क्या अमेरिका से जीरो ड्यूटी पर कपास भी आएगा?
15 फरवरी 2026, नई दिल्ली: क्या अमेरिका से जीरो ड्यूटी पर कपास भी आएगा? – भारत-अमेरिका के प्रस्तावित ट्रेड डील के बाद कृषि क्षेत्र में भी हलचल है और इसी दौरान एक बात भी सामने आ रही है कि क्या इस ट्रेड डील के बाद अमेरिका से जीरो ड्यूटी पर कपास भी आएगा…! हालांकि अभी यह आशंका है लेकिन इस मामले में बहस जारी है।
ट्रेड डील के खिलाफ जितने भी विरोध चल रहे हैं, उसमें एक मुद्दा कपास का जीरो इंपोर्ट ड्यूटी पर आयात का भी है. किसान संगठनों ने इसे लेकर चिंता जताई है. यह चिंता वाजिब है क्योंकि जब बाहर से सस्ता माल आएगा तो देसी माल कौन खरीदेगा. लेकिन क्या ट्रेड डील के बाद ही भारत में अमेरिकी कपास की एंट्री होगी? ऐसा नहीं है. भारत वर्षों से अमेरिकी कपास खरीदता रहा है, जिसमें इंपोर्ट ड्यूटी जीरो भी रही है.
कपास के इस आयात की पुख्ता वजह है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उगाने वाला देश है, फिर भी टेक्सटाइल इंडस्ट्री की एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल (ELS) कॉटन की जरूरत पूरी करने के लिए आयात करना पड़ता है. हालांकि यह आयात केवल अमेरिका से नहीं होता, बल्कि इस सोर्स में कई देश शामिल हैं. यानी निर्भरता सिर्फ अमेरिका पर नहीं है. तभी कई जानकार ट्रेड डील में कपास आयात पर बहुत चिंता ना करने की सलाह दे रहे हैं. ट्रेड डील से पहले भी भारत अमेरिका समेत कई देशों से कपास आयात करता रहा है. ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि नई डील के तहत अगर ड्यूटी-फ्री या कोटा आधारित इंपोर्ट की व्यवस्था होती है, तो यह मौजूदा ट्रेंड का विस्तार होगा, न कि पूरी तरह नई शुरुआत. डीजीसीआईएसएम, कोलकाता के अनुसार, भारत पिछले 5 वर्षों से कई देशों से कपास आयात करता रहा है जिनमें अमेरिका, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, माली, मिस्र, कोटे डी आइवर, तंजानिया, इजराइल, ग्रीस, सूडान और अन्य देश शामिल हैं. यानी ट्रेड डील से पहले भी कपास का आयात जारी था. लेकिन किसान संगठनों सहित विपक्षी दलों का विरोध जारी है. ऐसे में कुछ मुद्दों पर गौर करना जरूरी है.
पिछले पांच वर्षों में भारत की कपास मांग के लिए अमेरिका लगातार प्रमुख सप्लायरों में शामिल रहा है. हालांकि ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से भी बड़े पैमाने पर कपास की खरीद होती रही है. हाई क्वालिटी वाले फाइबर की मांग का एक हिस्सा विदेशी बाजारों से ही पूरा किया जाता है.
ट्रेड डील पर किसान संगठनों का तर्क है कि किसी भी तरह की रियायत घरेलू कीमतों पर दबाव डाल सकती है, इसलिए सरकार को आयात और स्थानीय हितों के बीच संतुलन साधना होगा. किसान संगठनों को चिंता है कि दुनिया के सबसे बड़े फाइबर एक्सपोर्टर अमेरिका से ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की इजाजत देने से घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है. जबकि जानकार इसका असर कम रहने की उम्मीद जता रहे हैं, क्योंकि सरकार ने सिर्फ एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल कॉटन के इंपोर्ट की इजाजत दी है, और वह भी एक कोटा के तहत.
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