राज्य कृषि समाचार (State News)

मध्यप्रदेश में 50% पद खाली: कैसे सफल होगा ‘किसान कल्याण वर्ष’?

कृषि अधिकारियों ने उठाई भर्ती और प्रमोशन की मांग

लेखक: अतुल सक्सेना

13 मार्च 2026, भोपाल: मध्यप्रदेश में 50% पद खाली: कैसे सफल होगा ‘किसान कल्याण वर्ष’? – किसानों के कल्याण के उद्देश्य से म.प्र. सरकार ने वर्ष 2026 को ‘किसान कल्याण वर्ष’ घोषित किया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि किसानों का कल्याण होगा कैसे? मंत्रालय में बैठकर कागज़ों पर योजनाएँ बनाना आसान है, पर उन्हें जमीन पर उतारने के लिए ब्लॉक स्तर तक अधिकारियों और कर्मचारियों की मजबूत व्यवस्था जरूरी होती है। विडंबना यह है कि कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग में ही अधिकारियों का अकाल बना हुआ है। लगभग 14 हजार स्वीकृत पदों वाले इस बड़े विभाग में महज़ 50 प्रतिशत अधिकारी-कर्मचारी ही कार्यरत हैं। स्थिति यह है कि हर साल रिटायरमेंट से संख्या घटती जा रही है, जबकि नई भर्तियाँ लगभग न के बराबर हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आधे स्टाफ के सहारे ‘किसान कल्याण वर्ष’ आखिर कैसे सफल होगा।

अमले की भारी कमी

प्रदेश का कृषि महकमा इस समय दो ज्वलंत समस्याओं से जूझ रहा है—पहली, अधिकारियों और कर्मचारियों की भारी कमी; और दूसरी, वर्षों से अटके प्रमोशन। ये दोनों मुद्दे अब विभाग के लिए नासूर बनते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि सरकारें बनाने-बिगाड़ने वाले किसानों को सुविधा और समय पर तकनीकी जानकारी देने वाला कृषि विभाग आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

प्रदेश में आवश्यकता के मुकाबले लगभग आधे अधिकारी-कर्मचारियों के सहारे ही विभाग किसी तरह चल रहा है। हालात इतने गंभीर हैं कि कई जगह ब्लॉक स्तरीय कार्यालयों पर ताला लगने की नौबत आ गई है। अमले की भारी कमी के कारण योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित हो रहा है और इसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है।

प्रमोशन में आरक्षण का पेंच

दूसरी ओर सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रमोशन तथा नई नियुक्तियों में आरक्षण को लेकर भी लंबा पेंच फंसा हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री Shivraj Singh Chouhan के कार्यकाल से शुरू हुआ यह विवाद अब मुख्यमंत्री Mohan Yadav के सामने भी चुनौती बना हुआ है। मध्यप्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण संबंधी नियम निरस्त होने के बाद वर्ष 2016 से पदोन्नतियाँ लगभग ठप पड़ी हैं।

ऐसे में मार्च 2025 में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में संकेत दिए थे कि सरकार जल्द ही कर्मचारियों के प्रमोशन के मुद्दे पर फैसला करेगी। लेकिन एक साल बीतने के बाद भी स्थिति में कोई ठोस बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है।

प्रदेश में पिछले लगभग नौ वर्षों से अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रमोशन नहीं हुए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि एक लाख से अधिक अधिकारी-कर्मचारी बिना पदोन्नति पाए ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। बावजूद इसके, हालात अब भी जस के तस बने हुए हैं।

कृषि विभाग में स्वीकृत पद

प्रदेश के कृषि विभाग में लगभग 14 हजार से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन समय के साथ सेवानिवृत्ति के कारण ये पद लगातार खाली होते जा रहे हैं। दिसंबर 2025 की स्थिति के अनुसार पूरे प्रदेश में लगभग 8 हजार से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। संचालनालय स्तर पर भी हालात इससे अलग नहीं हैं। वर्ष 2025 में ही संचालनालय से करीब 20 अधिकारी-कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि वर्ष 2026 में प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के 11 और अधिकारियों के रिटायर होने की संभावना है।

