महाराष्ट्र में मानसून की जल्द विदाई, 265 तहसीलें सूखे की चपेट में
08 अक्टूबर 2026, मुंबई: महाराष्ट्र में मानसून की जल्द विदाई, 265 तहसीलें सूखे की चपेट में – भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 3 अक्टूबर को पुष्टि की कि दक्षिण-पश्चिम मानसून मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों से सामान्य तिथि से करीब पांच दिन पहले ही विदा हो गया। मानसून की इस समय से पहले वापसी ऐसे मौसम में हुई है, जब राज्य की 358 तहसीलों में से 265 को आधिकारिक तौर पर सूखा प्रभावित घोषित किया गया है। इससे सोयाबीन, कपास, प्याज और गन्ने के उत्पादन पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
मुंबई के लिए यह पिछले 25 वर्षों में मानसून की दूसरी सबसे जल्दी वापसी रही। इससे पहले 25 सितंबर को महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के करीब तीन-चौथाई कृषि क्षेत्र को सूखा प्रभावित घोषित किया था।
आईएमडी के अनुसार, महाराष्ट्र में इस मानसून सीजन में कुल वर्षा सामान्य से करीब 19 प्रतिशत कम रही। राज्य के पांच प्रशासनिक क्षेत्रों में मराठवाड़ा सबसे अधिक प्रभावित रहा, जहां बारिश में करीब 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
जिलेवार स्थिति देखें तो यवतमाल में सबसे अधिक 16 तहसीलें सूखा प्रभावित घोषित की गई हैं। इसके बाद जलगांव में 15, जबकि नांदेड, अमरावती और नागपुर में 14-14 तहसीलें प्रभावित हैं।
राज्य सरकार ने जिला कलेक्टरों को प्रभावित क्षेत्रों में मैदानी सर्वेक्षण पूरा करने, फसल नुकसान का आकलन तैयार करने और पंचनामे बनाने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को फसल नुकसान के दस्तावेजीकरण के लिए तस्वीरों और जीपीएस-आधारित रिकॉर्ड का भी इस्तेमाल करने को कहा गया है। इन्हीं आकलनों के आधार पर किसानों को मुआवजा और अन्य राहत देने से जुड़े फैसले लिए जाएंगे।
महाराष्ट्र के राजस्व विभाग ने नुकसान का आकलन शुरू कर दिया है। राज्य सरकार ने प्रारंभिक राहत पैकेज के तहत फसल ऋण के पुनर्गठन, कृषि बिजली बिलों में रियायत और ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत काम बढ़ाने जैसे उपायों की घोषणा की है।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के नेता उद्धव ठाकरे ने इससे आगे बढ़कर राज्य में नौ से दस महीने तक गंभीर सूखे की स्थिति रहने की आशंका जताई है। हालांकि, राज्य में औपचारिक फसल नुकसान का आकलन अभी जारी है और अंतिम स्थिति सर्वेक्षण पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
महाराष्ट्र की फसल पर संकट का असर देशभर में दिख सकता है
महाराष्ट्र देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य भारत के कुल कपास उत्पादन में करीब एक-चौथाई और गन्ना उत्पादन में लगभग एक-तिहाई योगदान देता है। इसके अलावा सोयाबीन और प्याज के राष्ट्रीय उत्पादन में भी महाराष्ट्र की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
ऐसे में राज्य के करीब तीन-चौथाई कृषि क्षेत्र में सूखे की स्थिति केवल स्थानीय आपूर्ति को प्रभावित नहीं करेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कृषि जिंसों की उपलब्धता और कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उत्पादन में कमी का वास्तविक असर तत्काल दिखाई देने के बजाय कटाई के दो से तीन महीने बाद अधिक स्पष्ट हो सकता है। उस समय मंडियों में आने वाली फसल की मात्रा से उत्पादन में कमी का वास्तविक स्तर सामने आने की संभावना है।
कम बारिश की स्थिति को देखते हुए कृषि और कमोडिटी विशेषज्ञों ने सरकार को संभावित कमी के लिए अभी से आकस्मिक योजना तैयार करने की सलाह दी है। इसमें संभावित उत्पादन घाटे का शुरुआती आकलन, दालों और अन्य प्रभावित कृषि जिंसों के आयात की अग्रिम तैयारी तथा कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली वैकल्पिक बीज किस्मों की योजना शामिल है।
प्याज, चीनी और एथेनॉल उत्पादन पर भी दबाव
प्याज की आपूर्ति को लेकर विशेष चिंता है, क्योंकि देश के कुल प्याज उत्पादन में महाराष्ट्र की बड़ी हिस्सेदारी है और प्याज को लंबे समय तक सुरक्षित रखना भी चुनौतीपूर्ण है। उत्पादन में कमी आने पर इसकी उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है।
गन्ने की कम उपलब्धता से चीनी उत्पादन के साथ-साथ एथेनॉल उत्पादन पर भी दबाव आने की आशंका है।
कपास के मामले में भी उत्पादन में संभावित कमी का असर आयात पर पड़ सकता है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, 2026-27 सीजन में भारत का कपास आयात सात मिलियन गांठ से अधिक हो सकता है।
इसी तरह, घरेलू उत्पादन में संभावित कमी को देखते हुए दालों के शुल्क-मुक्त आयात की अवधि मार्च 2027 तक जारी रखी गई है। महाराष्ट्र में मौजूदा सूखे की स्थिति आने वाले महीनों में घरेलू कृषि आपूर्ति, मंडी कीमतों और आयात की जरूरत को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हो सकती है।
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