कुफरी हिमालिनी आलू की किस्म ने बदली किसान की तकदीर, 26.85% बढ़ा उत्पादन; एक हेक्टेयर में 97 हजार रुपये की ज्यादा कमाई
06 नवंबर 2026, त्रिपुरा: कुफरी हिमालिनी आलू की किस्म ने बदली किसान की तकदीर, 26.85% बढ़ा उत्पादन; एक हेक्टेयर में 97 हजार रुपये की ज्यादा कमाई – त्रिपुरा के धलाई जिले के सलेमा गांव के किसान पबिर दास ने आलू की उन्नत किस्म कुफरी हिमालिनी की खेती से शानदार सफलता हासिल की है। रबी सीजन 2025–26 में पारंपरिक किस्म कुफरी ज्योति की जगह कुफरी हिमालिनी अपनाने से उनके आलू उत्पादन में 26.85 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इतना ही नहीं, उन्नत किस्म और वैज्ञानिक खेती पद्धतियों के इस्तेमाल से उन्हें प्रति हेक्टेयर करीब 97,570 रुपये का अतिरिक्त शुद्ध लाभ भी मिला। यह सफलता क्षेत्र के दूसरे आलू उत्पादकों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई है।
धान के बाद आलू त्रिपुरा की दूसरी प्रमुख फसल
त्रिपुरा में आलू रबी सीजन की महत्वपूर्ण सब्जी और नकदी फसल है। राज्य की फसल प्रणाली में धान के बाद इसका दूसरा स्थान है। हालांकि, आलू की खेती से बेहतर उत्पादन और आमदनी प्राप्त करने के लिए कई बातों का ध्यान रखना जरूरी है। इनमें स्वस्थ बीज कंदों का चयन, उपयुक्त किस्म, खेत में जल निकासी की व्यवस्था, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, समय पर सिंचाई और रोगों का प्रभावी नियंत्रण शामिल हैं। राज्य की आर्द्र जलवायु में पछेती झुलसा रोग का खतरा भी बना रहता है। ऐसे में उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक खेती पद्धतियों को अपनाना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
केवीके के मार्गदर्शन में किया गया प्रदर्शन
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), धलाई की ओर से रबी सीजन 2025–26 में किसान पबिर दास के खेत पर अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन और किस्म लोकप्रियकरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस पहल को पूर्वोत्तर पर्वतीय (एनईएच) घटक योजना के तहत भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली से तकनीकी और आदान संबंधी सहायता मिली। वहीं, भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), जोन-VII, उमियम, मेघालय ने तकनीकी पर्यवेक्षण किया। इस प्रदर्शन का उद्देश्य धलाई जिले की कृषि-जलवायु परिस्थितियों में पारंपरिक किस्म कुफरी ज्योति की तुलना में उन्नत किस्म कुफरी हिमालिनी के प्रदर्शन का आकलन करना था।
बीज चयन से लेकर सिंचाई तक अपनाई वैज्ञानिक पद्धतियां
इस कार्यक्रम के तहत किसान को केवल नई किस्म के बीज उपलब्ध कराने तक ही सीमित नहीं रखा गया, बल्कि खेती की पूरी प्रक्रिया में वैज्ञानिक मार्गदर्शन भी दिया गया। केवीके के वैज्ञानिकों ने स्वस्थ और रोगमुक्त बीज कंदों का चयन करने के साथ उचित जल निकासी वाले खेत की तैयारी के बारे में जानकारी दी। आलू की बुवाई मेड़ों पर 60 × 20 सेंटीमीटर की दूरी पर की गई।
इसके अलावा, मिट्टी परीक्षण के परिणामों और स्थानीय सिफारिशों के आधार पर जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग किया गया। समय पर खरपतवार नियंत्रण, पौधों पर मिट्टी चढ़ाना और मिट्टी में नमी की जरूरत के अनुसार सिंचाई की व्यवस्था की गई। फसल को पछेती झुलसा रोग से बचाने के लिए नियमित निगरानी भी की गई। वहीं, फसल पकने के बाद कंदों की सावधानीपूर्वक खुदाई और श्रेणीकरण पर भी ध्यान दिया गया।
कुफरी हिमालिनी से 26.85% अधिक मिली उपज
