एक हेक्टेयर में 110 टन केला उत्पादन लेने की तकनीक : डॉ. के. बी. पाटिल

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18 अगस्त 2020, इंदौर। एक हेक्टेयर में 110 टन केला उत्पादन लेने की तकनीक : डॉ. के. बी. पाटिल एक हेक्टेयर में 110 टन केला उत्पादन लेने की तकनीक : डॉ. के. बी. पाटिल कृषक जगत फेसबुक लाइव कार्यक्रम में गत दिनों जैन इरिगेशन के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के. बी. पाटिल ने एक हेक्टेयर में 110 टन केला उत्पादन लेने की तकनीक पर विस्तार से प्रकाश डाला और इसकी चुनौतियों का सामना करने के गुर भी बताए। जिसमें केला उत्पादकों और केला उत्पादन के इच्छुक किसानों ने बहुत रूचि दिखाई। डॉ.पाटिल ने केले की फसल से जुड़े सवालों के संतोषजनक जवाब भी दिए।

डॉ. पाटिल ने कहा कि 25 साल पहले हमारे देश में केले का उत्पादन क्षेत्र 3.6 लाख हेक्टेयर था, जिसमें 13 लाख टन केला उत्पादन होता था। लेकिन जैन इरिगेशन के प्रयासों के बाद केले की खेती में बहुत बड़ा बदलाव आया है। विश्व में केले का उत्पादन 114 लाख टन हो रहा है, जबकि हमारे देश में यह आंकड़ा 35.88 लाख टन तक पहुँच गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारी भागीदारी करीब 30 प्रतिशत है। इसमें बहरत अव्वल है। लेकिन चीन, फिलीपींस और इक्वाडोर जैसे देशों में केले का उत्पादन कम होने के बावजूद भी उनकी भागीदारी ज्यादा है। केले का 110 टन/हेक्टेयर उत्पादन लेने का लक्ष्य तीन गुना ज्यादा है, जिसे पाने के लिए केले की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाने पर ध्यान देने की जरूरत है। केला उत्पादन में जलगांव के अलावा म.प्र. के बड़वानी, खरगोन, धार और बुरहानपुर जिलों का नाम प्रमुख है।

फसल की बुनियादी आवश्यकता

केले की फसल की बुनियादी जरूरत भूमि, वातावरण और तापमान की है। केले के नेतृत्वकर्ता देश भारत में केले के लिए परिस्थितियां अनुकूल नहीं है। जलगांव , बड़वानी और बुरहानपुर में तापमान 46-47 डिग्री सेंटीग्रेड है। जबकि इजराइल जैसे देश में तापमान 25-30 डिग्री सेंटीग्रेड रहता है और वहां के किसान 10-15 साल तक केले का उत्पादन 100 टन/एकड़ तक लेते हैं। इन हालातों में हमारे यहां केले की प्रिसिजन फार्मिंग करना जरुरी है, तभी 110 टन/हे. के लक्ष्य को पाया जा सकता है। इसके अलावा मिट्टी का प्रबंधन भी जरुरी है। हमारे यहां उत्पादक क्षेत्रों में काली, भारी, चिकनी, रेतीली है। 60 प्रतिशत क्ले है। मिट्टी अच्छी नहीं होने का प्रभाव केला उत्पादन पर पड़ता है। इसका प्रबंधन जरुरी है अन्यथा केला उत्पादन में कई परेशानियां आती हैं।

केले की गुणवत्तायुक्त उत्पादकता के लिए जैन इरिगेशन के मॉडल को अपनाया जाना जरुरी है। टिश्यू कल्चर पौधों की जानकारी देते हुए कहा कि जैन इरिगेशन वायरस इंडेक्सिंग करने वाली देश की पहली कम्पनी है। आपने जैन इरिगेशन के मदर नर्सरी से लेकर पौधरोपण,पॉली हॉउस, पोषण प्रबंधन, जल प्रबंधन, वातावरण की चुनौतियों पर नियंत्रण, रेज्ड बेड पद्धति के साथ उच्च उत्पादन के लिए आधारभूत खुराक सिंगल सुपर फास्फेट, जिप्सम, फेरस सल्फेट, पोटाश, जैविक खाद, केंचुआ खाद के अनुपात का जिक्र कर ड्रिप इरिगेशन की विस्तार से जानकारी दी।

डॉ. पाटिल ने मिट्टी की बुनियादी समस्या पर ध्यान देने की जरूरत पर जोर देते हुए रावेर के किसान श्री शेखर के यहां सिंचाई के लिए प्रयोग किए गए सरफेस मॉडल का भी जिक्र किया। पौधरोपण के लिए 6ङ्ग5 मी. की सिफारिश करते हुए कहा कि हमारे यहां तापमान ज्यादा है, जबकि फिलीपींस में 37 डिग्री से अधिक तापमान नहीं रहता। पौधों की परवरिश के लिए सूक्ष्म सिंचाई आवश्यक है। एयर स्पेस न रहे इसका ध्यान रखें। उचित जल प्रबंधन और पोषण प्रबंधन करके उच्च उत्पादन पाया जा सकता है।

ज्यादा पानी देने से भी उत्पादन प्रभावित होता है। सूक्ष्म सिंचाई महत्वपूर्ण है। जड़ों की कक्षा में नमी को नियमित बनाए रखना जरुरी है। पौधों के विकास की गति पर ध्यान देना भी जरुरी है। आपने बड़वानी के किसान श्री संतोष भाई का उदाहरण दिया जो 100 टन/हे. केले का उत्पादन ले रहे हैं। जैन इरिगेशन के स्वचालित सेंड फिलटर, फर्टिलाइजर टैंक, सेंसर, टेंसियोमीटर की न्यूट्रीकेयर यूनिट की जानकारी भी दी जिससे पानी के दबाव, पोषण और जल प्रबंध को स्वचालित तरीके से जड़ों की कक्षाओं में संतुलित किया जा सकता है।

डॉ. पाटिल ने कहा कि 110 टन/हे. केला उत्पादन का देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ता है और एक लाख हेक्टेयर का उत्पादन बढ़ता है। 110 टन/हे. केला उत्पादन लिया जा सकता है। लॉक डाउन में 700 कंटेनर्स एक्सपोर्ट हुए हैं। इससे उम्मीद की जा सकती है। लेकिन इसके लिए केले की फसल की हर छोटी-छोटी बात को ध्यान में रखने की जरूरत है। सही नियोजन से 110 टन/हे. का लक्ष्य पाया जा सकता है। आपने कीट से फैलने वाले कुकुंबर मोजेक वायरस के लक्षण दिखते ही इसे निकाल कर फेंक देने और 5-6 दिन बाद कीटनाशक छिड़कने की सलाह भी दी। पनामा डिसीज बढऩे को वातावरण बदलाव का कारण बताया। अंत में आपने केला उत्पादक किसानों के सवालों के जवाब देकर संतुष्ट किया। इस आयोजन पर किसानों, श्रोताओं और दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिला लगभग 20 हजार।

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