धान की उत्पादकता से जलवायु-सहनशील खेती तक : हाइब्रिड राइस का नया रोडमैप
इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) के प्रिंसिपल साइंटिस्ट से कृषक जगत की विशेष बातचीत
28 सितंबर 2026, भोपाल: धान की उत्पादकता से जलवायु-सहनशील खेती तक : हाइब्रिड राइस का नया रोडमैप – भारत में धान की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ धान का क्षेत्र कम करने की भी आवश्यकता है। इसके लिए सामान्य किस्मों की तुलना में अच्छे हाइब्रिड से लगभग 25–30 प्रतिशत अधिक उत्पादकता प्राप्त की जा सकती है। धान की उत्पादकता बढ़ाने, हाइब्रिड राइस, ग्रीन सुपर राइस, कम लागत वाली बीज उत्पादन तकनीक, कम मीथेन उत्सर्जन, कम उर्वरक में अधिक उत्पादन और मध्य प्रदेश में जलवायु-सहनशील धान की नई किस्मों पर यह जानकारी अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) में प्रिंसिपल साइंटिस्ट और हाइब्रिड राइस डेवलपमेंट कंसोर्टियम (HRDC) के प्रमुख डॉ. जौहर अली ने अपने भोपाल प्रवास के दौरान कृषक जगत को एक विशेष मुलाकात में दी.
कृषक जगत : भारत में धान की उत्पादकता बढ़ाने की सबसे बड़ी संभावना आपको कहां दिखाई देती है?
डॉ. जौहर अली: भारत में धान की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ धान का क्षेत्र कम करने की भी आवश्यकता है। इसके लिए हाइब्रिड राइस तकनीक महत्वपूर्ण हो सकती है। सामान्य इनब्रेड किस्मों की तुलना में अच्छे हाइब्रिड से लगभग 25–30 प्रतिशत अधिक उत्पादकता की संभावना है।
हाइब्रिड को लेकर एक धारणा है कि उसकी खाने की गुणवत्ता पारंपरिक किस्मों जैसी नहीं होती। यह जरूरी नहीं है। यदि दोनों पेरेंट अच्छे गुणवत्ता वाले चावल की किस्मों से लिए जाएं तो उसी गुणवत्ता का हाइब्रिड विकसित किया जा सकता है। बासमती या चिनौर जैसे विशेष गुणवत्ता वाले चावल के लिए भी हाइब्रिड विकसित किए जा सकते हैं।
कृषक जगत : मध्य प्रदेश में IRRI और जवाहर लाल नेहरू कृषि वि .वि. जबलपुर ( JNKVV ) का संयुक्त प्रोजेक्ट किन लक्ष्यों पर काम कर रहा है?
डॉ. जौहर अली: मध्य प्रदेश सरकार की फंडिंग से लगभग दो वर्ष पहले यह परियोजना शुरू हुई। इसमें टू-लाइन हाइब्रिड राइस तकनीक, बायोफोर्टिफाइड राइस, मल्टीपल-स्ट्रेस टॉलरेंट और न्यूट्रिएंट-यूज-एफिशिएंट किस्मों पर काम हो रहा है। IRRI से कई आनुवंशिक सामग्री मध्य प्रदेश लाई गई हैं और JNKVV के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर उनका परीक्षण, अनुकूलन और मल्टीप्लिकेशन किया जा रहा है।
हमारा उद्देश्य ऐसी किस्में विकसित करना है जो सूखा, बाढ़, कम पानी और कम उर्वरक जैसी परिस्थितियों में भी अच्छा प्रदर्शन कर सकें।
कृषक जगत : इन नई किस्मों की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?
डॉ. जौहर अली: हमारा फोकस केवल अधिक उत्पादन पर नहीं है। ऐसी किस्मों की जरूरत है जो बहु-अजैविक तनाव सहन कर सकें और प्रमुख रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध रखें। इसके अलावा हम पारंपरिक स्थानीय किस्मों को भी आधुनिक प्रजनन तकनीक से बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश की कालीमूंछ, लूचई और छतरी जैसी लंबी कद वाली पारंपरिक किस्मों में पौधे की ऊंचाई कम करने और तने की मजबूती बढ़ाने वाले गुण शामिल किए जा रहे हैं।
इससे पारंपरिक चावल की खाने की गुणवत्ता बनाए रखते हुए पौधे को अधिक मजबूत और कम गिरने वाला बनाया जा सकता है।
कृषक जगत : टू-लाइन हाइब्रिड तकनीक किसानों और बीज उत्पादन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
डॉ. जौहर अली: पारंपरिक थ्री-लाइन हाइब्रिड बीज उत्पादन में तीन अलग-अलग लाइनों की जरूरत होती है। इससे बीज उत्पादन प्रक्रिया जटिल और महंगी हो जाती है। टू-लाइन प्रणाली में दो लाइनों की आवश्यकता होती है। इसमें तापमान के आधार पर एक लाइन की नर-बांझपन की स्थिति बदलती है। हमने मध्य प्रदेश में ऐसे क्षेत्र चिन्हित किए हैं जहां तापमान की परिस्थितियों का उपयोग बीज उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
जबलपुर और बालाघाट क्षेत्र इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यदि बीज उत्पादन की लागत कम होती है और बीज उत्पादन की क्षमता बढ़ती है, तो हाइब्रिड बीज को किसानों तक अपेक्षाकृत कम लागत में पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
कृषक जगत : क्या इससे मध्य प्रदेश हाइब्रिड राइस सीड प्रोडक्शन का केंद्र बन सकता है?
