गेंदे की फसल से बदलें खेतों की रौनक

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  • गोविन्द राम चौधरी
  • मुकेश मण्डीवाल, वरिष्ठ अनुसंधान अध्ययेता, कृषि अनुसंधान केन्द्र (कृषि विश्वविद्यालय,
    कोटा) उम्मेदगंज, कोटा (राजस्थान)

8 अप्रैल 2021, भोपाल ।  गेंदे की फसल से बदलें खेतों की रौनक – भारत की अर्थव्यवस्था में फूलों की खेती का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। गेंदा विश्व तथा भारत में उगाये जाने वाले महत्पूर्ण फूलों में से एक है, साथ ही खुले फूलों की श्रेणी में सर्वोतम स्थान पर है। गेंदे का फूल सर्वव्यापी एवं लोकप्रिय है क्योंकि गेंदे का उपयोग विभिन्न कार्यों जैसे पुष्प सज्जा, धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों से लेकर औषधि निर्माण में भी किया जाता है। गेंदे के फूलों की मांग देश-विदेश में बढ़ती जा रही है जिसके कारण वर्षभर बाजार में इसकी मांग बनी रहती है। किसान फूलों का खेती को परंपरागत खेती के रूप में इस्तेमाल कर अपनी दशा व खेतों की रौनक बदल सकते हैं। गेंदा भारत में हर प्रकार की मिट्टी, जलवायु व हर मौसम में उगाया जा सकता है। यदि उचित ढंग से गेंदे की खेती की जाये तो किसान अच्छा मुनाफा कमा सकता है।

गेदें के मूल्य संर्वधन के लिए उत्पाद विविधता के रूप में इसके प्रचुर उत्पाद और असमय उत्पाद का प्रयोग हो सकता है इसके वर्णक निष्कर्षण, खाने के उत्पाद, प्राकृतिक रंग के निर्माण, औषधियाँ, इत्र, पत्तियों से तेल के निष्कर्षण द्वारा कृषकों की आय को बढ़ाया जा सकता है।

जलवायु

गेंदे की खेती लगभग सभी प्रकार की जलवायु एवं हर मौसम (सर्दी, गर्मी व वर्षा ऋतु) में सुगमता से हो सकती है। इसके उत्पादन के लिए 15-30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है तथा अधिक गर्मी व अधिक सर्दी से पुष्प की गुणवत्ता तथा उपज पर विपरित प्रभाव पड़ता है। गर्मियों में फसल लेेने के लिए इसकी बुवाई जनवरी-फरवरी माह, सर्दियों के लिए सितम्बर माह व वर्षा ऋतु के लिए जून माह में करें।

प्रजातियाँ

गेंदें की मुख्यत: दो प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है:-
अफ्रीकन गेंदा या हजारिया गेंदा: इन किस्मों के पौधों की ऊँचाई 60-80 से.मी. तक होती है तथा इसके पुष्पों का आकार बड़ा, गुथा हुआ एवं विभिन्न रंगों जैसे पीला, नारंगी होते हैं।

किस्में : क्राउन ऑफ गोल्ड, येलो सुप्रीम, जाईट डबल अफ्रीकन, नारंगी जाइंट, डबल पीला, क्रेकर जेक, गोल्डन एज कलकतिया आदि प्रमुख हैं।
फ्रेंच गेंदा या गेंदी- इसमें गेंदा अधिकांशत: बौने तथा छोटे फूलों वाले होते हैं तथा पौधों की ऊँचाई 20-30 से.मी. तक होती है।

किस्में: रस्टी रेड, बटरस्कॉच, बटर बॉल, फायरग्लो, रेड ब्रोक्रार्ड, सुसाना फ्लेमिंग, फायर डबल, स्टार ऑफ इंडिया इत्यादि।
इसके अतिरिक्त पूसा नांरगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा नाम की दो नई जातियां भारतीय कृषि अनुसंधान द्वारा भी निकाली गई हैं।

बीज दर

एक हेक्टेयर के लिए सामान्य तौर पर 1.5 किलो बीज, जबकि संकर प्रजातियों का प्रयोग करने पर 700-800 ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त रहता है। बुवाई हेतु पुराने बीजों का प्रयोग नहीें करें।

नर्सरी प्रबंधन

मौसम के अनुसार बीज को 8-10 सेमी ऊंची उठी हुई, 1 मीटर चौड़ी व आवश्यकतानुसार 2-3 मीटर लम्बी क्यारियों में बुवाई करते हैं। अंतिम जुताई के बाद भुरभुरी तैयार बीज की क्यारी को 1:50 (फार्मलीन व पानी) से उपचारित करे बीजों को लाईन में या छिड़कवां विधि से बुवाई करके गोबर की खाद से ढंककर झारे से पानी देते रहें। नर्सरी में अधिक जल-भराव नहीं हो।

भूमि व उसकी तैयारी:

गेंदे की खेती सभी प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है परन्तु बेहतर पैदावार के लिए बलुई दोमट मिट्टी उत्तम मानी जाती है जिसका पी.एच. 7.0 से 7.5 हो और अच्छे जल निकास वाली हो। भूमि तैयारी हेतु मिट्टी पलटने वाले हल से तीन-चार जुताईयां करके पाटा लगाकर भुरभुरी करके छोड़ दें तथा अंतिम जुताई के समय 150-200 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद डालकर मिलाकर साथ ही, दीमक व अन्य कीटों से बचाव हेतु 4-5 क्विंटल नीम की खली डालकर मिला देवें। पौधों को खेत में रोपण से पूर्व खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बांट लें जिससे सिंचाई आदि कार्यों में आसानी से हो जाये।

पौध की रोपाई

जब पौध लगभग 30-35 दिन की या 4-5 पत्तियों की हो जाए, तब उसकी रोपाई कर दें। रोपाई में पौधे से पौधे की दूरी 30-35 सेंटीमीटर व लाईन से लाईन की दूरी 45 सेंटीमीटर हो। रोपाई हमेशा शाम के समय करें व रोपाई के बाद पौधों के चारों ओर से मिट्टी को हाथ से दबा दें।

सिंचाई

गर्मियों में 4-5 दिनों के अंतराल पर व सर्दियों में 10-12 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहें। अच्छे उत्पादन के लिए नमी का रहना अति आवश्यक होता है।

अन्य क्रियाएं:

रोपण के बाद खेत में समय-समय पर खुर्पी की सहायता से खरपतवारों को निकालते रहें। पौधों में अधिक शाखाओं के विकास हेतु रोपण के बाद कटाई-छंटाई करते रहें। पुष्प आते समय पौधों के पास मिट्टी चढ़ा दें, जिससे अधिक शाखाएं निकालें। निराई-गुड़ाई का पौधों की आरम्भिक अवस्था में विशेष महत्व है। इससे प्रथम गुड़ाई रोपण के 20-26 दिन बाद तथा द्वितीय 40-45 दिन बाद करें।

शीर्षकर्तन:

जब गेंदे की फसल लगभग 45 दिन की हो जाए तो पौधे की शीर्ष कलिका को 2-3 सेंटीमीटर काटकर निकाल दें। इससे पौधे में अधिक कलियों का विकास होता है और अधिक फूल प्राप्त होते हैं।

खाद एवं उर्वरक

खेत की जुताई से 10 से 15 दिन पहले 150 से 200 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर खेत में डाल दें साथ ही 160 किलो नाइट्रोजन, 80 किलो फॉस्फोरस व 80 किलो पोटाश की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन की आधी तथा फॉस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के पहले आखिरी जुताई के समय भूमि में मिला दें। शेष बची नाइट्रोजन की मात्रा का लगभग एक महिने के बाद खड़ी फसल में छिड़काव कर दें।

फूलों की तुड़ाई

फूलों को तोडऩे से पहले खेत में हल्की सिंचाई करें, जिससे फूलों का ताजापन बना रहे। फूलों की तुड़ाई अच्छी तरह से खिलने के बाद ही करना चाहिए तथा फूल तोडऩे का श्रेष्ठ समय सुबह या शाम का होता है।

उपज: अफ्रीकन गेंदा से 18-20 टन, फ्रेंच गेंदा से 10-12 टन प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती है, जो लगाये गये मौसम व कल्चरल क्रियाओं के अनुसार कम-ज्यादा भी प्राप्त हो सकती है।

पौध संरक्षण

रेड स्पाईडर माईट
इनका आक्रमण फूलों के खिलने के समय होता है।

रोकथाम: मिथाइल पैराथियान दवा की 1.5 मि.ली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार छिड़काव को 10-15 दिन में दोहरायें।

हेयरी केटरपिलर

यह इल्ली पत्ती को खाकर क्षति पहुँचाती है।
रोकथाम: मिथाइल पैराथियान दवा की 1.5 मि.ली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

डैम्पिंग ऑफ

यह व्याधि पौधशाला में छोटेे पौधों को अधिक नुकसान पहुँचाती है।
रोकथाम: मैंकोजेब दवा की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। रोग के प्रकोप अनुसार आवश्यक हो तो 15 दिन में पुन: छिड़काव करें।

पाउडरी मिल्ड्यू

पत्तियों पर सफेद पाउडरनुमा दिखाई पड़ता है तथा क्षति पहुँचती है।
रोकथाम: सल्फर पाउडर का भुरकाव करें एवं केलक्सीन 1 मिलीलीटर या केराथेन 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल का 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

फ्लावर बड़ सडऩ

कलियां भूरे रंग की हो कर सडऩे लगती है।
रोकथाम: मैंकोजेब दवा 2-5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
द्विस्तरीय बागवानी प्रणाली में भी फल वृक्षों के साथ गेंदे को उगाकर अधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। गेंदे के फूलों का बाजार भाव कम होने पर किसान फूलों से बीज उत्पादन, रसायन मुक्त रंग बनाकर तथा फूलों को सीधे प्रसंस्करण उद्योगों में भी बेचकर किसान अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं।

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