MP के किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी: मालवा के गरडू, बालम खीरे और मालवी आलू को मिला GI टैग
23 जून 2026, नई दिल्ली: MP के किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी: मालवा के गरडू, बालम खीरे और मालवी आलू को मिला GI टैग – मध्य प्रदेश के किसानों और कृषि उत्पादों के लिए बड़ी उपलब्धि सामने आई है। मालवा क्षेत्र के प्रसिद्ध गरडू, रतलाम जिले के सैलाना बालम खीरे और इंदौर के मालवी आलू को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। इस मान्यता के साथ ये उत्पाद अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान के साथ जाने जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की बाजार में मांग बढ़ेगी, किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी और निर्यात की नई संभावनाएं खुलेंगी।
मालवा के गरडू को मिली नई पहचान
मालवा क्षेत्र में सर्दियों के मौसम में विशेष रूप से पसंद किया जाने वाला गरडू अपनी अनूठी गुणवत्ता और स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। यह पकने के बाद बाहर से कुरकुरा और अंदर से मुलायम रहता है। मालवा में इसे तलकर मसालों और नींबू के रस के साथ परोसा जाता है। सर्दियों के दौरान इसकी मांग काफी बढ़ जाती है और शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में भी यह प्रमुख व्यंजनों में शामिल रहता है।
बागवानी विभाग के अनुसार, गरडू की विशेष गुणवत्ता मालवा क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और पारंपरिक खेती पद्धतियों का परिणाम है। वर्तमान में रतलाम जिले में लगभग 120 हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की जा रही है।
सैलाना का बालम खीरा भी हुआ सम्मानित
रतलाम जिले के सैलाना क्षेत्र में उगाया जाने वाला बालम खीरा अपने बड़े आकार, आकर्षक रंग और रसीले स्वाद के लिए जाना जाता है। वर्षों से यह क्षेत्रीय बाजारों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के बीच लोकप्रिय रहा है। अधिकारियों के मुताबिक वर्तमान में लगभग 100 हेक्टेयर क्षेत्र में बालम खीरे की खेती की जा रही है और बड़ी संख्या में किसान इससे जुड़े हुए हैं।
मालवी आलू की गुणवत्ता बनी पहचान
इंदौर जिले में उगाए जाने वाले मालवी आलू को भी GI टैग मिला है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसमें शुगर और स्टार्च की अपेक्षाकृत कम मात्रा होना है। यही कारण है कि इससे तैयार किए जाने वाले चिप्स, वेफर्स और फ्रेंच फ्राइज तलने के बाद काले या लाल नहीं पड़ते और उनका रंग हल्का बना रहता है।
मालवी आलू की इसी विशेषता के कारण कई फूड प्रोसेसिंग कंपनियां इसे सीधे किसानों से खरीदती हैं। वर्तमान में इंदौर जिले में लगभग 45 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की जा रही है और करीब 35 हजार किसान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हैं।
किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी। इससे किसानों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और नए खरीदार मिलने में मदद मिलेगी। साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इन उत्पादों की मांग बढ़ने की संभावना है, जिससे निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा।
क्या होता है GI टैग?
GI (Geographical Indication) टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति और विशिष्ट गुणवत्ता के आधार पर दिया जाता है। यह टैग उस उत्पाद की पहचान और विशेषताओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। इससे उत्पाद की नकल रोकने और उसकी असली पहचान बनाए रखने में मदद मिलती है।
पहले भी कई उत्पादों को मिल चुकी है पहचान
मध्य प्रदेश के कई अन्य प्रसिद्ध उत्पादों को पहले ही GI टैग मिल चुका है। इनमें रतलामी सेव, कड़कनाथ, रियावन लहसुन, चिन्नौर चावल और सुंदरजा आम जैसे उत्पाद शामिल हैं। अब गरडू, बालम खीरा और मालवी आलू के इस सूची में शामिल होने से प्रदेश की कृषि और खाद्य विरासत को एक और बड़ी पहचान मिली है।
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