डॉ. जौहर अली: इसकी अच्छी संभावना है। टू-लाइन तकनीक में एक हेक्टेयर से मदर पेरेंट लाइन का बीज उत्पादन पारंपरिक प्रणाली की तुलना में अधिक हो सकता है। इससे बीज उत्पादन की लागत घटाने में मदद मिलती है।
हमने मध्य प्रदेश में बीज उत्पादन के लिए कुछ क्षेत्रों को वैलिडेट किया है और बीजसंघ को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा जा रहा है। हमारा लक्ष्य है कि स्थानीय स्तर पर बीज उत्पादन बढ़े और किसानों को गुणवत्तापूर्ण हाइब्रिड बीज उपलब्ध हो।
कृषक जगत : आप हाइब्रिड राइस में केवल उत्पादन ही नहीं, मिलिंग रिकवरी पर भी जोर दे रहे हैं ?
डॉ. जौहर अली: किसान की वास्तविक आय केवल खेत में पैदा हुए टन से तय नहीं होती। मिलिंग के बाद कितने पूरे दाने मिलते हैं, यह भी महत्वपूर्ण है।यदि 100 किलो धान से पूरे दानों की रिकवरी अधिक है तो किसान को बाजार में अधिक बिकने योग्य चावल मिलता है। इसलिए हम ऐसी हाइब्रिड किस्मों पर काम कर रहे हैं जिनमें अच्छी मिलिंग और हेड-राइस रिकवरी हो।
कृषक जगत : किसानों तक इन नई किस्मों को पहुंचाने की आपकी योजना क्या है?
डॉ. जौहर अली: वर्तमान में सामग्री का मल्टीप्लिकेशन और एडॉप्टेशन चल रहा है। इसके बाद JNKVV के वैज्ञानिकों के माध्यम से मदर लाइन और हाइब्रिड विकसित किए जाएंगे तथा बीजसंघ के सहयोग से इनका बड़े स्तर पर बीज उत्पादन किया जाएगा।
किसानों को केवल बीज देना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें इसकी खेती की तकनीक और यदि वे स्वयं बीज उत्पादक बनना चाहते हैं तो बीज उत्पादन की तकनीक का प्रशिक्षण भी देना होगा।
डॉ. जौहर अली का परिचय

फिलीपींस, मनिला के लॉस बानास, लगुना स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) में प्रिंसिपल साइंटिस्ट और हाइब्रिड राइस डेवलपमेंट कंसोर्टियम (HRDC) के प्रमुख डॉ. जौहर अली का जन्म 1960 में भारत में तमिलनाडु के छोटे से गावं इल्योगुड़ी में हुआ था .
शिक्षा : स्कूली शिक्षा दिल्ली में हुई . पंजाब कृषि वि. वि. से बी एस सी की डिग्री और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) से जेनेटिक्स में एम् एस सी एवं Ph.D. की है। तथा फसल प्रजनन, आणविक जीवविज्ञान और जीनोमिक्स के क्षेत्र में विशेषज्ञता भी हासिल की है।
अनुभव: डॉ. अली को एशिया और अफ्रीका के लिए जलवायु-अनुकूल (climate-smart), उच्च उपज देने वाली और तनाव-सहिष्णु (stress-tolerant) चावल की किस्मों व संकरों (hybrids) को विकसित करने का 33 वर्षों से अधिक का अनुभव है।
डॉ. अली IRRI के हाइब्रिड राइस ब्रीडिंग कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसे जलवायु-स्मार्ट धान हाइब्रिड (Climate-Smart Rice Hybrids) विकसित करना है, जो अधिक उपज देने के साथ प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन कर सकें और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग करें।
वे हाइब्रिड राइस डेवलपमेंट कंसोर्टियम (HRDC) के प्रमुख भी हैं। यह मंच 95 से अधिक सार्वजनिक और निजी बीज कंपनियों को जोड़कर हाइब्रिड धान तकनीक को व्यापक स्तर पर किसानों तक पहुंचाने में सहयोग करता है।
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