iFMS: भारत में उर्वरक प्रबंधन की डिजिटल क्रांति, सब्सिडी से सप्लाई चेन तक मजबूत हुई निगरानी
01 सितंबर 2026, नई दिल्ली: iFMS: भारत में उर्वरक प्रबंधन की डिजिटल क्रांति, सब्सिडी से सप्लाई चेन तक मजबूत हुई निगरानी – भारत में उर्वरक प्रबंधन को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और डेटा आधारित बनाने की दिशा में इंटीग्रेटेड फर्टिलाइज़र मैनेजमेंट सिस्टम (iFMS) का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) द्वारा उर्वरक विभाग के लिए विकसित और तकनीकी रूप से समर्थित iFMS अब केवल उर्वरक लेन-देन दर्ज करने वाला सिस्टम नहीं, बल्कि उत्पादन से लेकर बिक्री और सब्सिडी प्रबंधन तक पूरे उर्वरक इकोसिस्टम की निगरानी करने वाला एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म बन रहा है।
iFMS उर्वरक उत्पादन, आयात, परिवहन, स्टॉक, खुदरा बिक्री और सब्सिडी प्रोसेसिंग जैसे प्रमुख चरणों को एक डिजिटल व्यवस्था से जोड़ता है। राष्ट्रीय स्तर पर संचालित इस सिस्टम में 14 करोड़ से अधिक आधार-लिंक्ड उर्वरक खरीदार, 2.5 लाख से अधिक खुदरा विक्रेता और सालाना करीब 7 करोड़ मीट्रिक टन उर्वरक बिक्री से जुड़े लेन-देन शामिल हैं। यह प्लेटफॉर्म सालाना लगभग 2 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी के प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
लेन-देन से आगे बढ़कर डेटा आधारित निगरानी
हाल के वर्षों में iFMS की भूमिका को केवल उर्वरक लेन-देन रिकॉर्ड करने तक सीमित नहीं रखा गया है। इसे एकीकृत मॉनिटरिंग और निर्णय लेने में सहायता करने वाले प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके लिए उत्पादन, आयात, डिस्पैच, आवागमन, स्टॉक और खुदरा बिक्री से संबंधित जानकारी को एक साथ उपलब्ध कराने वाले डैशबोर्ड और एनालिटिकल टूल विकसित किए गए हैं। इन टूल्स के माध्यम से राष्ट्रीय, राज्य, जिला और खुदरा विक्रेता स्तर तक उर्वरक व्यवस्था की निगरानी की जा सकती है। इससे असामान्य ट्रेंड और सप्लाई से जुड़ी संभावित समस्याओं की शुरुआती स्तर पर पहचान करने में मदद मिलती है।
डेटा एनालिटिक्स के जरिए अब अलग-अलग श्रेणी के खरीदारों, भूमि स्वामित्व, फसल, जिले और उर्वरक के प्रकार के आधार पर उर्वरक खरीद का विश्लेषण भी संभव हो रहा है। इससे केवल बिक्री का रिकॉर्ड रखने के बजाय उर्वरक खपत के पैटर्न को समझने और जरूरत के आधार पर निगरानी करने में मदद मिल रही है।
किसान, भूमि और फसल डेटा का एकीकरण
डेटा आधारित उर्वरक प्रबंधन की दिशा में iFMS को राज्यों और अन्य सरकारी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध किसान, भूमि एवं फसल डेटाबेस से जोड़ना महत्वपूर्ण कदम रहा है। हरियाणा में ‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ (MFMB) के साथ एकीकरण और इसके बाद एग्रीस्टैक के साथ एकीकरण की दिशा में किए गए प्रयासों से उर्वरक लेन-देन को किसान और कृषि संबंधी जानकारी से जोड़ने का तंत्र विकसित हुआ है।
इन एकीकरणों से उर्वरक खरीदारों का किसान एवं भूमि रिकॉर्ड से मिलान करने में मदद मिली है। साथ ही भूमि और फसल संबंधी डेटा की उपलब्धता तथा उसकी गुणवत्ता से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं की भी पहचान हुई है। इससे किसानों की जरूरतों और उर्वरक खपत को बेहतर तरीके से समझने के लिए उर्वरक लेन-देन डेटा को कृषि डेटा से जोड़ने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
FFS से डिजिटल होगी उर्वरक बुकिंग
