बायो फर्टिलाईजर और कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है केन्द्र सरकार

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21 जुलाई 2022नई दिल्ली: बायो फर्टिलाईजर और कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है केन्द्र सरकार – सरकार परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) और पूर्वोत्तर क्षेत्र जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन जैसी समर्पित योजनाओं के माध्यम से देश में वर्ष 2015-16 से जैविक खेती के तहत जैव-उर्वरकों के उचित उपयोग को बढ़ावा दे रही है। जैव-उर्वरकों को एकीकृत पोषक-तत्व प्रबंधन (आईएनएम) के माध्यम से भी बढ़ावा दिया जाता है और इसे भारतीय कृषि अनुसंसान परिषद (आईसीएआर) तथा राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित कृषि-पद्धतियों का अभिन्न अंग बनाया गया है। यह जानकारी केन्द्रीय कृषि मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी।

आपने बताया जैव-उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए, आईसीएआर ने विभिन्न फसलों और मृदा किस्मों के लिए विशिष्ट जैव-उर्वरकों का विकास किया है। आईसीएआर किसानों को जैव उर्वरकों के उपयोग के बारे में शिक्षित करने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करता है। इसके अलावा, आईसीएआर-कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) उर्वरकों और कीटनाशकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत पोषक-तत्व प्रबंधन (आईएनएम) और एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) पद्धतियों पर किसानों के लिए प्रशिक्षण भी आयोजित करते हैं।

सरकार फसलों में प्रशिक्षण और प्रदर्शन के माध्यम से एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) को अपनाने को लोकप्रिय बनाने के लिए 28 राज्यों और 2 संघ राज्य क्षेत्रों में स्थित 35 केन्द्रीय एकीकृत कीट प्रबंधन केन्द्रों के माध्यम से वनस्पति संरक्षण और वनस्पति संगरोध उप-मिशन को क्रियान्वित कर रही है। अंतिम उपाय के रूप में रासायनिक कीटनाशकों के विवेकपूर्ण उपयोग, कीटनाशकों के उपयोग में सुरक्षा, कीट प्रबंधन के लिए वैकल्पिक साधन जैसे कि कीट नियंत्रण के सांस्कृतिक, भौतिक, यांत्रिक तरीकों के साथ-साथ जैव-कीटनाशकों और जैव-नियंत्रण एजेंटों के उपयोग पर विशेष जोर दिया जाता है।

कीटनाशकों के उपयोग को कम करने और जैव उर्वरकों के उपयोग को बढ़ाने के लिए, सरकार देश में पीकेवीवाई, एमओवीसीडीएनईआर और अन्य विभिन्न योजनाओं के तहत जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है, जिनका विवरण अनुबंध में दिया गया है।

केन्द्र सरकार द्वारा जैव उर्वरकों के उपयोग को बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम

परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) : पीकेवीवाई के तहत सरकार 50,000/- रुपये/हेक्टेयर/3 वर्ष की सहायता प्रदान कर रही है, जिसमें से 31,000 रुपये सीधे डीबीटी के माध्यम से जैव-उर्वरक सहित जैविक आदानों की खरीद/ऑन फार्म उत्पादन के लिए प्रदान किए जाते हैं।

पूर्वोत्तर क्षेत्र जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन (एमओवीसीडीएनईआर) के तहत, किसानों को 3 वर्ष के लिए 32500 रुपये/हेक्टेयर जैव-उर्वरक सहित जैविक आदानों के ऑन-फार्म उत्पादन/खरीद के लिए प्रदान किए जाते हैं।

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (एसएचएम) : सरकार जैव-उर्वरक उत्पादन इकाई (200 मीट्रिक टन क्षमता) की स्थापना के लिए राज्य सरकार को 160 लाख रुपये/यूनिट प्रदान कर रही है, जिसे भारत सरकार और राज्य सरकार के बीच 60:40 के अनुपात में साझा किया जाता है। एसएचएम के तहत 15 जैव उर्वरक उत्पादन इकाइयां स्थापित की गई हैं।

राष्ट्रीय तिलहन और पाम ऑयल मिशन (एनएमओओपी): इसमें जैव-उर्वरकों, राइजोबियम कल्चर/फॉस्फेट सॉल्यूबिलाइजिंग बैक्टीरिया (पीएसबी)/जिंक सॉल्यूबिलाइजिंग बैक्टीरिया (जेडएसबी)/एजाटोबैक्टर/माइकोराइजा और वर्मी कम्पोस्ट की आपूर्ति सहित विभिन्न घटकों के लिए 300/- रुपये प्रति हेक्टेयर 50 प्रतिशत की दर से सब्सिडी पर वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) : एनएफएसएम के तहत, जैव-उर्वरक (राइजोबियम/पीएसबी) को बढ़ावा देने के लिए लागत के 50 प्रतिशत की दर से 300 रुपये प्रति हेक्टेयर तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

भाकृअनुप की सिफारिशों के आधार पर, सरकार मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिए पौधों के पोषक तत्वों के अकार्बनिक और जैविक, दोनों स्त्रोतों (खाद, जैव-उर्वरकों आदि) के संयोजन के उपयोग के माध्यम से मृदा परीक्षण आधारित संतुलित और एकीकृत पोषक प्रबंधन को बढ़ावा दे रही है।

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