सोयाबीन की उत्पादन तकनीकी पर कृषक प्रशिक्षण आयोजित

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अमृत महोत्सव के अंतर्गत

21 जून 2021, इंदौरसोयाबीन की उत्पादन तकनीकी पर कृषक प्रशिक्षण आयोजित – भारत सरकार एवं भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद्, नई दिल्ली के निर्देशानुसार भारत की आजादी के 75 वर्ष होने  केउपलक्ष्य में मनाये जा रहे ‘अमृत महोत्सव’ के अंतर्गत गत दिनों  इन्दौर स्थित भा.कृ.अनु.प.-भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान एवं आई.टी.सी. लिमिटेड के संयुक्त प्रयास से ज़ूम प्लेटफार्म एवं यू ट्यूब चैनल के माध्यम से एक साथ किए गए सजीव प्रसारण से ‘सोयाबीन की उत्पादन तकनीकी ‘ विषय पर ऑनलाइन कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गय।  इन संस्थानों के सोशल मीडिया चैनलों पर एक साथ प्रसारित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के शहरी, ग्रामीण तथा सुदूर क्षेत्रों से एक साथ 7500 कृषकों ने भाग लिया। जो यदि 10 कृषकों को इस प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी पहुंचाएंगे, तो  इस एक प्रयास से एक साथ 75  हज़ार  सोयाबीन कृषकों के साथ नवीनतम तकनीकी  का प्रचार-प्रसार एवं खेती में अंगीकरण हो सकेगा।

सोयाबीन फसल की बोवनी से कुछ ही दिनों पूर्व आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में आईसी.ए.आर.-आई.आई.एस.आर.इन्दौर के वैज्ञानिकों द्वारा सोयाबीन फसल की उत्पादकता में वृद्धि के  मुख्य कारकों पर पांच तकनीकी  सत्रों मेंकृषकोपयोगी जानकारी प्रदान की।  इसमें डॉ मृणाल कुचलान ने “सोयाबीन की नवीनतम किस्में, बीज उत्पादन एवं गुणवत्ता परीक्षण के बारे-में जानकारी देते हुए वर्तमान  में लोकप्रिय जे.एस. 95-60 के स्थान पर जे.एस. 20-69, जे.एस.20-98, जे.एस. 20-34 जैसी अन्य किस्मों के अंतर्गत क्षेत्रफल बढ़ाने की अनुशंसा क।  इसी कड़ी में फसल उत्पादन विभाग के अध्यक्ष डॉ एस.डी. बिल्लोरे ने मौसम की  विषम परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सोयाबीन की बोवनी के लिए बी.बी.एफ. या रिज एवं फरो पद्धति को अपनाने की  सलाह दी । डॉ. राकेश कुमार वर्मा ने रासायनिक खरपतवारनाशकों के उपयोग समेत खरपतवार प्रबंधन के अन्य उपायों को भी अपनाने का आह्वान किय।  ‘सोयाबीन के प्रमुख कीट एवं रोग प्रबंधन’ विषय पर आयोजित तकनीकी  सत्रों में डॉ. लोकेश कुमार मीणा, डॉ. अमरनाथ शर्मा एवं डॉ.लक्ष्मण सिंह राजपूत ने सोयाबीन की  बोवनी के समय फफुन्दनाशक, कीटनाशक एवं जैविक कल्चर के प्रयोग को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।

प्रशिक्षण समापन  पर माननीय डॉ. ए.के.सिंह, उपमहानिदेशक (कृषि विस्तार), भारतीय कृषिअनुसन्धान परिषद्, नई दिल्ली ने अपने उद्बोधन में कहा कि वर्तमान में केंद्र सरकार सोयाबीन एवं राई -सरसों जैसी तिलहनी फसलों के उत्पादन बढ़ाने अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर रही है, जिसके लिए विभिन्न अपारंपरिक जिलों को अधिसूचित किया गया है।  उन्होंने कहा कि  उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड एवं उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों के किसानों को मध्य प्रदेश के किसानों से सोयाबीन की सफलतम खेती की  सीख लेने की साल्ह के साथ ही उन्होंने भारतीय सोयाबीन अनुसन्धानसंस्थान को देश के विभिन्न जिलों में कार्यरत कृषि विज्ञान केन्द्रों के साथ मिलकर सोयाबीन की उन्नत तकनीकी  एवं इसके खाद्य उपयोग बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रयास करने के लिए  निर्देशित किया।  उनके अनुसार सोयाबीन कृषकों को अपने उत्पादन के उचित मूल्य पाने के लिए “फार्मर प्रोडूसर आर्गेनाइजेशन” यानी   ‘सोयाबीन-कृषक उत्पादक समूह संस्था’ का गठन किया जाना चाहिए ,जिसके लिए फिक्की (फेडरेशन ऑफ़ इंडियन चेम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) जैसे उद्योग संस्था की सहायता प्राप्त की जा सकती है।

इंदौर संस्थान की निदेशक डॉ. नीता खांडेकर ने संस्थान द्वारा किये जा रहेतकनीकी  विकास एवं उनके प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों को अधिक सुदृढ़ किये जाने का वचन दिया. उन्होंने यह बताया कि बिहार एवं उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सोयाबीन की खेती को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी  विकास के कार्यक्रम क्रियान्वित जा  रहे हैं , जबकि अन्य राज्य जैसे पंजाब, हरियाणा तथा ओडिशा के लिए रोडमैप बनाया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान  कृषक-वैज्ञानिक परिचर्चा सत्र का भी आयोजन हुआ जिसमें  प्रतिभागी कृषकों ने ज़ूम-चैट एवं यूट्यूब चैनल पर कमेन्ट लिखकर शंकाओं का समाधान किया। इस सम्पूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का  आयोजन एवं समन्वयन भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान के डॉ. बी.यू. दुपारे, प्रधान वैज्ञानिक (कृषि विस्तार) ,डॉ. सविता कोल्हे तथा आई.टी.सी. लिमिटेड के डॉ. भुवनेश द्वारा किया गया।

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