राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

भारत की खाद्य सुरक्षा के भविष्य के लिए जीएम फसलें महत्वपूर्ण, पीएयू कार्यशाला में विशेषज्ञों ने कहा

15 जून 2026, लुधियानाभारत की खाद्य सुरक्षा के भविष्य के लिए जीएम फसलें महत्वपूर्ण, पीएयू कार्यशाला में विशेषज्ञों ने कहा –  जलवायु परिवर्तन, सीमित प्राकृतिक संसाधनों और बढ़ती खाद्य मांग के बीच भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए देश को उन्नत बीज और आनुवंशिक (जेनेटिक) तकनीकों को तेजी से अपनाने की आवश्यकता है। यह बात सोमवार को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना में आयोजित एक कार्यशाला में कृषि एवं बीज क्षेत्र के विशेषज्ञों ने कही।

“कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए नई आनुवंशिक तकनीकें” विषय पर आयोजित इस कार्यशाला का आयोजन पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआईआई) ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों और प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया और भारतीय कृषि के सामने उभरती चुनौतियों के समाधान में आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों तथा जीन एडिटिंग तकनीकों की भूमिका पर चर्चा की।

एफएसआईआई के महानिदेशक डॉ. परेश वर्मा ने कहा कि दुनिया के कई देशों ने कृषि विकास के लिए जैव प्रौद्योगिकी को अपनाया है। वर्तमान में विश्वभर में 22 करोड़ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में जीएम फसलों की खेती हो रही है। अमेरिका, ब्राजील, अर्जेंटीना, कनाडा और फिलीपींस जैसे देश कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए इन तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। वहीं भारत अब भी कई प्रमुख फसलों में उत्पादकता अंतर की चुनौती का सामना कर रहा है, जबकि वर्ष 2050 तक देश की आबादी 1.6 अरब से अधिक होने का अनुमान है।

डॉ. वर्मा ने कहा कि पिछले तीन दशकों में विश्वभर में किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह साबित किया है कि जैव प्रौद्योगिकी खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों का समाधान करने में एक प्रभावी साधन बन सकती है। उनके अनुसार जीएम फसलों ने किसानों को उपज बढ़ाने, फसल नुकसान कम करने और कीटों तथा जलवायु संबंधी तनावों के प्रति अधिक सहनशीलता विकसित करने में मदद की है। उन्होंने कहा कि भारत को इन तकनीकों का मूल्यांकन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करना चाहिए और नवाचार को बढ़ावा देने वाला वातावरण तैयार करना चाहिए।

उन्होंने जीन एडिटिंग को फसल सुधार की अगली महत्वपूर्ण तकनीक बताते हुए कहा कि इसके माध्यम से फसलों के गुणों में सटीक और लक्षित सुधार किए जा सकते हैं। इससे अधिक उत्पादक, जलवायु-अनुकूल और संसाधन-कुशल किस्मों का विकास तेजी से संभव हो सकता है। डॉ. वर्मा ने कहा कि भारत के पास मजबूत कृषि अनुसंधान प्रणाली और विश्वस्तरीय वैज्ञानिक क्षमता है, इसलिए उपयुक्त नियामक ढांचा मिलने पर देश अगली पीढ़ी की कृषि नवाचार तकनीकों में वैश्विक नेतृत्व कर सकता है।

राष्ट्रीय कृषि-खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (नाबी), मोहाली के कार्यकारी निदेशक प्रो. अश्वनी पारीक ने कहा कि आज कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, नए कीटों के दबाव और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहा है। उनके अनुसार केवल पारंपरिक प्रजनन पद्धतियां इन समस्याओं का समाधान आवश्यक गति से नहीं कर सकतीं। आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी, जिसमें आनुवंशिक संशोधन और जीन एडिटिंग शामिल हैं, वैज्ञानिकों को अधिक सहनशील, पोषक और उत्पादक फसल किस्में विकसित करने के अतिरिक्त साधन प्रदान करती हैं।

पीएयू के प्लांट ब्रीडिंग एवं जेनेटिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. सुरिंदर संधू ने कहा कि जीएम और जीन एडिटेड तकनीकें भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, कृषि उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में सुधार लाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि उन्नत प्रजनन तकनीकें आयात पर निर्भरता कम करने के साथ भारत की वैश्विक कृषि उत्पादक और निर्यातक के रूप में स्थिति को भी मजबूत कर सकती हैं।

डॉ. संधू ने जोर देकर कहा कि उन्नत जैव प्रौद्योगिकियों से जुड़े नीतिगत निर्णय विज्ञान और प्रमाणों पर आधारित होने चाहिए। साथ ही किसानों को आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के लाभों और सुरक्षा के बारे में जागरूक करना आवश्यक है ताकि वे गलत सूचनाओं और भय फैलाने वाले प्रचार से प्रभावित न हों।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.एस. गोसल ने कहा कि भारत की कृषि का भविष्य विज्ञान और नवाचार को अपनाने की क्षमता पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा कि जीएम फसलें और जीन एडिटिंग जैसी उन्नत आनुवंशिक तकनीकें ऐसी किस्मों के विकास का अवसर प्रदान करती हैं जो अधिक उत्पादक हों, जलवायु तनावों का बेहतर सामना कर सकें और प्राकृतिक संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग करें।

कार्यशाला में विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि बढ़ती जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण विश्व खाद्य प्रणाली पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में विज्ञान आधारित कृषि नवाचार ही उत्पादकता बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रभावी मार्ग साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और कृषि प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जाएगी।

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