नरवाई प्रबंधन में कारगर साबित हो रही बेलर मशीन, किसानों की बढ़ी आमदनी और स्वच्छ पर्यावरण
11 नवंबर 2025, भोपाल: नरवाई प्रबंधन में कारगर साबित हो रही बेलर मशीन, किसानों की बढ़ी आमदनी और स्वच्छ पर्यावरण – मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के किसानों को नरवाई प्रबंधन से प्रयौगिक रुप से खेतों में जाकर कृषि विभाग के अधिकारी जानकारी दे रहे वहीं मौके पर मशीनों से नरवाई का सदोपयोग सुगमता कैसे करें इसके लिए शासन स्तर से प्रदाय सहुलियतों से भलीभांति अवगत करा कर किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान भी मौके पर किया जा रहा है। शनिवार को ग्यारसपुर तहसील के ग्राम कॉलिंजा में बेलर का प्रदर्शन किया गया। उप संचालक कृषि के एस खपेड़िया,महेंद्र ठाकुर सहायक संचालक कृषि,आईटीसी से सार्थक कोटियाल प्रोसेस मैनेजर एवं पवन कुमार शर्मा ने अपनी उपस्थित कराया है। ताकि जिले के किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन अपनाएँ ज़्यादा कमाएँ इसके लिए किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग के द्वारा कि जा रही विशेष पहल से लाभान्वित हो सकें।
किसान भाई जिन्होंने धान की कटाई हार्वेस्टर के द्वारा कराई गई है खेत की सफाई बिना आग लगाए इस बेलर से की जा रही है। बेलर के उपयोग करने से खेत भी साफ हो जाता है और पर्यावरण भी शुद्ध रहता है बेलर चलाने हेतु आईटीसी सागर चौपाल विदिशा में संपर्क कर मदद प्राप्त कि जा सकती है।
नरवाई प्रबंधन
फ़सल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कटाई के बाद खेतों में बची पराली और फसल के अन्य अवशेषों को जलाने के बजाय उपयोगी रूप में अपनाया जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, जैविक कार्बन का स्तर सुधरता है और उत्पादन लागत कम होती है। अवशेषों को खेत में मिलाकर जैविक खाद बनाया जा सकता है या इन्हें पशु चारे, कम्पोस्ट, बायो-गैस, बायो-सीएनजी और बिजली उत्पादन जैसे कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
पराली न जलाने से वातावरण में धुओं और प्रदूषण कम होता है, जिससे स्वास्थ्य और जलवायु दोनों सुरक्षित रहते हैं। इस तरह फ़सल अवशेष प्रबंधन किसानों के लिए अधिक पैदावार, अतिरिक्त आय और स्वच्छ पर्यावरण का साधन है। मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि पराली और अवशेष मिट्टी में मिलाने से जैविक कार्बन और पोषक तत्व बढ़ते हैं। इससे फसल की पैदावार बेहतर होती है।
स्वच्छ पर्यावरण और जलवायु संरक्षण
अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआँ रुकता है।हवा, पानी और आस-पास का वातावरण स्वच्छ रहता है।
स्वास्थ्य की सुरक्षा
धुएँ से होने वाली सांस और आँख की बीमारियाँ कम होती हैं।गाँव और शहर दोनों में स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ता है। अतिरिक्त आमदनी के अवसर अवशेष से पशु चारा, खाद, बायोगैस, बायो-CNG और बिजली बनाई जा सकती है। किसान को अतिरिक्त कमाई का रास्ता मिलता है।
खर्च में कमी
अवशेष मिट्टी में मिलाने से रासायनिक उर्वरक पर निर्भरता घटती है। उत्पादन लागत कम होती है।
एफपीओ
ITCMAARS और एफपीओ द्वारा सहायता प्राप्त की जा सकती है। जिसके तहत खेत में पहचान बायोमास का संग्रहण संग्रह केंद्र तक पहुँचाना इत्यादि के लिए अपने नज़दीकी एफपीओ केंद्र एवं चौपाल बायोधन केंद्र से संपर्क किया जा सकता है।
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