राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

सूने हैं पनघट और प्यासे हैं पोखर-ताल

लेखक: प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

02 अप्रैल 2025, नई दिल्ली: सूने हैं पनघट और प्यासे हैं पोखर-ताल – विश्व जल दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक विश्व जल विकास रिपोर्ट जारी की जाती है जिसमें विभिन्न देशों में जल के संसाधनों, नागरिकों तक की जल की उपलब्धता, घटते भूजल के स्तर और किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख होता है। वर्ष 2025 की थीम ग्लेशियर संरक्षण है, ग्लेशियर ही नदियों के मायके हैं।

संस्कृत वांग्मय का आंगन जल-महात्म्य के श्लोंको-ऋचाओं से परिपूर्ण है। ‘आप: वंदे मातरम्’ कह कर प्राणिमात्र के पोषण के लिए जल को माता की भूमिका में स्वीकार कर श्रद्धा एवं सम्मान अर्पित किया गया है। लोक जीवन में जल वरुण देवता के रूप में पूजित एवं अर्चित हैं। हिंदू परम्परा में जन्म से मृत्यु पर्यंत समस्त कर्मकाण्ड जल के सान्निध्य में ही सम्पन्न होते हैं। नव प्रसूता द्वारा कुआं पूजन की रस्म इसी रीति का आवश्यक अंग बनकर जीवन के सर्वांगीण विकास में जल की उपयोगिता पर लोक की ललित छाप ही है। किसी अनुष्ठान हेतु उद्यत यजमान हथेली में कुश, अक्षत और जल लेकर ही संकल्पबद्ध होता है। तो सरिता एवं सरोवरों में स्नानोपरांत अंजुलि में जल लेकर सूर्य को अर्पित कर लोक के योगक्षेम की कामना के मनोहारी दृश्य भी दिखते हैं।

संस्कृत काव्य का प्रथम छंद प्रवाहित सरिता-नीर के जल मध्य ही ऋषि वाल्मीकि के मुख से उच्चरित हुआ था। जल का अघ्र्य देकर ही देवता और अतिथि के अर्चन, वंदन एवं सत्कार करने की हमारी शाश्वत परम्परा अनवरत् गतिमान है। जल ही रक्त का रूप धारण कर हमारी देह में दौड़ रहा है।

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जल जीवन का पर्याय है, जल मानवीय अस्तित्व, अस्मिता और गौरव का आधार है। जल मर्यादा का बिम्ब बनकर उभरा तो पौरुष, शौर्य और पराक्रम का सुदृढ़ स्तम्भ भी। तभी तो किसी के अमर्यादित कर्म पर कहा गया कि उसके आंख का पानी मर गया है और युद्ध के लिए एक-दूसरे को चुनौती देने में कहते हैं कि देह में पानी बचा हो तो मैदान में आओ। इतना ही नहीं, प्राणिमात्र की उत्पत्ति भी जल में ही हुई है। मानव सभ्यताएं जल के स्रोतों-संसाधनों के आसपास ही विकसित हुईं, इसीलिए उन्हें नदी-घाटी सभ्यता कहा जाता है। पर अति आधुनिकता के दौर में भोगवादी पालने में बैठा मानव जल को केवल उपभोग की वस्तु समझ केवल वर्तमान जी रहा है। उसे बिल्कुल भान नहीं है कि उसके पैरों के नीचे की नमी सूख चुकी है। और यह नमी का सूखना दरअसल मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का सूखना-छीजना है।

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प्रकृति और मानव के परस्पर आत्मीय सम्बन्धों का निर्जल एवं रसहीन हो जाना है। ऐसे रसहीन जीवन में कुंठा, घृणा, हिंसा, अमानवीयता तो सम्भव है पर प्रेम, माधुर्य, सौहाद्र्र, सौंदर्य, समता, सद्भाव, अहिंसा एवं शांति का अजस्र स्रोत सम्भव नहीं।

भले ही आज की पीढ़ी ने जल संसाधनों के संरक्षण एवं सम्वद्र्धन से दूरी बना मुंह मोड़ लिया हो पर हमारे पूर्वजों ने जल संसाधनों के रूप में कुंआ, तालाब, पोखर, बावड़ी आदि न केवल निर्मित किये बल्कि उनको समाज का एक जरूरी हिस्सा मानकर संवर्धन एवं संरक्षण के लगातार उपाय भी करते रहे हैं। इसीलिए तालाब-कुएं खुदवाना पुण्य का क्षेत्र माना गया और जो सामर्थ्यवान थे, वे नैतिक दृष्टि से इस जल संरक्षण परम्परा को सहर्ष स्वीकारते भी रहे। जल स्रोतों को दूषित करना पाप कर्म समझा गया। नदी, सरोवर आदि के निकट भी गंदगी करना, साबुन से कपड़े धोना वर्जित था। नदियां मां समान थी, तभी श्रम क्लांत और आतप से तप्त देह शीतल सरिता जल में अवगाहन कर पुन: नवल ऊर्जा एवं उत्साह संजो लेती। पर समय कहां ठहरता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के एक आंकड़े के अनुसार 3-4 अरब लोग प्रत्येक वर्ष एक महीने के लिए पानी की उपलब्धता की भारी कमी से गुजरते हैं। विश्व के सभी देशों में सभी नागरिकों को स्वच्छ एवं सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने, जल संरक्षण के महत्व पर जागरुकता का प्रसार करने और जल के समुचित उपयोग करने के लिए 1992 में रियो डि जेनेरियो (ब्राजील) में संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं विकास विषय पर आयोजित सम्मेलन में विश्व जल दिवस मनाने की घोषणा की गई थी। 1993 में पहली बार विश्व जल दिवस मना कर संपूर्ण विश्व का ध्यान इस गंभीर संकट की ओर खींचा गया।

विश्व जल दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक विश्व जल विकास रिपोर्ट जारी की जाती है जिसमें विभिन्न देशों में जल के संसाधनों, नागरिकों तक की जल की उपलब्धता, घटते भूजल के स्तर और किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख होता है। 2025 की थीम ग्लेशियर संरक्षण है, ग्लेशियर ही नदियों के मायके हैं।

जल संरक्षण के लिए जरूरी है कि हमारे मन में जल के प्रति श्रद्धा का भाव जगे। जल के प्राकृतिक संसाधनों नदियों, झीलों, झरनों के अस्तित्व की रक्षा की जाये, मृतप्राय कुंओं, तालाबों को जीवित कर नये तालाब निर्मित किये जायें। दैनंदिन जीवन में जल का उचित उपयोग करें और वर्षाजल के संचय हेतु उपाय किये जायें। बच्चों से संवाद हो। निश्चित रूप से तब पनघट पनिहारिनों के मंगल गीतों से गुंजित होंगे, पोखर-ताल खुशियों से लहरा रहे होंगे। तब यह धरती समृद्ध सलिला होगी और हमारा जीवन भी होगा जल से भरा-भरा, सुरभित, शीतल एवं सतत प्रवाहमय।

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