₹40 हजार का खर्च घटकर ₹5-10 हजार हुआ, प्राकृतिक खेती से जबलपुर की महिला किसान ने बचाए लाखों रुपए
14 अगस्त 2026, भोपाल: ₹40 हजार का खर्च घटकर ₹5-10 हजार हुआ, प्राकृतिक खेती से जबलपुर की महिला किसान ने बचाए लाखों रुपए – रासायनिक खेती में बढ़ती लागत से परेशान किसानों के बीच जबलपुर की महिला किसान प्रीति पटेल ने प्राकृतिक खेती अपनाकर मिसाल पेश की है। जबलपुर विकासखंड के ग्राम घाना कैलवास की रहने वाली प्रीति ने रासायनिक खाद और महंगे कीटनाशकों का इस्तेमाल छोड़कर प्राकृतिक तरीके से खेती शुरू की। इससे उनकी खेती की लागत काफी कम हुई और उपज की गुणवत्ता में भी सुधार आया।
प्रीति पटेल अपनी 2 एकड़ जमीन सहित कुल 7 एकड़ में खेती करती हैं। वह बताती हैं कि पहले रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर करीब 40 हजार रुपये तक खर्च हो जाता था। प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद यह खर्च घटकर महज 5 से 10 हजार रुपये रह गया है। इससे उन्हें सालाना करीब 2 से 2.5 लाख रुपये तक की बचत हो रही है।
आत्मा परियोजना और प्राकृतिक खेती मिशन से मिली ट्रेनिंग
प्रीति बताती हैं कि रासायनिक खेती के कारण खेत की मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही थी। इसी दौरान वह आत्मा परियोजना और नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग से जुड़ीं। योजना के तहत उन्हें प्राकृतिक खेती की तकनीकों और जैविक घोल तैयार करने का प्रशिक्षण मिला। प्रशिक्षण में सीखी तकनीकों को उन्होंने अपने खेत में अपनाना शुरू किया। इसके बाद उन्हें मिट्टी की गुणवत्ता और फसल की उपज में बदलाव नजर आने लगा।
बीजामृत और जीवामृत बनाना सीखा
प्रशिक्षण के दौरान प्रीति ने बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे प्राकृतिक कृषि उत्पाद और कीटनाशक तैयार करने की विधि सीखी। इसके बाद उन्होंने खेत में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया और प्राकृतिक तरीकों से फसल उत्पादन शुरू किया। प्राकृतिक खेती अपनाने से उन्हें बाजार से महंगी खाद और कीटनाशक खरीदने की जरूरत भी नहीं रही। बीजामृत और जीवामृत के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार के साथ फसलों की पैदावार में भी बढ़ोतरी हुई।
प्राकृतिक उपज के मिल रहे बेहतर दाम
प्राकृतिक तरीके से तैयार अनाज और सब्जियों की बाजार में मांग होने से प्रीति को अपनी उपज के बेहतर दाम भी मिलने लगे हैं। इससे उनकी खेती पहले की तुलना में अधिक लाभकारी बनी है।
अब दूसरे किसानों को भी कर रहीं प्रेरित
प्राकृतिक खेती से मिली सफलता को प्रीति अब अपने तक सीमित नहीं रखना चाहतीं। वह घाना कैलवास और आसपास के किसानों को भी रसायनमुक्त खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती से खेती की लागत कम करने के साथ मिट्टी और पर्यावरण का संरक्षण भी किया जा सकता है।
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