प्रदेश में संचालक कृषि के दो पद स्वीकृत हैं, जिनमें से एक पद खाली है। वहीं अपर संचालक के कुल 11 पदों में से 10 रिक्त हैं। विभाग में संयुक्त संचालक के 22 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 18 पद खाली पड़े हैं। संचालनालय स्तर पर इस समय केवल एक संयुक्त संचालक ही कार्यरत हैं।

उपसंचालकों के पद खाली

जिलों में कृषि उपसंचालक और पी.डी. आत्मा के कुल 143 पद स्वीकृत हैं, जिनमें 84 पद उपसंचालक और 59 पद पी.डी. आत्मा के हैं। इनमें से 82 पद रिक्त हैं और केवल 61 अधिकारी ही कार्यरत हैं। संचालनालय में भी 19 स्वीकृत पदों के मुकाबले महज 6 उपसंचालक बचे हैं।

स्थिति की गंभीरता के बावजूद हाल ही में संचालनालय से 14 अधिकारियों को जिलों में ‘धन-धान्य योजना’ के क्रियान्वयन के लिए भेजा गया है, जिनमें 6 उपसंचालक और 8 सहायक संचालक शामिल हैं। इससे संचालनालय में पहले से मौजूद अधिकारियों पर काम का दबाव और बढ़ गया है। कई अधिकारियों को एक साथ कई शाखाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में न तो संचालनालय का काम पूरी तरह हो पाएगा और न ही जिलों में योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन संभव होगा। जब सुपर क्लास वन और क्लास वन अधिकारियों की यह स्थिति है, तो द्वितीय और तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

प्रमोशन पर रोक क्यों?

वर्ष 2002 में प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने पदोन्नति के नियम बनाते हुए प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान किया था। इसके बाद आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को पदोन्नति मिलती रही, जबकि अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी पीछे रह गए। विवाद बढ़ने पर मामला अदालत पहुंचा और कर्मचारियों ने तर्क दिया कि आरक्षण का लाभ केवल एक बार मिलना चाहिए। इन दलीलों के आधार पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम, 2002 को निरस्त कर दिया। राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां से यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया गया। इसके बाद अप्रैल 2016 से प्रदेश में पदोन्नतियां लगभग ठप पड़ी हैं।

स्थिति यह है कि पिछले नौ वर्षों में एक लाख से अधिक अधिकारी-कर्मचारी बिना पदोन्नति पाए ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। देश में मध्यप्रदेश शायद इकलौता ऐसा राज्य है, जहां प्रमोशन पर इतनी लंबी अवधि से लगभग पूरी तरह रोक लगी हुई है। विडंबना यह भी है कि एक ओर सेवानिवृत्त अधिकारियों को संविदा पर दोबारा नियुक्त किया जा रहा है, जबकि कार्यरत अधिकारियों को पदोन्नति या उच्च पद का प्रभार देकर उनकी क्षमता का उपयोग करने की दिशा में ठोस पहल नहीं दिखती।

इस बीच मुख्यमंत्री Mohan Yadav ‘किसान कल्याण वर्ष’ के लिए माहवार कैलेंडर जारी कर चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि फील्ड में इन योजनाओं का क्रियान्वयन आखिर किसके भरोसे होगा? विभागीय सूत्रों का मानना है कि कृषि जैसे तकनीकी विभाग में संचालक की नियुक्ति कम से कम तीन वर्ष के लिए स्थिर होनी चाहिए, ताकि नीतियों और योजनाओं की निरंतरता बनी रहे। साथ ही संविदा नियुक्तियों पर नियंत्रण, रिक्त पदों की पूर्ति, उच्च पदों का प्रभार और लंबित पदोन्नतियों पर निर्णय जैसे कदम भी आवश्यक हैं।

कुल मिलाकर, सरकार एक ओर कृषि को लाभ का धंधा बनाने और किसानों की आय बढ़ाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर कृषि विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों की घटती संख्या चिंता बढ़ा रही है। ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विभाग ही कमजोर हो रहा है, तो किसान हित की योजनाओं का पूरा लाभ खेत तक कैसे पहुंचेगा।

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture

Advertisements