MSP से कम बिकने नहीं देंगे उपज: दाल-तिलहन खरीद में देरी पर NAFED और NCCF खुद उतरेंगे मैदान में
30 सितंबर 2026, नई दिल्ली: MSP से कम बिकने नहीं देंगे उपज: दाल-तिलहन खरीद में देरी पर NAFED और NCCF खुद उतरेंगे मैदान में – अल-नीनो की आशंका, मानसून में 12 फीसदी की असमान कमी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों की आसमान छूती कीमतों के बीच केंद्र की मोदी सरकार ने देश के किसानों के हितों की रक्षा का निर्णायक संकल्प लिया है। राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन- रबी अभियान 2026 के दौरान आज दिल्ली में मीडिया से मुखातिब होते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट कहा कि चाहे मौसम की मार हो या प्राकृतिक आपदा, सरकार किसान भाइयों के साथ हर कदम पर खड़ी है।
श्री शिवराज सिंह ने देश में रबी बुवाई के लिए पर्याप्त खाद, प्रमाणित बीजों और आवश्यक वित्तीय संसाधनों की पूर्ण उपलब्धता का भरोसा दिलाया। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के नाम पर किसानों पर एकतरफा दोषी ठहराने की परिपाटी पर कड़ा एतराज जताते हुए दो टूक कहा कि प्रदूषण के लिए केवल किसानों को खलनायक ठहराना और उन्हें प्रताड़ित करना कतई उचित नहीं है।
MSP से नीचे भाव जाने पर NAFED-NCCF करेंगी खरीद: श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि दलहन और तिलहन की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे जाने पर केंद्र सरकार की नोडल एजेंसियां NAFED और NCCF सीधे मंडियों में उतरकर किसानों से खरीद करेंगी। इसके लिए राज्यों की ओर से होने वाली प्रशासनिक देरी को खत्म करने का निर्णय लिया गया है। यानी राज्यों का इंतजार किए बिना जरूरत पड़ने पर केंद्र की ये एजेंसियां सीधे खरीद शुरू कर सकेंगी। इसके बाद राज्य एजेंसियां भी खरीद प्रक्रिया से जुड़ सकेंगी। इसका उद्देश्य किसानों को औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेचने से बचाना है।
रबी के लिए पर्याप्त खाद का भरोसा
कृषि मंत्री ने कहा कि 2026-27 के रबी सीजन के लिए सभी राज्यों ने कुल 380 लाख मीट्रिक टन उर्वरक की मांग रखी है। देश में इस समय 163 लाख मीट्रिक टन से अधिक उर्वरक का भंडार मौजूद है। पिछले साल रबी की शुरुआत में इसी समय यह स्टॉक 122 लाख मीट्रिक टन था। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव का वित्तीय बोझ भारतीय किसान पर नहीं पड़ने दिया जाएगा और राज्यों को समय पर पर्याप्त खाद उपलब्ध कराई जाएगी।
अल-नीनो और कम बारिश के बावजूद खरीफ बुवाई लगभग सामान्य
श्री चौहान ने बताया कि इस साल अल-नीनो की आशंका और कम बारिश के बावजूद खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र में केवल करीब 1 प्रतिशत की कमी आई है। शुरुआती दौर मेंमानसूनी बारिश में 14 प्रतिशत की कमी थी, जो पिछले तीन-चार दिनों की अच्छी बारिश के बाद घटकर 12 प्रतिशत रह गई है। कृषि विज्ञान के मानकों के अनुसार 19 प्रतिशत से अधिक बारिश की कमी होने पर गंभीर सूखे की स्थिति मानी जाती है। फसलवार देखें तो धान के रकबे में लगभग 16.32 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। मक्का, सोयाबीन और कपास के क्षेत्र में भी थोड़ी गिरावट हुई है। वहीं उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल, सूरजमुखी और तुअर के रकबे में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
प्राकृतिक आपदा से प्रभावित फसलों का आकलन
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में भारी बारिश, बाढ़ या सूखे से करीब 6.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फसल प्रभावित होने की प्रारंभिक जानकारी मिली है। नुकसान का विस्तृत वैज्ञानिक आकलन कराया जा रहा है। कर्नाटक और महाराष्ट्र के आग्रह पर प्रभावित क्षेत्रों के भौतिक निरीक्षण के लिए 3 अक्टूबर को विशेष केंद्रीय टीमें भेजी जाएंगी। श्री चौहान ने स्वयं भी इन राज्यों का दौरा कर स्थिति का जायजा लेने की बात कही।
आपदा में किसानों को राहत की व्यवस्था
