राज्य कृषि समाचार (State News)

पर्वतीय कृषि का नया दौर: उन्नत किस्मों के विकास से किसानों और बागवानों को मिलेगी नई ताकत

23 जून 2026, भोपाल: पर्वतीय कृषि का नया दौर: उन्नत किस्मों के विकास से किसानों और बागवानों को मिलेगी नई ताकत – भारत के पर्वतीय राज्य, जैसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और अन्य पूर्वोत्तर राज्य अपनी विशिष्ट जलवायु, प्राकृतिक संपदा और बागवानी के लिए देशभर में पहचान रखते हैं। सेब, नाशपाती, कीवी, अखरोट, चेरी, आलूबुखारा, इलायची, अदरक और विभिन्न औषधीय पौधों का उत्पादन इन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। लेकिन जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान, नए कीट-रोगों और सीमित कृषि योग्य भूमि ने पर्वतीय किसानों और बागवानों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में नई एवं उन्नत फसल और फल किस्मों का विकास उनकी आजीविका को सुरक्षित और समृद्ध बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम बनकर उभरा है।
पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिक संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों ने ऐसी किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान दिया है, जो बदलती जलवायु में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हों। इन नई किस्मों में रोग एवं कीटों के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता, कम पानी की आवश्यकता, उच्च गुणवत्ता वाले फल, अधिक उत्पादन तथा लंबे समय तक भंडारण की विशेषताएँ विकसित की जा रही हैं। इससे किसानों की लागत कम होने के साथ उनकी आय बढ़ने की भी संभावना है।

विशेष रूप से सेब उत्पादक क्षेत्रों में तापमान बढ़ने के कारण पारंपरिक किस्मों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। ऐसे में कम शीत आवश्यकता (लो-चिल) वाली नई किस्मों का विकास और उनका विस्तार पर्वतीय बागवानी के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। इसी प्रकार कीवी, चेरी, अखरोट तथा अन्य फलों की उन्नत किस्में भी किसानों को बेहतर गुणवत्ता और अधिक बाजार मूल्य दिलाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं।

केवल नई किस्में विकसित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें किसानों तक समय पर पहुँचाना भी उतना ही आवश्यक है। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्रों, बागवानी विभागों, अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों को मिलकर किसानों के लिए प्रशिक्षण, प्रदर्शन प्लॉट, गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना होगा। जब किसान नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को समझेंगे, तभी इन नवाचारों का वास्तविक लाभ उन्हें मिल सकेगा।

पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक और प्राकृतिक खेती की संभावनाएँ भी अत्यधिक हैं। यदि उन्नत किस्मों को जैविक खेती की तकनीकों के साथ जोड़ा जाए, तो यहाँ उत्पादित फल एवं कृषि उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और पर्वतीय कृषि को एक नई पहचान मिलेगी।

सरकारों की भूमिका भी इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुणवत्तापूर्ण पौधशालाओं का विस्तार, अनुसंधान संस्थानों को पर्याप्त संसाधन, किसानों को अनुदान, आधुनिक सिंचाई सुविधाएँ, कोल्ड स्टोरेज, प्रसंस्करण इकाइयाँ और बेहतर विपणन व्यवस्था उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है। साथ ही कृषि स्टार्टअप, डिजिटल तकनीक और मौसम आधारित सलाह सेवाओं को भी पर्वतीय क्षेत्रों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाना होगा।

भविष्य की कृषि केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि टिकाऊ, जलवायु-अनुकूल और बाजारोन्मुख खेती ही सफलता का आधार बनेगी। पर्वतीय राज्यों के किसानों और बागवानों के लिए नई एवं उन्नत किस्मों का विकास इसी दिशा में एक दूरदर्शी पहल है। यदि वैज्ञानिक अनुसंधान, सरकारी सहयोग और किसानों के अनुभव का समन्वय किया जाए, तो पर्वतीय कृषि न केवल आत्मनिर्भर बनेगी, बल्कि देश की खाद्य एवं बागवानी अर्थव्यवस्था को भी नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

उन्नत किस्मों का विकास केवल नई तकनीक का परिचय नहीं है, बल्कि यह पर्वतीय किसानों के बेहतर भविष्य, सुरक्षित आजीविका और समृद्ध भारत की मजबूत नींव है। यही प्रयास आने वाले वर्षों में पर्वतीय क्षेत्रों को कृषि और बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने का आधार बनेगा।

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