अल्ट्रा हाई डेंसिटी तकनीक से बढ़ाएं आम की उत्पादकता : डॉ. पाटिल

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अल्ट्रा हाई डेंसिटी तकनीक से बढ़ाएं आम की उत्पादकता : डॉ. पाटिल

कृषक जगत फेसबुक लाइव

28 जुलाई 2020, इंदौर। अल्ट्रा हाई डेंसिटी तकनीक से बढ़ाएं आम की उत्पादकता : डॉ. पाटिल डॉ. के.बी .पाटिल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, जैन इरिगेशन ने गत दिनों कृषक जगत के फेसबुक लाइव कार्यक्रम के तहत किसानों को आम लगाने की नई अल्ट्रा हाई डेंसिटी तकनीक की दृश्य -श्रव्य माध्यम से विस्तृत जानकारी दी. आपने बताया कि इस नई तकनीक में पेड़ों की ऊंचाई भी कम रहती है और 3 -4 साल में आम का उत्पादन शुरू हो जाता है. इस आयोजन में किसानों/ श्रोताओं ने बहुत रूचि ली और कई सवाल भी पूछे जिनका डॉ. पाटिल ने संतोषजनक जवाब दिए.

डॉ. पाटिल ने आम के उत्पादन और उत्पादकता के बड़े फर्क को रेखांकित करते हुए कहा कि दक्षिण अफ्रीका, इजराइल और ब्राजील जैसे देश आम का 16 -30 मैट्रिक टन/हे. उत्पादन लेते हैं, जबकि हमारे देश में यह आंकड़ा 9.16 टन/हे. है. जबकि हम आम में विश्व के नंबर वन के उत्पादक हैं. इसे बढ़ाने के लिए हमें यूएचडी के नए मॉडल और तंत्रज्ञान को अपनाते हुए आम को व्यावसायिक खेती बनाकर किसानों के लाभ को बढ़ाना होगा. मैक्सिको, ब्राजील, पेरू और फिलीपींस जैसे देश आम की उत्पादकता और निर्यात के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं. जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारा देश इस मामले में पिछड़ा हुआ है.

इसका मुख्य कारण आम की पारम्परिक खेती करना है. हमारे पूर्वज एक एकड़ में 40 पौधे लगाते थे, तो 10 -15 साल बाद उत्पादन होता था, क्योंकि तब आम की खेती के लिए प्रशिक्षण, प्रबंधन का अभाव था. जबकि यूएचडी नए ज़माने की तकनीक है, जिसमें 4ङ्ग2 मीटर की दूरी से एक एकड़ में 500 और 3ङ्ग2 मी. की दूरी से 674 आम के पौधे लगाए जाते हैं. जो दस गुना से भी ज्यादा है. इसलिए आम को लाभकारी खेती बना सकते हैं. दूसरा लाभ यह कि इसमें पेड़ों पर स्प्रे, रोग नियंत्रण और छँटाई आसानी से कर सकते हैं. इसमें समय की बचत, के साथ उत्पादकता बढ़ती है. प्राकृतिक सौर ऊर्जा, जल की कार्यक्षमता के उपयोग में वृद्धि के साथ गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन होता है.

डॉ. पाटिल ने कहा कि जैन इरिगेशन में 1994 से आम पर अनुसंधान हो रहा है. हालाँकि इसके पूर्व 1970 में पंतनगर कृषि वि.वि .और यूपी के अन्य विवि ने कार्य आरम्भ किया था, लेकिन जैन इरिगेशन ने रत्ना किस्म पर कार्य किया और एक नया मॉडल और पैकेज बनाया है. जिसमें इस तकनीक से 6-7 साल बाद 9 टन/एकड़ या 24 टन/हे. उत्पादन लिया जा सकता है. इसी तरह अल्फांसो का 3.5 टन/हे., केसर 5.5 टन/हे. और तोतापरी का तो 10 टन/एकड़ उत्पादन मिलता हैं. लेकिन इसके लिए ज़मीन और पानी की गुणवत्ता, मिट्टी का प्रकार की जानकारी होना जरुरी है. ड्रिप इरिगेशन के ऑटोमेशन सिस्टम से सिंचाई करना चाहिए.भूमि की तैयारी, स्वस्थ पौधे और पौधों के बीच में जगह होने से 34 माह में फलोत्पादन शुरू हो जाता है.

इस तकनीक से अच्छी गुणवत्ता का आम पाया जा सकता है, जिसका मूल्य भी अच्छा मिलता है, क्योंकि आम की मांग अधिक और उत्पादन कम है. डॉ. पाटिल ने जोर देकर कहा कि इस यूएचडी तकनीक से केसर/अल्फांसो आम का 4-5 साल में 5 टन /एकड़ उत्पादन लेकर डेढ़ लाख रुपए /एकड़ कमाई की जा सकती है. तोतापरी आम तो 10 टन/एकड़ तक उत्पादन देता है. इसे म.प्र. में विस्तार देने की जरूरत है. इथोलिन आम को प्राकृतिक रूप से पकाता है, इसलिए यह गलत नहीं है, लेकिन प्रतिबंधित कार्बाइड से पकाए गए आम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं. इनसे बचना चाहिए. यूएचडी तकनीक से आम की खेती कर सालाना 5 लाख तक की कमाई की जा सकती है. जरूरत है आम उगाने की इस क्रांतिकारी तकनीक को अपनाने की. अंत में डॉ. पाटिल ने किसानों और श्रोताओं के प्रश्रों का समाधान किया.

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