‘नैनो आबा’ नेटवर्क: चीन से भारत तक ₹400 करोड़ कीटनाशक तस्करी पाइपलाइन का खुलासा
17 मार्च 2026, मुंबई: ‘नैनो आबा’ नेटवर्क: चीन से भारत तक ₹400 करोड़ कीटनाशक तस्करी पाइपलाइन का खुलासा – हाल ही में सार्वजनिक हुए एक सीमा शुल्क (Customs) आदेश ने केवल एक तस्करी गिरोह का ही नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र का पर्दाफाश किया है जिसके माध्यम से अवैध कृषि रसायन चीन की फैक्ट्रियों से निकलकर भारतीय खेतों तक पहुँच रहे हैं। यह पूरा नेटवर्क नियामकीय जाँच, सुरक्षा मानकों और कर प्रणाली को दरकिनार करते हुए संचालित हो रहा था।
न्हावा शेवा स्थित जवाहरलाल नेहरू कस्टम हाउस के आदेश संख्या 235/2025-26 (Order No. 235/2025-26) में दर्ज जाँच विवरण इस पूरे नेटवर्क की कार्यप्रणाली को सामने लाता है। 17 अक्टूबर को जारी इस आदेश में बताया गया है कि इस सिंडिकेट ने लगभग ₹400 करोड़ मूल्य के कीटनाशकों की तस्करी की। लेकिन किसानों और उपभोक्ताओं के लिए इस दस्तावेज़ का सबसे बड़ा संकेत केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि यह है कि यह अवैध तंत्र कितनी आसानी से काम कर रहा है।
कोडित संदेशों के माध्यम से ऑर्डर की प्रक्रिया
इस नेटवर्क की शुरुआत किसी शिपिंग कंटेनर से नहीं, बल्कि एन्क्रिप्टेड संदेश से होती थी। जाँच में पाया गया कि सूरत के व्यापारी विदेशी, विशेष रूप से चीनी आपूर्तिकर्ताओं से व्हाट्सएप और वीचैट (WeChat) मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से संपर्क करते थे।
पकड़े जाने से बचने के लिए वे कोड भाषा का उपयोग करते थे। उदाहरण के लिए, कीटनाशक एबामेक्टिन (Abamectin) को “Aba” और उसके एक संस्करण को “Nano Aba” कहा जाता था।
कस्टम्स आदेश में शामिल चैट के स्क्रीनशॉट में “2 MT of Aba” जैसी बातचीत दर्ज है, जिससे स्पष्ट होता है कि उत्पाद, मात्रा और सौदे की शर्तें सभी कोड में तय की जाती थीं, इससे पहले कि कोई शिपिंग दस्तावेज तैयार किया जाए।
बिल ऑफ लैडिंग में गलत घोषणा के जरिए असली माल छिपाना
सौदा तय होने के बाद अगला चरण होता था सीमा पार माल भेजने का, जहाँ असली छिपाव होता था। वास्तविकता यह थी कि आपूर्तिकर्ता कंटेनरों में उच्च मूल्य वाले कीटनाशक जैसे क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल (Chlorantraniliprole) या एमामेक्टिन बेंजोएट (Emamectin Benzoate) भरते थे।
लेकिन बिल ऑफ लैडिंग, जो शिपिंग का मुख्य दस्तावेज होता है, उसमें माल को जानबूझकर गलत तरीके से “विनाइल एसीटेट एथिलीन कोपॉलिमर (Vinyl Acetate Ethylene Copolymer)” घोषित किया जाता था।
यह एक सस्ता औद्योगिक रसायन है, जो आमतौर पर चिपकने वाले पदार्थ और पेंट में उपयोग होता है।
इससे कागज़ों में यह कंटेनर साधारण औद्योगिक माल जैसा दिखता था, जबकि वास्तव में उसमें नियंत्रित कृषि रसायन भरे होते थे।
अंडर-इनवॉयसिंग और हवाला के जरिए वित्तीय धोखाधड़ी
यह चरण पूरे अपराध का आर्थिक केंद्र था। आयातक को विदेशी आपूर्तिकर्ता को असली कीमत का भुगतान करना होता था, लेकिन सरकार को केवल एक बहुत छोटा हिस्सा दिखाया जाता था।