इसी अनुभव के आधार पर उर्वरक बिक्री के लिए फ्रेमवर्क (FFS) को एक नई डिजिटल पहल के रूप में विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य मोबाइल ऐप आधारित उर्वरक बुकिंग व्यवस्था को मौजूदा iFMS पॉइंट ऑफ सेल (PoS) इकोसिस्टम से जोड़ना है। इस व्यवस्था के तहत किसान एग्रीस्टैक में उपलब्ध अपनी आईडी के आधार पर आवश्यक उर्वरक की बुकिंग कर सकता है। इसमें भूमि और स्वामित्व संबंधी विवरणों का सत्यापन किया जाता है। इसके बाद QR आधारित बुकिंग तैयार होती है और बुकिंग की जानकारी PoS डिवाइस पर उपलब्ध रहती है। इससे बुक किए गए उर्वरक और वास्तव में खरीदी गई मात्रा के बीच सत्यापन संभव होता है।
FFS को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। इसके माध्यम से उर्वरक की जरूरत, भूमि एवं फसल संबंधी जानकारी, वास्तविक खपत और बुकिंग से जुड़े परिचालन पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। यह व्यवस्था उर्वरक बिक्री में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ डेटा आधारित निगरानी की नई परत तैयार कर रही है।
उर्वरक की आवाजाही पर डिजिटल नजर
उर्वरक की सप्लाई चेन को मजबूत बनाने के लिए व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम (VLTS) के माध्यम से परिवहन की डिजिटल निगरानी भी की जा रही है। यह व्यवस्था उर्वरक डिस्पैच संबंधी जानकारी को वाहन के स्थान से जुड़े डेटा के साथ जोड़कर परिवहन के दौरान खेपों की निगरानी में मदद करती है। VLTS के माध्यम से परिवहन में देरी और असामान्य आवाजाही के पैटर्न की पहचान की जा सकती है। जब इसे iFMS में उपलब्ध डिस्पैच, गुड्स-इन-ट्रांजिट और स्टॉक संबंधी जानकारी से जोड़ा जाता है, तो उर्वरक की डिस्पैच से लेकर अंतिम गंतव्य तक पहुंचने की स्थिति का अधिक व्यापक डिजिटल आकलन संभव होता है।
डिजिटल सब्सिडी प्रोसेसिंग से बढ़ेगी पारदर्शिता
उर्वरक सब्सिडी के प्रबंधन में भी iFMS की अहम भूमिका है। सब्सिडी भुगतान को PoS नेटवर्क के माध्यम से दर्ज वास्तविक उर्वरक बिक्री से जोड़ा जाता है। 1 जनवरी 2026 से सब्सिडी बिलों के इलेक्ट्रॉनिक प्रसंस्करण और PFMS/e-Bill प्रक्रियाओं सहित वित्तीय प्रणालियों के साथ एकीकरण की दिशा में आगे काम किया गया है।
वर्कफ्लो के डिजिटलीकरण से मैनुअल हस्तक्षेप कम करने, ट्रेसेबिलिटी बढ़ाने और सब्सिडी दावों एवं भुगतानों के विभिन्न चरणों की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी में मदद मिल रही है। DBT से जुड़े बिलों और लेन-देन की जांच को मजबूत करने के लिए रैंडम वेरिफिकेशन और अतिरिक्त एनालिटिकल जांच की व्यवस्था भी विकसित की जा रही है।
एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म बनता iFMS
iFMS का विस्तार भारत के उर्वरक इकोसिस्टम में डिजिटल बदलाव को दर्शाता है। उत्पादन, आयात, लॉजिस्टिक्स, स्टॉक, किसान एवं भूमि संबंधी जानकारी, उर्वरक बुकिंग, खुदरा लेन-देन और सब्सिडी प्रोसेसिंग को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ इसकी विश्लेषणात्मक क्षमता भी बढ़ाई जा रही है। MFMB और एग्रीस्टैक के माध्यम से किसान एवं भूमि डेटा के एकीकरण से लेकर FFS, VLTS, डेटा एनालिटिक्स और इलेक्ट्रॉनिक सब्सिडी प्रोसेसिंग तक की पहल iFMS को एक व्यापक डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित कर रही हैं।
अब तकनीक का उपयोग केवल यह दर्ज करने तक सीमित नहीं है कि उर्वरक कहां बिका, बल्कि यह समझने के लिए भी किया जा रहा है कि उर्वरक कहां उपलब्ध है, किस दिशा में जा रहा है, कौन इसे खरीद रहा है, कितनी मात्रा में खपत हो रही है और यह खपत कृषि संबंधी जरूरतों से किस प्रकार जुड़ी है। इससे उर्वरक की समय पर उपलब्धता, पारदर्शिता और डेटा आधारित निर्णय लेने की व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिल रही है।
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