उन्होंने बताया कि SDRF के तहत राज्यों के पास मौजूद फंड में 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 25 प्रतिशत राज्य सरकार का होता है। इससे किसानों को तत्काल राहत दी जा रही है। आपदा में टूटे मकानों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अतिरिक्त मकान दिए जा रहे हैं। NDRF के तहत केंद्रीय टीम के अंतिम सर्वे के बाद गृह मंत्री की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति नुकसान के आधार पर राज्यों को अतिरिक्त वित्तीय राहत पैकेज देने पर फैसला करेगी। सूखे से प्रभावित खेतों को खाली रहने से बचाने के लिए कम पानी और कम समय में तैयार होने वाली फसलों के बीजों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही फसल बीमा योजना का दायरा बढ़ाने के लिए काम जारी है।
RKVY और कृषोन्नति योजना की राशि समय पर
श्री चौहान ने बताया कि राज्यों को RKVY और कृषोन्नति योजना के तहत साल के अंत के बजाय समय पर राशि दी जा रही है। पहले 4,000 करोड़ रुपए जारी किए गए थे और हाल ही में 3,000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि और जारी की गई है। इस तरह कुल 7,000 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि राज्यों को हस्तांतरित की जा चुकी है।
रबी उत्पादन का लक्ष्य 177.72 मिलियन टन
कृषि मंत्री ने बताया कि 2025-26 में 362.60 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य था, जबकि किसानों ने 376.56 मिलियन टन उत्पादन किया। 2026-27 के लिए देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य 373.93 मिलियन टन रखा गया है। इसमें रबी सीजन का लक्ष्य 177.72 मिलियन टन है। जिन क्षेत्रों में पानी या मिट्टी में नमी कम है, वहां किसानों को अधिक पानी मांगने वाली फसलों के बजाय दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की बुवाई के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
22 अक्टूबर से चलेगा ‘खेत बचाओ अभियान’
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि खरीफ सीजन में प्रमुख राज्यों के दो-दो जिलों में मिट्टी परीक्षण के आधार पर रासायनिक खाद के संतुलित इस्तेमाल का पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया। इससे उर्वरक की कुल खपत 27 प्रतिशत कम हुई और देश को 1,400 करोड़ रुपए से अधिक की सीधी बचत हुई। अब 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक पूरे देश में ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया जाएगा। इसमें ICAR वैज्ञानिक, KVK विशेषज्ञ, ATMA टीमें और राज्य कृषि विभाग के अधिकारी गांवों और खेतों में पहुंचेंगे। किसानों को मिट्टी की जरूरत के अनुसार यूरिया और DAP के संतुलित इस्तेमाल, उपलब्ध नमी के आधार पर सही फसल व उन्नत किस्म के चयन की जानकारी दी जाएगी। पात्र किसानों के KCC बनवाने और उसके सही इस्तेमाल पर भी काम होगा।
डिजिटल कृषि और फसल रोग नियंत्रण पर जोर
श्री चौहान ने बताया कि किसानों के लिए विशिष्ट फार्मर आईडी बनाने का काम तेजी से चल रहा है। एग्रीस्टैक के जरिए सरकारी योजनाओं और तकनीकी सलाह किसानों के मोबाइल तक पहुंचाई जा रही है। प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के साथ FTA के तहत भारतीय कृषि उत्पादों के लिए उपलब्ध वैश्विक बाजार के अवसरों की जानकारी भी किसानों तक पहुंचाई जा रही है। गन्ने में रेड रॉट और कपास में पिंक बॉलवर्म की रोकथाम के लिए ICAR के वैज्ञानिक रोग-प्रतिरोधी नई किस्में विकसित करने पर काम कर रहे हैं। खाद्य तेलों के आयात शुल्क को लेकर उन्होंने कहा कि सरकार को घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरत और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाकर निर्णय लेना पड़ता है।
पराली के नाम पर किसानों को दोषी ठहराने का विरोध
दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण के सवाल पर श्री चौहान ने कहा कि वर्ष 2019-20 में प्रदूषण में पराली का योगदान करीब 7 प्रतिशत था, जो अब घटकर लगभग 2.5 प्रतिशत रह गया है। उन्होंने कहा कि किसान खुद पराली जलाना पसंद नहीं करते। उन्होंने खेतों को रेड जोन में डालने और किसानों पर सख्त कार्रवाई को लेकर कहा कि प्रदूषण के लिए केवल किसानों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। समस्या का समाधान किसानों से संवाद, सहयोग और आधुनिक मशीनरी उपलब्ध कराकर किया जाना चाहिए।
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