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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

त्रिपुरा के पारंपरिक चावल की यूरोप में दस्तक, ऑस्ट्रिया-नीदरलैंड्स पहुंची 18 टन की खेप

05 सितंबर 2026, नई दिल्ली: त्रिपुरा के पारंपरिक चावल की यूरोप में दस्तक, ऑस्ट्रिया-नीदरलैंड्स पहुंची 18 टन की खेप –  पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक और जैविक कृषि अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान मजबूत कर रही है। त्रिपुरा की खास पारंपरिक चावल किस्मों ने यूरोपीय बाजार में दस्तक दी है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की पहल से त्रिपुरा से 18 मीट्रिक टन एनपीओपी प्रमाणित पारंपरिक चावल की खेप ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड्स के लिए रवाना की गई है।

2 सितंबर को भेजी गई इस खेप में त्रिपुरा की चार विशिष्ट पारंपरिक चावल किस्में शामिल हैं। इनमें सुगंधित काली खसा चावल, सुगंधित हरिनारायण चावल, बिरोन यानी सफेद चिपचिपा चावल और मैमी हांगा यानी काला चावल प्रमुख हैं। इन किस्मों की विशेषता इनके पारंपरिक स्वरूप, स्वाद और स्थानीय कृषि पद्धतियों से जुड़ी हुई है।

स्थानीय किसान उत्पादक कंपनियों से खरीदा गया चावल

निर्यात के लिए चावल की खरीद सीधे स्थानीय किसान उत्पादक कंपनियों यानी एफपीसी से की गई। इन किसान उत्पादक कंपनियों को त्रिपुरा स्टेट ऑर्गेनिक फार्मिंग डेवलपमेंट एजेंसी का सहयोग प्राप्त है। निर्यात की जिम्मेदारी सोनीपत स्थित मेसर्स प्रतीति ऑर्गेनिक फूड्स ने संभाली।

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इस अंतरराष्ट्रीय निर्यात की राह अगस्त में एपीडा की ओर से त्रिपुरा में आयोजित रिवर्स बायर-सेलर मीट से तैयार हुई थी। इस आयोजन में राज्य के किसानों और उत्पादकों को विदेशी खरीदारों से सीधे जुड़ने का अवसर मिला। बातचीत और कारोबारी संपर्क के बाद त्रिपुरा के पारंपरिक चावल को यूरोपीय बाजार तक पहुंचाने का रास्ता खुला।

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कड़े मानकों के बीच मिली जगह

ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड्स जैसे यूरोपीय बाजारों में खाद्य सुरक्षा, उत्पाद की पहचान, प्रमाणन और आपूर्ति की पारदर्शिता को लेकर कड़े मानक हैं। ऐसे में एनपीओपी प्रमाणित चावल का इन बाजारों तक पहुंचना त्रिपुरा के जैविक कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

यह निर्यात केवल चावल की एक खेप का विदेश पहुंचना नहीं है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक कृषि और स्थानीय जैव विविधता को वैश्विक बाजार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि ऐसे उत्पादों को बेहतर ब्रांडिंग, प्रमाणन और बाजार उपलब्धता मिलती रही तो छोटे किसानों के लिए पारंपरिक फसलों को संरक्षित करते हुए अतिरिक्त आय के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

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