राज्य कृषि समाचार (State News)

भरपूर उर्वरक के दावे और ज़मीनी हकीकत !

लेखक: मधुकर पवार

20 जनवरी 2026, भोपाल: भरपूर उर्वरक के दावे और ज़मीनी हकीकत ! – केंद्र सरकार यह दावा कर रही है कि वर्ष 2024–25 में देश में उर्वरकों की रिकॉर्ड उपलब्धता सुनिश्चित की गई और किसानों को पूरे वर्ष किसी प्रकार की कमी का सामना नहीं करना पड़ा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जहाँ देश की अनुमानित आवश्यकता 152.50 करोड़ बैग (722.04 लाख टन) थी, वहीं 176.79 करोड़ बैग (834.64 लाख टन) उर्वरक उपलब्ध कराया गया—अर्थात आवश्यकता से लगभग 24 करोड़ बैग अधिक।

प्रश्न यह नहीं है कि उर्वरक कितना उपलब्ध था, बल्कि असली सवाल यह है कि फिर किसानों को समय पर खाद क्यों नहीं मिली? क्यों उन्हें कई-कई दिनों तक इंतज़ार करना पड़ा और रात-रात भर उर्वरक वितरण केंद्रों के बाहर कतारों में खड़ा रहना पड़ा?

जब दावे और ज़मीनी हकीकत टकराए

सरकार का कहना है कि भारतीय रेलवे ने उर्वरक रैकों की ढुलाई को प्राथमिकता दी, बंदरगाहों पर आयातित उर्वरकों की त्वरित अनलोडिंग हुई और भंडारण व वितरण की व्यवस्था भी सुदृढ़ की गई। उर्वरक कंपनियों के साथ नियमित समीक्षा बैठकों और सतत निगरानी के दावे भी किए गए। यदि ये सभी व्यवस्थाएँ वास्तव में प्रभावी थीं, तो फिर मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों में किसानों को खाद के लिए भटकना क्यों पड़ा?

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खरीफ-रबी दोनों में संकट

हकीकत यह है कि खरीफ और रबी—दोनों ही मौसमों में किसानों को उर्वरक की भारी किल्लत झेलनी पड़ी। कई स्थानों पर कालाबाजारी की खबरें सामने आईं और मजबूरी में किसानों को निजी दुकानों से अधिक कीमत चुकाकर खाद खरीदनी पड़ी। विडंबना यह है कि इसी दौरान केंद्र और राज्य सरकारें लगातार यह दोहराती रहीं कि “खाद की कोई कमी नहीं है।”

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समस्या कहाँ है?

जब वास्तव में खाद की कोई कमी नहीं थी, तो फिर किसानों तक खाद पहुँचाने में देरी क्यों हुई? यह विरोधाभास साफ संकेत देता है कि समस्या उत्पादन या आयात की नहीं, बल्कि परिवहनभंडारण और वितरण तंत्र की गंभीर विफलता की है। यदि उर्वरक आवश्यकता से अधिक मात्रा में उपलब्ध था, तो उसे समय पर सभी जिलों और ब्लॉकों तक पहुँचाने में लापरवाही क्यों बरती गई?

जवाबदेही तय क्यों नहीं हुई?

क्या यह प्रशासनिक उदासीनता नहीं है कि गोदामों में उर्वरक भरा रहा और किसान बोनी के समय खाद के लिए तरसता रहा? इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा खामियाजा किसानों को उठाना पड़ा। जिन जिलों में खाद की कमी रही और समय पर किसानों को उर्वरक उपलब्ध नहीं कराया गया, वहाँ संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए थी। लेकिन हर बार की तरह इस व्यवस्था-विफलता को आंकड़ों की आड़ में ढक दिया गया।

तकनीक के दौर में भी लाइन में किसान

सरकार डिजिटल पोर्टल, आधुनिक संचार माध्यमों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात करती है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि किसान आज भी खाद के लिए लाइन में खड़ा होने को मजबूर है। तकनीक के इस दौर में भी यदि किसान उर्वरक के लिए दर-दर भटक रहा है, तो यह पूरी व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।

समाधान क्या हो ?

समाधान केवल नए दावे करने में नहीं, बल्कि मांग-आधारित वितरण प्रणाली, जिला-ब्लॉक स्तर पर अनिवार्य न्यूनतम स्टॉक, और वितरण से जुड़े आंकड़ों को सार्वजनिक करने में है। सहकारी समितियों और एफपीओ को मजबूत कर निजी मुनाफाखोरी पर प्रभावी रोक लगानी होगी। सबसे अहम यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी दावे खेत की मेड़ पर भी सच साबित हों।

आख़िरी सवाल

किसान को यह भरोसा मिलना चाहिए कि बोनी के समय उसे खाद के लिए अपमानजनक कतारों में खड़ा नहीं होना पड़ेगा। जब तक उर्वरकों की “रिकॉर्ड उपलब्धता” समय पर किसानों के हाथों तक नहीं पहुँचती, तब तक ऐसे दावे केवल सरकारी काग़ज़ों की उपलब्धि बनकर ही रहेंगे। केंद्र और राज्य सरकारों को अब उर्वरकों की उपलब्धता, मांग, परिवहन, भंडारण और वितरण की समग्र समीक्षा कर पिछली कमियों को दुरुस्त करना होगा, ताकि आने वाले खरीफ और रबी के मौसम में किसानों को उनकी मांग के अनुसार समय पर खाद उपलब्ध हो सके।

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