मध्य-पूर्व संघर्ष को कृषि सुधारों के लिए चेतावनी के रूप में देखना चाहिए
लेखक: प्रवेश शर्मा अध्यक्ष, संचालन समिति, NAFPO
22 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: मध्य-पूर्व संघर्ष को कृषि सुधारों के लिए चेतावनी के रूप में देखना चाहिए – भारत को मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष को केवल दूरस्थ भू-राजनीतिक घटना के रूप में नहीं देखना चाहिएबल्कि इसे अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था-विशेषकर कृषि क्षेत्र के लिए एक प्रारंभिक चेतावनी सकेत के रूप में समझना चाहिए। इसके शुरुआती प्रभाव अब विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देने लगे हैं। हालाकि ये अभी व्यापक संकट का रूप नहीं ले पाए हैलेकिन यदि संघर्ष लंबा खिचता है तो ये कमजोरियां गंभीर रूप ले सकती है। नीतिगत प्रतिक्रिया न तो घबराहट में होनी चाहिए और न ही लापरवाही भरी। इसके बजायभल्पकालिक जोखिमों को कम करने और दीर्घकालिक सुधारों की नींव रखने के लिए संतुलित और लक्षित कृषि सुधारों की आवश्यकता है। ये सुधार व्यापक या संरचनात्मक होने की बजाय तत्काल चुनौतियों पर केंद्रित होने चाहिए।

चुनौतियां
1. सबसे पहला असर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ता है। भारतीय कृषि अभी भी डीज़ल पर काफी निर्भर है, खासकर सिंचाई और परिवहन के लिए। पूर्वी भारत जैसे क्षेत्रों में डीज़ल पंप खेती की रीढ़ हैं। यदि ईंधन की उपलब्धता प्रभावित होती है या कीमतें बढ़ती हैं, तो सिंचाई लागत और फसल चयन पर सीधा असर पड़ेगा। साथ ही परिवहन महंगा होने से खाद्य कीमतों में वृद्धि होगी, जिससे महंगाई बढ़ सकती है।
2. दूसरा महत्वपूर्ण असर आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) पर पड़ता है। निर्यात आधारित कृषि क्षेत्रों में पहले से ही शिपिंग में देरी और कंटेनर की कमी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। खाड़ी देशों में मांग में कमी भी स्थिति को और खराब कर सकती है। इससे किसानों की आय घट सकती है और व्यापारियों के लिए नकदी संकट पैदा हो सकता है।
3. तीसरा और सबसे गंभीर खतरा उर्वरकों (फर्टिलाइज़र) की उपलब्धता से जुड़ा है। भारत आयातित उर्वरकों और कच्चे माल पर काफी निर्भर है। यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो खरीफ सीजन में उर्वरकों की कमी और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इससे उत्पादन में गिरावट और फसल पैटर्न में बदलाव हो सकता है।
4. श्रम (लेबर) की स्थिति भी चिंता का विषय है। कुछ संकेत मिल रहे हैं कि औद्योगिक क्षेत्रों से ग्रामीण इलाकों, खासकर पूर्वी भारत की ओर, श्रमिकों की वापसी हो रही है। भले ही यह कोविड-19 जैसी बड़ी स्थिति नहीं है, लेकिन इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय पर दबाव बढ़ सकता है।
5. महंगाई का खतरा भी बना हुआ है। ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि और इनपुट की कमी से खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और निम्न आय वर्ग पर पड़ेगा, जिससे यह एक सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह की चुनौती बन जाएगी।
इन सभी कारकों को देखते हुए, समयबद्ध और केंद्रित कृषि सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट होती है। उद्देश्य होना चाहिए कि बिना बड़े और जटिल बदलावों के, प्रणाली की मजबूती बढ़ाई जाए।
सुधार के क्षेत्र
उर्वरक सब्सिडी
