मिट्टी से मंच तक गूंजा युवाओं का स्वरः नाट्य, कला और गीतों में सजी कृषि संस्कृति
20 जनवरी 2026, ग्वालियर: मिट्टी से मंच तक गूंजा युवाओं का स्वरः नाट्य, कला और गीतों में सजी कृषि संस्कृति – राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर में आयोजित अंतर महाविद्यालय युवा महोत्सव 2025दृ26 (उद्गार दृ मिट्टी से मंच तक) के दूसरे दिन विश्वविद्यालय परिसर रचनात्मकता, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया। दिन की शुरुआत एकांकी नाटक (वन एक्ट प्ले) प्रतियोगिता से हुई, जिसने दर्शकों को सोचने, समझने और संवेदनाओं से जुड़ने पर मजबूर कर दिया।
एकांकी नाटकों में कृषि आधारित कथानकों के माध्यम से किसानों की समस्याएं, जल संकट, बदलता मौसम, कर्ज़ का बोझ और आधुनिक तकनीक के समाधान प्रभावशाली संवादों के साथ प्रस्तुत किए गए। मंच से जब एक पात्र ने कहा:
“अगर खेत सूख जाएंगे तो शहर की थाली भी खाली रह जाएगी,”
तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
वहीं एक अन्य संवाद ने दर्शकों को झकझोर दिया।
“किसान भीख नहीं, सम्मान चाहता है।”
इन नाट्य प्रस्तुतियों में कृषि महाविद्यालय ग्वालियर, कृषि महाविद्यालय इंदौर, बी.एम. कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर खंडवा, आर.ए.के. कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर सीहोर एवं कॉलेज ऑफ हॉर्टीकल्चर मंदसौर के विद्यार्थियों ने अपनी अभिनय क्षमता और विषय की गहराई से सभी को प्रभावित किया।
नाट्य प्रतियोगिता के पश्चात विश्वविद्यालय परिसर रंगों और विचारों के संगम में बदल गया। रंगोली, पोस्टर मेकिंग, कोलाज, स्पॉट पेंटिंग, क्विज एवं कार्टूनिंग प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने समकालीन विषयों पर अपनी सोच को कलात्मक रूप दिया।
कोलाज प्रतियोगिता में “साइबर सुरक्षा”, पोस्टर मेकिंग में “सोशल मीडिया एडिक्शन”, रंगोली में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और कार्टूनिंग में “वन नेशन, वन इलेक्शन” जैसे विषयों पर बनी कृतियों ने दर्शकों को रुककर सोचने पर मजबूर कर दिया।
एक छात्रा ने अपनी रंगोली की ओर इशारा करते हुए कहाः “यह सिर्फ रंग नहीं, हमारी सोच है।” दिन के उत्तरार्ध में संगीत की मधुर लहरें पूरे परिसर में फैल गईं। एकल गीत, देशभक्ति गीत, भारतीय समूह गीत और लोकगीत प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने माहौल को भावुक और ऊर्जावान बना दिया। जब लोकगीत की पंक्तियां गूंजीः “माटी बोले, मेहनत बोले,” तो श्रोता खुद को तालियों से रोक नहीं पाए।
महोत्सव के दूसरे दिन आयोजित इन विविध प्रतियोगिताओं ने यह साबित कर दिया कि आज का युवा न केवल तकनीकी रूप से सक्षम है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सरोकारों के प्रति भी सजग है। यह आयोजन विद्यार्थियों के लिए केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति, आत्मविश्वास और संस्कृति से जुड़ने का मंच बनकर उभरा। कुल मिलाकर, “उद्गार: मिट्टी से मंच तक” का यह दिन विश्वविद्यालय के इतिहास में रचनात्मकता और युवाशक्ति की एक सशक्त मिसाल के रूप में दर्ज हो गया।
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