इसके लिए आयातक एक कम मूल्य का फर्जी बिल बनाता था, जिसमें घोषित “औद्योगिक रसायन” की कीमत बहुत कम दिखाई जाती थी।
जाँच रिपोर्ट के अनुसार, एक मामले में 7,000 किलोग्राम कीटनाशक, जिसकी वास्तविक कीमत लगभग ₹70 प्रति किलोग्राम थी, उसे केवल ₹2 प्रति किलोग्राम की दर से दिखाया गया।
कस्टम क्लियरेंस के लिए यह छोटी राशि बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से भेजी जाती थी।
लेकिन असली भुगतान अलग तरीके से किया जाता था।
बाकी लगभग 90 प्रतिशत भुगतान हवाला नेटवर्क के माध्यम से किया जाता था। इस उदाहरण में लगभग ₹3.81 करोड़ का अंतर हवाला चैनलों के जरिए चुकाया गया।
कस्टम्स आदेश के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत भुगतान इसी अवैध प्रणाली से किए गए, जिसकी पुष्टि फॉरेंसिक जाँच से हुई।
बिना अनुमति वाली फैक्ट्रियों से उत्पादन
जाँच में यह भी सामने आया कि यह नेटवर्क केवल नाम बदलकर ही काम नहीं कर रहा था, बल्कि अनधिकृत उत्पादन इकाइयों से भी माल खरीद रहा था।
उदाहरण के लिए, एम/एस शंघाई मिंगडौ केमिकल कंपनी लिमिटेड कंपनी , जिसने सूरत के व्यापारियों को क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल (सीटीपीआर) उपलब्ध कराया, चीन में उस कीटनाशक के उत्पादन के लिए अधिकृत नहीं थी।
इसके अलावा केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति में भी CTPR के आयात के लिए उस समय कोई पंजीकृत स्रोत उपलब्ध नहीं था।
इस प्रकार यह नेटवर्क चीन के उत्पादन नियमों और भारत की सुरक्षा पंजीकरण प्रणाली दोनों को शुरू से ही दरकिनार कर रहा था।
किसानों और बाजार पर असर
जब यह कंटेनर भारत पहुँचते और फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर क्लीयर हो जाते, तब असली माल सामने आता था।
केंद्रीय कीटनाशक प्रयोगशाला, फरीदाबाद में भेजे गए नमूनों ने न केवल इस धोखाधड़ी की पुष्टि की, बल्कि यह भी बताया कि इन उत्पादों में से कई भारतीय गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरते थे।
इसके बाद यह निम्न गुणवत्ता वाले कीटनाशक अनजान किसानों को बेच दिए जाते थे, जिससे कीट नियंत्रण प्रभावी नहीं होता और फसल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ता है।
साथ ही, यह अवैध माल वैध भारतीय कृषि रसायन कंपनियों को भी भारी नुकसान पहुँचाता है, जो सभी नियमों का पालन करते हुए और कर का भुगतान करते हुए व्यापार करती हैं।
सख्त निगरानी की जरूरत
कस्टम्स आदेश में यह भी कहा गया है कि यह गिरोह संभवतः ऐसे कई सक्रिय नेटवर्कों में से केवल एक है।
इस प्रकार की तस्करी को रोकने के लिए रिपोर्ट में अनिवार्य क्यूआर कोड प्रणाली, आपूर्ति श्रृंखला ऑडिट और कड़े आयात नियंत्रण जैसे कदमों की सिफारिश की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन उपायों को सख्ती से लागू नहीं किया जाता, तब तक यह अवैध पाइपलाइन कृषि, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
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