पहली प्राथमिकता उर्वरक सब्सिडी सुधार होना चाहिए। लंबे समय से इसकी कमियों को पहचाना गया है, लेकिन प्रगति सीमित रही है। वर्तमान परिस्थितियों में धीरे-धीरे लेकिन प्रभावी बदलाव किए जा सकते हैं। सरकार किसानों जैसे बड़े समूह के विरोध के कारण सावधानी बरतती है, जो स्वाभाविक है।
एक व्यावहारिक उपाय यह हो सकता है कि कुछ उर्वरकों पर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) लागू किया जाए, जिसे भूमि और फसल योजना से जोड़ा जाए। शुरुआत में यूरिया को इससे बाहर रखा जा सकता है, क्योंकि यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा सकता है ताकि अनुभव के आधार पर सुधार किए जा सकें।इस सुधार से पारदर्शिता बढ़ेगी, रिसाव कम होगा और किसानों को अपनी जरूरत के अनुसार उर्वरक चुनने की स्वतंत्रता मिलेगी।
सार्वजनिक खाद्य वितरण प्रणाली
दूसरा सुधार सार्वजनिक खाद्य वितरण प्रणाली से जुड़ा है। कोविड-19 के दौरान लागू की गई मुफ्त खाद्यान्न वितरण जैसी योजनाओं की अब समीक्षा करने की जरूरत है। इन्हें धीरे-धीरे और पारदर्शी तरीके से कम किया जाना चाहिए, साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जरूरतमंदों के लिए आवश्यक योजनाएं जैसे मिड-डे मील, आंगनवाड़ी और लक्षित पीडीएस जारी रहें।
कृषि विविधीकरण
तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र कृषि विविधीकरण है। केवल अनाज उत्पादन पर निर्भरता जोखिम भरी है। डेयरी, पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देकर किसानों की आय को स्थिर किया जा सकता है।इस दिशा में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी जरूरी है। किसान उत्पादक संगठन (FPO), सहकारी समितियां और महिला स्वयं सहायता समूह इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
कृषि अनुसंधान
चौथा सुधार कृषि अनुसंधान और विकास (R&D) से जुड़ा है, खासकर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में। सूखा सहनशील किस्में, जल बचाने वाली तकनीक और सटीक खेती (प्रिसिजन फार्मिंग) जैसे क्षेत्रों में निवेश जरूरी है। इसके लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
ग्रामीण वित्तीय ढांचे
पांचवां क्षेत्र ग्रामीण वित्तीय ढांचे को मजबूत करना है। सहकारी संस्थाओं को आधुनिक बनाना और डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ाना जरूरी है ताकि किसानों को बेहतर वित्तीय सेवाएं मिल सकें।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सुधारों के लिए बड़े वित्तीय खर्च की आवश्यकता नहीं है। यह अधिकतर मौजूदा संसाधनों के बेहतर उपयोग और नीतियों के पुनर्गठन से संभव है।राजनीतिक दृष्टि से भी छोटे और व्यावहारिक सुधार बड़े बदलावों की तुलना में अधिक संभव होते हैं। इससे विश्वास बढ़ता है और भविष्य में बड़े सुधारों का रास्ता साफ होता है।कुछ लोग मानते हैं कि अनिश्चितता के समय सुधार नहीं करने चाहिए, लेकिन वर्तमान स्थिति में सुधार न करना जोखिम को और बढ़ा सकता है। वहीं बड़े सुधारों की मांग व्यवहारिक नहीं हो सकती, क्योंकि इसके लिए व्यापक सहमति की जरूरत होती है।
अंत में, सफल क्रियान्वयन सबसे महत्वपूर्ण है। पायलट प्रोजेक्ट, राज्यों के साथ सहयोग और स्पष्ट संवाद इस प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।भारत की कृषि ने कोविड-19 जैसे संकटों में अपनी मजबूती दिखाई है, लेकिन इसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। वैश्विक घटनाओं का प्रभाव इस पर पड़ता ही है।निष्कर्ष रूप में, यह समय सीमित लेकिन प्रभावी कृषि सुधारों का है, जिससे जोखिम कम किए जा सकें और भविष्य के लिए मजबूत आधार तैयार किया जा सके।
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