किसान आंदोलन : सरकार और किसानों को छोड़नी होगी जिद

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(अतुल सक्सेना)

14 सितम्बर 2021,  किसान आंदोलन : सरकार और किसानों को छोड़नी होगी जिद – देश में नए कृषि कानून लागू करने के विरोध में विगत 10 माह से दिल्ली बार्डर पर चल रहे किसान आंदोलन का अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है। कोरोना काल में सरकार और किसान दोनों अपने-अपने अहंकार में डूबे हुए हंै, कोई झुकने को तैयार नहीं, जिससे सर्वसम्मत हल निकाला जा सके। हालांकि सरकार और किसान नेताओं के बीच 11 बार बातचीत हो चुकी है परन्तु नतीजा शून्य ही रहा है। किसान नए कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हैं जबकि सरकार संशोधन करने की बात कर रही है तथा 18 माह के लिए कानून स्थगित करने को तैयार है। हाल ही में किसान आंदोलन ठंडा पड़ रहा था, तभी करनाल में आंदोलनकारी एक किसान, पुलिस के लाठीचार्ज में मारा गया जिसने आंदोलन की आग में घी का काम किया। इस लाठीचार्ज का आदेश एसडीएम ने दिया था यहां प्रश्न यह उठता है कि नये कृषि कानूनों में कृषक हित में फैसले लेने के लिए एसडीएम कोर्ट का उल्लेख है परन्तु जब एसडीएम ही लाठी चलवायेगा तो किसानों के हित का क्या होगा? हाल ही में हुई मुजफ्फरपुर किसान महापंचायत ने फिर आंदोलन को हवा दे दी है अब मृतक किसान को लेकर करनाल में तथा दिल्ली बार्डर पर आंदोलन पुन: गरमा गया है।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसान गत 10 माह पूर्व दिल्ली कूच पर निकले थे, उन्हें दिल्ली, हरियाणा सीमा पर रोका गया तो बवाल शुरू हो गया, तभी से किसान बार्डर पर डटे हुए है और वह आगे बढऩे का प्रयास कर रहे है। जिन तीन कृषि कानूनों का विरोध हो रहा हैं उसमें आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) 2020 तथा कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत, आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून 2020 शामिल है।

इन नए कृषि कानूनों पर सरकार, किसान एवं बुद्धिजीवियों का अलग-अलग, अपना-अपना मत है। कोई लाभदायक मान रहा है कोई नुकसानदायक, सभी अपने-अपने ढंग से सोच रहे है इसलिए तर्कसंगत हल नहीं निकल पा रहा है।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020

सरकार का कहना है कि इस कानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है। ऐसा माना जा रहा है कि कानून के प्रावधानों से किसानों को सही मूल्य मिल सकेगा क्योंकि बाजार में स्पर्धा बढ़ेगी। इस कानून का मुख्य उद्देश्य आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी रोकने के लिए, उनके उत्पादन, सप्लाई और कीमतों को नियंत्रित रखना है। परन्तु किसान संगठनों का आरोप है कि नए कानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुकसान किसानों को होगा। नए बिल के मुताबिक, सरकार आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई पर अति-असाधारण परिस्थिति में ही नियंत्रण लगाएंगी। ये स्थितियां अकाल, युद्ध, कीमतों में अप्रत्याशित उछाल या फिर गंभीर प्राकृतिक आपदा हो सकती है।

कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून, 2020

सरकार का कहना है कि इस कानून के तहत किसान एपीएमसी यानी कृषि उत्पाद विपणन समिति के बाहर भी अपने उत्पाद बेच सकता है। इस बिल में बताया गया है कि देश में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया जाएगा कि जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी के बाहर फसल बेचने की आजादी होगी।

मुख्य तौर पर किसानों को दूसरे कानून पर आपत्ति है, क्योंकि एपीएमसी में किसानों को अपनी फसल का न्यूनतम मूल्य मिलता है, इस कानून में यह साफ नहीं किया गया है कि मंडी के बाहर किसानों को न्यूनतम मूल्य मिलेगा या नहीं। ऐसे में हो सकता है कि किसी फसल का ज्यादा उत्पादन होने पर व्यापारी किसानों को कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर करें।
कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020

सरकार का कहना है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी फसल की निश्चित कीमत दिलवाना है। इसके तहत कोई किसान फसल उगाने से पहले ही किसी व्यापारी से समझौता कर सकता है, इस समझौते में फसल की कीमत, फसल की गुणवत्ता और कितनी मात्रा में और कैसे खाद का इस्तेमाल होगा जैसी बातें शामिल हैं।कानून के मुताबिक किसान को फसल की डिलिवरी के समय ही दो तिहाई राशि का भुगतान करना होगा और बाकी का पैसा 30 दिन के अंदर देना होगा। इसमें यह प्रावधान भी है कि खेत से फसल उठाने की जिम्मेदारी व्यापारी की होगी, अगर कोई एक पक्ष समझौते को तोड़ेगा तो उस पर पेनाल्टी लगाई जाएगी।

किसानों का कहना है कि सरकार फसल के भंडारण की अनुमति दे रही है लेकिन किसानों के पास इतने संसाधन नहीं होते हैं कि वो सब्जियों या फलों का भंडारण कर सकें। ऐसे में वो व्यापारियों को कम कीमत पर अपनी फसल बेच सकते हैं और व्यापारी अपने पास उनकी फसल जमा कर सकते हैं। क्योंकि व्यापारी के भंडारण की सुविधा अच्छी होगी तो वो अपने हिसाब से बाजार में फसल को बेचेंगे। किसानों का कहना है कि ऐसा करने से फसल की कीमत तय करने का अधिकार बड़े व्यापारियों या कंपनियों के पास आ जाएगा और किसानों की भूमिका ना के बराबर हो जाएगी।

कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े किसान प्रतिनिधियों से सरकार की 11 दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन, नतीजा सिफर रहा है. अभी तक आंदोलन का बस इतना असर हुआ है कि तीनों कानूनों को 18 महीनों के लिए स्थगित करने पर सरकार सहमत है। परंतु किसान इस बात पर तैयार नहीं हुए।

दूसरी तरफ हाल ही में अन्नदाता किसानों पर पुलिस ने करनाल में लाठीचार्ज किया। यह लाठीचार्ज तत्कालीन एसडीएम द्वारा कराया गया। लाठीचार्ज में करनाल के रायपुर जाटान गांव के किसान सुशील काजल की मौत हो गई थी। इसके विरोध में किसानों ने महापंचायत की। किसान एसडीएम के निलंबन की मांग कर रहे थे परंतु सरकार तैयार नहीं हुई। यहां विचारणीय प्रश्न यह है कि नये कृषि कानूनों में एसडीएम कोर्ट से किसानों को राहत देने का प्रावधान है परन्तु जब एसडीएम किसानों पर लाठीचार्ज करवा सकता है तो किसान हित में फैसला कैसे करेगा। इसके पश्चात सरकार ने कड़ा रूख अपनाते हुए पंजाब सरकार से कहा कि समर्थन मूल्य पर खरीदी के लिए एफसीआई अधिकारी को किसानों द्वारा जमीन का नक्शा, खसरा दिखाना होगा तभी एमएसपी पर अनाज की खरीदी होगी।

बहरहाल मुजफ्फरपुर महापंचायत के बाद किसान आंदोलन पुन: जागृत हो गया है अब सरकार और किसानों का अगला कदम क्या होगा यह प्रश्न भविष्य के गर्भ में है।

 

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