प्रदर्शन के दौरान कुफरी हिमालिनी ने उत्पादन के मामले में बेहतर परिणाम दिए। इस उन्नत किस्म से प्रति हेक्टेयर 32.60 टन आलू का उत्पादन प्राप्त हुआ, जबकि किसान की पारंपरिक किस्म कुफरी ज्योति से 25.70 टन प्रति हेक्टेयर उपज मिली। इस तरह कुफरी हिमालिनी से प्रति हेक्टेयर 6.90 टन अधिक उत्पादन हुआ। यह पारंपरिक किस्म की तुलना में 26.85 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।
रोगों के मामले में भी कुफरी हिमालिनी का प्रदर्शन बेहतर रहा। प्रदर्शन के दौरान इस किस्म में पछेती झुलसा रोग का प्रकोप 4 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि कुफरी ज्योति में यह 12 प्रतिशत था। हालांकि, कुफरी हिमालिनी में मध्यम प्रतिरोधक क्षमता होने के कारण रोग का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होता, लेकिन कम प्रकोप इसे त्रिपुरा जैसे आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों के लिए एक आशाजनक विकल्प बनाता है।
एक हेक्टेयर में 97,570 रुपये का अतिरिक्त शुद्ध लाभ
उत्पादन बढ़ने के साथ किसान की आमदनी में भी इजाफा हुआ। खेत स्तर पर 15 रुपये प्रति किलोग्राम के मॉडल बाजार मूल्य के आधार पर कुफरी हिमालिनी की विपणन योग्य उपज 293.40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आंकी गई। इससे 4,40,100 रुपये प्रति हेक्टेयर का सकल लाभ प्राप्त हुआ। खेती की कुल लागत 1,25,000 रुपये प्रति हेक्टेयर रही। इस तरह किसान को 3,15,100 रुपये का शुद्ध लाभ मिला और लाभ-लागत अनुपात 3.52:1 दर्ज किया गया।
वहीं, पारंपरिक किस्म कुफरी ज्योति से 221.02 क्विंटल प्रति हेक्टेयर विपणन योग्य उपज प्राप्त हुई। इससे 3,31,530 रुपये का सकल लाभ और 2,17,530 रुपये प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ मिला। इस किस्म का लाभ-लागत अनुपात 2.91:1 रहा। दोनों किस्मों की तुलना करें तो कुफरी हिमालिनी से किसान को प्रति हेक्टेयर 97,570 रुपये का अतिरिक्त शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। हालांकि, यह गणना 15 रुपये प्रति किलोग्राम के मॉडल मूल्य पर आधारित है। वास्तविक कमाई बाजार भाव, खेती की लागत और विपणन योग्य उपज के अनुसार बदल सकती है।
किसान ने दूसरे उत्पादकों को भी प्रेरित करने की जताई इच्छा
किसान पबिर दास ने कुफरी हिमालिनी के प्रदर्शन पर संतोष जताया और खेती के दौरान मार्गदर्शन देने के लिए केवीके के वैज्ञानिकों की सराहना की। उन्होंने बताया कि कुफरी ज्योति की तुलना में अधिक उत्पादन मिलने से उन्नत किस्म के प्रति उनका भरोसा बढ़ा है। उन्होंने भविष्य में भी कुफरी हिमालिनी की खेती जारी रखने और गांव के दूसरे किसानों को उन्नत किस्मों के साथ वैज्ञानिक खेती पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने की इच्छा जताई।
दूसरे किसानों के लिए भी बन सकती है मिसाल
सलेमा गांव में किया गया यह प्रदर्शन बताता है कि उन्नत किस्मों के साथ वैज्ञानिक खेती पद्धतियां अपनाकर आलू उत्पादन और किसानों की आय में सुधार किया जा सकता है। किसान पबिर दास के खेत में फसल की अच्छी वृद्धि, कंदों का बेहतर विकास और अधिक उपज आसपास के उन किसानों के लिए व्यावहारिक उदाहरण है, जो अपनी पारंपरिक किस्मों के विकल्प तलाश रहे हैं।
इस सफलता में भाकृअनुप-आईएआरआई की तकनीकी एवं आदान सहायता, केवीके धलाई के वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन और भाकृअनुप-अटारी जोन-VII का तकनीकी पर्यवेक्षण महत्वपूर्ण रहा। यह पहल दर्शाती है कि कृषि अनुसंधान संस्थानों और प्रसार एजेंसियों के समन्वय से उन्नत तकनीकों को किसानों तक पहुंचाया जा सकता है। कुफरी हिमालिनी का आगे मूल्यांकन और लोकप्रियकरण त्रिपुरा सहित पूर्वोत्तर के उपयुक्त कृषि क्षेत्रों में आलू उत्पादकों को बेहतर किस्म चुनने, उत्पादन बढ़ाने और कृषि आय मजबूत करने में मदद कर सकता है।
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