देश में महंगे विदेशी कीटनाशकों को लाने की साजिश: कृष्णबीर चौधरी

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15 अप्रैल 2022, इंदौर: कृषि विशेषज्ञ एवं भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष डॉ. कृष्णवीर चौधरी ने गत दिनों कहा कि देश में बनने वाली असरदार एवं सस्ती कीटनाशक दवाओं का उत्पादन बंद करने और निजी फायदे के लिए विदेशी कीटनाशकों के आयात के दरवाजे खोलने की साजिश की जा रही है। इस संबंध में उन्होंने केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर को पत्र भी लिखा है।

डॉ. कृष्णवीर चौधरी, कृषि विशेषज्ञ एवं भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की  मिलीभगत  : डॉ. कृष्णवीर चौधरी ने कृषक जगत  को बताया कि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर को गत दिनों लिखे पत्र में आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना में 4000 करोड़ रुपए से अधिक की मिर्च की फसल कीट  और  थ्रिप्स संबंधी बीमारी से बर्बाद होने का जिक्र किया है। इसका कारण कोई भी कारगर दवा का नहीं होना था। जो दवा बहुत कारगर थी ,उस पर केंद्र सरकार ने रोक  लगा दी तो  वह दवाई बाजार में मिलना बंद हो गई है। जबकि किसान कई दशकों से इन कीटनाशकों दवाओं का उपयोग सफलतापूर्वक कर रहे थे और दुनिया के विकसित देशों में इन कीटनाशक दवाओं का प्रयोग विभिन्न फसलों पर किया जा रहा है। इनमे लोकस्ट, सफ़ेद सुंडी, फॉल आर्मी वार्म, आदि प्रमुख हैं।  प्रचलित दवाओं पर प्रतिबन्ध लगाना  यह सब आयातक लॉबी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कतिपय लोगों से मिलीभगत का नतीजा है।इस अव्यवस्था के लिए जो भी जिम्मेदार हैं, उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। कतिपय लोग कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2020 में ऐसे प्रावधान लाने की कोशिश में है, जिससे देश में बनने वाली प्रभावी कीटनाशक दवाओं का उत्पादन बंद हो जाये, जिनका निर्यात तेजी से बढ़ रहा है और विदेशी कीटनाशकों का आयात फिर से शुरू हो सके।  अंतरराष्ट्रीय ताकतें स्थानीय स्वार्थी तत्वों की मदद से भारतीय कृषि व्यवस्था को बिगाड़ने का षड्यंत्र रच रही हैं।

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आयातित कृषि रसायनों पर निर्भरता की कोशिश  : श्री चौधरी ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय कंपनियों के निर्यात के आंकड़े बताते हुए कहा कि  वर्ष 2019-20 का निर्यात 23 हजार 700 करोड़ रूपए था, जो बढ़कर 2020-21 में 26 हजार 500 करोड़ रूपए से ज़्यादा हो गया। भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता और कम कीमतों की वजह से विश्व के विकसित देशों में भारी मांग बढ़ रही है।  भारत से निर्यात में वर्ष दर वर्ष निरंतर वृद्धि हो रही है। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की ताकतें भारतीय कंपनियों के कृषि रसायनों की विश्व बाज़ार में बढ़ती हिस्सेदारी से दुखी हैं और भारत काे बाज़ार से बाहर करने के लिए पिछले कुछ वर्षों से तरह- तरह के हथकण्डे अपना रही हैं। विदेशी फंडिंग भी की जा रही है , ताकि भारतीय कंपनियों के द्वारा बनाये हुए जेनेरिक मोलेक्युल्स को बदनाम करके बंद करवा कर भारत के किसानों को आयातित कृषि रसायनों पर निर्भर बनाया जा सके। आपने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आयात किये गए उत्पादों की ऊँची कीमतों और भारतीय कंपनियों द्वारा उत्पादन की अनुमति मिलने के बाद 70 प्रतिशत कम कीमत पर किसानों को उत्पाद उपलब्ध कराने की जानकारी आंकड़ों सहित दी।

भारतीय कृषक समाज के सुझाव  : डॉ. चौधरी ने पिछले वर्ष कृषि संबंधी संसदीय स्थायी समिति को दिए गए सुझावों के बारे में  कृषक जगत को बताया कि इस विधेयक में आयातित फार्मूलेशन के पंजीकरण से पहले, उसमें  उपयुक्त होने वाले सक्रिय तत्त्व (टेक्निकल) के पंजीकरण की अनिवार्यता का कोई प्रावधान नहीं किया है और ना ही टेक्निकल के स्रोत का कोई सत्यापन किया गया है। जबकि भारतीय कंपनियों को अपने उत्पादों के पंजीकरण के लिए विस्तृत नमूने एवं टेक्निकल के स्रोत की जरुरत होती है। इससे विदेशी कंपनियों को लाभ मिलता है। यह ‘मेक इन इंडिया’ की नीति  के विरुद्ध है। विधेयक में आयातित फार्मूलेशन के पंजीकरण के लिए टेक्निकल का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि दुनिया के सभी विकसित देशों में बिना टेक्निकल रजिस्टर किये, फार्मूलेशन रजिस्टर नहीं किया जाता। फार्मास्युटिकल्स और ड्रग्स इंडस्ट्री में भी यही किया जाता है।

इसी प्रकार भारत में उपयोग नहीं किये जाने वाले या प्रतिबंधित कीटनाशक जो अभी तक उत्पादन करके निर्यात किये जा रहे थे, उनको निर्यात के लिए उत्पादन की अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। इसे रोकने के लिए उन कीटनाशकों (पेस्टीसाइड) के उत्पादन की अनुमति जारी रखने का प्रावधान किया जाना चाहिए। अन्य सुझावों में  धारा 32 (2)(b) में प्रावधान है कि कीटनाशकों (पेस्टीसाइड) का उपयोग निर्यात वस्तु में अवशेषों से जुड़ी समस्या के कारण नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे प्रावधानों को इस बिल से हटाया जाना चाहिए, जिनका दुरूपयोग होने की भरपूर संभावना हो। धारा 35 में एक या अन्य देश में प्रतिबंधित उत्पाद की समीक्षा या सुरक्षित विकल्प की उपलब्धता के दावे का प्रावधान है।इससे  उत्पादों की सुरक्षा मनमाने ढंग से परिभाषित की जाएगी और उन्हें हटा दिया जाएगा। इस प्रावधान को हटा दिया जाए, क्योंकि नियामक समीक्षा विशिष्ट अनुशंसा के आधार पर की जाती है।जो मोलेक्युल्स विश्व के किसी भी देश में 20 वर्षों के पेटेंट का समय पूरा कर चुके हैं उन ग्लोबल ऑफ़ पेटेंटेड  मोलेक्युल्स  को भारत में कोई डाटा प्रोटेक्शन नहीं देने का कोई प्रावधान नहीं करने पर सरकार के प्रति आभार भी प्रकट किया गया है। इसके अलावा  ‘वितरण’ की परिभाषा में से ‘अंतरराष्ट्रीय बाज़ार’ शब्द हटा दिया जाना चाहिए। डॉ. चौधरी ने कृषि मंत्री से मांग की है कि कीटनाशक विधेयक को लेकर संसदीय समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर शामिल करना चाहिए, ताकि देश की कृषि व्यवस्था पर संकट नहीं आए । इसे लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक की अगुवाई में कृषि मंत्रालय के अधिकारियों के बगैर एक समीक्षा समिति बनाई जाए।

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