राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

क्यों मोदी सरकार 3.0 ने किसानों के आंदोलन से बनाई दूरी? ये हैं 3 बड़े कारण

साल 2020-21 में सक्रिय थी सरकार, अब क्यों बदल गया रुख?

06 जनवरी 2025, नई दिल्ली: क्यों मोदी सरकार 3.0 ने किसानों के आंदोलन से बनाई दूरी? ये हैं 3 बड़े कारण – 2020-21 में मोदी सरकार ने किसान आंदोलन के दौरान उनकी यूनियनों के साथ 11 दौर की बातचीत की और आखिरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया था। लेकिन इस बार सरकार का रवैया पूरी तरह बदल गया है। एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) कानून समेत 12 मांगों को लेकर किसानों का आंदोलन जारी है, लेकिन मोदी सरकार 3.0 इस बार बातचीत करने से बच रही है।

शनिवार को हरियाणा-पंजाब के खनौरी बॉर्डर पर किसानों की महापंचायत हुई, जहां भूख हड़ताल पर बैठे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल को स्ट्रेचर पर लाकर मंच पर बिठाया गया। उन्होंने एमएसपी कानून समेत 12 मांगों पर चर्चा की। सवाल यह है कि केंद्र सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल की तरह इस बार किसानों से सक्रिय बातचीत क्यों नहीं की?

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मोदी सरकार 2.0: लंबी बातचीत के बावजूद आंदोलन की जीत

2020-21 के दौरान, जब किसान तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर डटे थे, तब सरकार ने 11 दौर की बातचीत की। तत्कालीन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, खाद्य मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्य मंत्री सोम प्रकाश ने किसानों से लगातार मुलाकात की। यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी किसानों के साथ बातचीत में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

हालांकि, 2021 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानूनों पर रोक लगाने और किसानों के दबाव में पीएम मोदी को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। यह आंदोलन देशभर में बड़ा जनाधार बना चुका था और सरकार पर दबाव बढ़ता गया।

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किसान आंदोलन 2024: प्रमुख मांगें और उनकी स्थिति

वर्तमान आंदोलन में किसानों ने एमएसपी को कानूनी दर्जा देने, कृषि ऋण माफी, फसल बीमा योजना में सुधार, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने, किसानों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने, बिजली संशोधन विधेयक को वापस लेने, गन्ना किसानों का भुगतान समय पर करने, मंडियों को सुदृढ़ करने, प्राकृतिक आपदाओं के कारण नुकसान का मुआवजा देने, छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष पैकेज उपलब्ध कराने, भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करने और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर किसानों पर लगाए गए प्रतिबंधों की समीक्षा करने जैसी 12 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें से सबसे प्रमुख मांग एमएसपी कानून को लेकर है, जिसे लेकर किसान लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं।

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मोदी सरकार 3.0 क्यों प्रदर्शनकारी किसानों से बनाई हुई है दूरी?

मोदी सरकार 3.0 का बदला हुआ रुख कई वजहों से हो सकता है।

1. आंदोलन का सीमित दायरा: इस बार का किसान आंदोलन सिर्फ पंजाब और हरियाणा सीमा तक सिमटा हुआ है। 2020-21 के आंदोलन की तरह इसका भौगोलिक और राजनीतिक प्रभाव उतना व्यापक नहीं है। यह केंद्र सरकार के लिए आंदोलन को अनदेखा करना आसान बनाता है।

2. प्रमुख संगठनों की गैर-मौजूदगी: पिछले आंदोलन में कई बड़े किसान संगठन, जैसे संयुक्त किसान मोर्चा (SKM), सक्रिय थे। हालांकि, इस बार वे आंदोलन का हिस्सा नहीं हैं। कई किसान संगठन इसका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी नहीं दिख रही है।

3. मांगों का विभाजन: 2020-21 का आंदोलन तीन कृषि कानूनों को लेकर केंद्रित था, जबकि इस बार एमएसपी कानून, कृषि ऋण माफी, और अन्य मांगें शामिल हैं। सरकार के लिए इन मांगों पर अलग-अलग रणनीति अपनाना आसान हो सकता है।

महापंचायत में भूख हड़ताल पर बैठे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने किसानों को संबोधित करते हुए सरकार के रवैये पर सवाल उठाए। उनकी भूख हड़ताल आंदोलन का मुख्य केंद्र बिंदु बन गई है। डल्लेवाल का कहना है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक उनका प्रदर्शन जारी रहेगा।

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सरकार का मानना है कि पिछली बार की बातचीत ने आंदोलन को और उग्र बना दिया था। कृषि भवन में किसानों और अधिकारियों के बीच हुई बैठक में हंगामा हुआ था, जिसके बाद किसानों ने कृषि भवन के बाहर कानूनों की प्रतियां जलाकर विरोध किया। सरकार का यह भी मानना है कि एमएसपी पर कानून बनाने से कृषि क्षेत्र में बड़ी आर्थिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट समिति की रिपोर्ट: एक नजर

2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों पर विचार-विमर्श के लिए एक चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। हालांकि, समिति की सिफारिशों को सरकार ने लागू नहीं किया। रिपोर्ट में एमएसपी पर कानून बनाने की आवश्यकता और कृषि सुधारों की सिफारिश की गई थी। इस रिपोर्ट का मौजूदा आंदोलन पर कोई खास प्रभाव नहीं दिखा है।

क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति पर आंदोलन का असर

  • पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि-प्रधान राज्यों में यह आंदोलन सरकार के लिए चुनौती बन सकता है।
  • विपक्षी दल, जैसे कांग्रेस और आम आदमी पार्टी, आंदोलन को समर्थन देकर इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
  • आने वाले लोकसभा चुनावों में यह आंदोलन एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में।

मोदी सरकार 3.0 का बदला हुआ रुख कई वजहों से हो सकता है। सीमित दायरा, प्रमुख संगठनों की गैर-मौजूदगी, और कई मांगों का होना इसके पीछे प्रमुख कारण हैं। हालांकि, किसानों का कहना है कि उनकी मांगे जायज हैं और सरकार को बातचीत करनी चाहिए।

(किसानों की मांगों और सरकार के बीच का यह गतिरोध आने वाले समय में भारतीय राजनीति और कृषि व्यवस्था को किस दिशा में ले जाएगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।)

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