राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

तेल के बदले एथेनॉल: समाधान जब समस्या बन जाए

03 जुलाई 2026, नई दिल्ली: तेल के बदले एथेनॉल: समाधान जब समस्या बन जाए – पश्चिम एशिया में जारी महासंग्राम व दुनिया में तेल का टोटा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में भारत खाद्य फसलों के स्टॉक और भविष्य में खत्म जाने वाले एथेनॉल का उत्पादन जा रहा है। ऐसे में सोचिए, जब पेट्रोलियम का उत्पादन पूरी तरह से खत्म हो जाएगा तब फसलों का उपयोग किया जाना लगेगा?

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, वैश्विक अस्थिरता और बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं ने ऊर्जा के एक बार फिर ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। केवल तेल की बढ़ती कीमतों और ईंधन मूल्यों पर पड़ रहे दबाव के बीच भारत में इन दिनों ‘एशियन एनर्जी’ (एंट्रेस में प्रकाशित की रिपोर्ट) को ऊर्जा सुरक्षा पर एक बड़े समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार ने 2025-26 तक ग्रीन में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। साथ, गन्ना जैसी पारंपरिक फसलों से बढ़ावा जाने वाली ‘पहली अल्कोहल’ या एथेनॉल पहली पीढ़ी में ऐसी ऊर्जा आधारित, अवशिष्ट तथा गैर मिश्रित से बनी कमी और कार्बन उत्सर्जन घटाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम प्रतीत होती है। परन्तु मैं एक कार्यक्रम के दौरान पढ़ते होता हूं। प्रश्न यह है कि क्या हम तेल आयात का बिल कम करने की दिशा में उपलब्ध अपनी आजीविका भूमि, भूमि और खाद्य-सुरक्षा दांव लगा रहे हैं?

इंडियन बायोएथेनॉल: जनसामान्यी के सेक्टर का नया? मौजूदा परिप्रेक्ष्य में इंडियन बायो एथेनॉल के बारे में कि भूमि भी फसली बायोलॉजिकल संकट का समाधान के लिए उपलब्ध है क्योंकि इतनी भूमि की गई, वह एक नए संकट की ओर बढ़ रही है। यही वजह है कि ग्रीन एथेनॉल के संदर्भ में भी हमें इसी पॉलिसी आधारित से संबंधित आवश्यकताओं से गहरा असर भारत के पूरे वैश्विक नेतृत्व से जुड़ा रहा था। रायस्थनिक कृषि, गेहूं खोजों और अत्यधिक सिंचाई पर आधारित ‘हरित क्रांति’ ने तकनीकी भूख को समस्या का समाधान किया और भारत को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, किंतु आज वही मॉडल मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, जैव-विविधता के क्षरण, रासायनिक प्रदूषण और भूजल-दोहन जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन चुका है।

नलकूप क्रांति: किसानों को मानसून की अनिश्चितता से बचाने के लिए और भूजल आधारित सिंचाई को प्रोत्साहित किया गया। कुछ दशकों बाद स्थिति यह है कि भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा दोहनकर्ता बन गया है और अनेक क्षेत्र ‘डार्क जोन’ घोषित किए जा चुके हैं। आज एथेनॉल नीति के संदर्भ में भी यही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है। क्या हम ऊर्जा सुरक्षा की खोज में जल-सुरक्षा और खाद्य-सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं?

आंकड़ों के पीछे छिपा जल संकट: भारत में वर्तमान में मुख्यतः ‘पहली पीढ़ी’ (1जी) के एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना, चावल और ‘जीएम’ (जेनेटिकली मॉडिफाइड) मक्का जैसी खाद्य फसलो का उपयोग किया जा रहा है। ये फसलें अत्यधिक पानी की मांग करती हैं।

  • एक लीटर गन्ना आधारित एथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 10,790 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
  • एक लीटर गन्ना आधारित एथेनॉल के लिए लगभग 3,630 लीटर पानी खर्च होता है।
  • एक लीटर ‘जीएम’ मक्का आधारित एथेनॉल के लिए लगभग 4,670 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है।

भारत के आंकड़े चार ही आज संकट का सामना कर रहे हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान पेयजल तक की समस्या खड़ी हो जाती है।

ऐसे में खाद्य फसलों की खेती का ईंधन उत्पादन के लिए बढ़ावा देना दीर्घकालिक दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। महाराष्ट्र एवं पंजाब जैसे राज्यों, जहाँ तिलहन, सरसों और कपास जैसी फसलों पर रूप से अपनाया था। इससे खेती-रसायन आधारित होती थी। आज नकदी फसलों और एकल खेती के विस्तार के कारण किसान स्वयं अपने भोजन के लिए बाजार पर निर्भर होते जा रहे हैं।

‘बीज संप्रभुता’ का संकट: देसी बीजों के परंपरागत भंडारण की रही रही है। किसान अब बाजार आधारित संकर बीजों, रासायनिक उर्वरकों और बाहरी आदानों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। इससे खेती की लागत बढ़ी है और किसानों की स्वायत्तता घटती रही है।

भोजन बनाम ईंधन: एथेनॉल नीति का सबसे गंभीर प्रश्न ‘भोजन बनाम ईंधन’ की है। जब खाद्य भूमि और खाद्य फसलें वाहनों के लिए ईंधन उत्पादन में लगाई जाएंगी, तो खाद्य-सुरक्षा पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यदि वैश्विक संकट के कारण वाले और विकसित देशों दोनों ईंधन एथेनॉल की ओर आकर्षित होते हैं, तो भविष्य में देश की दलों और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है। ऐसे में पेट्रोलियम आयात का बिल तो घटेगा, लेकिन भोजन आयात का बिल बढ़ेगा।

ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन जल, भूमि और खाद्य-सुरक्षा की कीमत पर हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए कुछ दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता है।

एथेनॉल उत्पादन को कृषि अपशिष्ट, जैविक कचरे और दूसरी पीढ़ी (2जी) के बायोफ्यूल तक सीमित किया जाए।

  • गन्ना तथा जल-केंद्रित बायोफ्यूल और जैव-ऊर्जा मॉडल विकसित किए जाएं।
  • ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास और रागी जैसी कम पानी वाली मोटे अनाज की फसलों को प्रोत्साहित किया जाए।
  • जल उपयोग, खाद्य-सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव का समग्र मूल्यांकन किए बिना किसी भी विस्तृत नीति को लागू न किया जाए।
  • नीति निर्माण में किसानों, वैज्ञानिकों, स्थानीय समुदायों और नागरिक संस्थाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

एथेनॉल के संबंध में भी यही वही सतर्कता बरतनी होगी। आज जो ऊर्जा सुरक्षा का समाधान प्रतीत हो रहा है, वही कल जल, भूमि, खाद्य-सुरक्षा और कृषि के लिए संकट के रूप में हमारे सामने खड़ा हो सकता है। आवश्यकता है कि निर्णय केवल उत्पादन और उपयोग के स्तर पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों और पृथ्वी के संतुलन की दृष्टि से भी देखें।

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