गई।

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उपसंचालक कृषि श्री खोबरागड़े ने बताया कि यह हमारी खेती को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है और एक बार जिस खेत में इसका आक्रमण हो जाए तो नियंत्रण करना बहुत मुश्किल होता हैण् कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. आर.एल. राऊत ने बताया कि गाजर घास के नियंत्रण के लिए फूल आने के पहले ही इन्हें खेतों से उखाड़ कर नष्ट कर दें गाजर घास से प्रभावित क्षेत्रों में खरपतवार नाशक रसायन ग्लाइफोसेट 1ः का घोल या मेट्रिब्यूजीन 3ः का घोल या 2, 4 क् का घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है गाजर घास को बीज बनने के पूर्व उखाड़ कर इसका कंपोस्ट बनाकर खेती के लिए लाभ के रूप में उपयोग किया जा सकता हैं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के खरपतवार अनुसंधान निदेशालय जबलपुर द्वारा मैक्सिकन बीटल के उपयोग द्वारा इसे खत्म करने की सलाह दी जाती है ण्हमारे किसान भाई जबलपुर के निदेशालय से बीटल प्राप्त कर सकते हैं कृषि विज्ञान केंद्र बालाघाट के अन्य वैज्ञानिक डॉ. एस.आर. धुवारे एवं डॉ रमेश अमूले ने जागरूकता कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सहयोग प्रदान किया।

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