बांस की खेती से किसान होंगे मालामाल, सरकार देती है 50 फीसदी तक सब्सिडी; जानिए आवेदन का तरीका
14 नवंबर 2025, नई दिल्ली: बांस की खेती से किसान होंगे मालामाल, सरकार देती है 50 फीसदी तक सब्सिडी; जानिए आवेदन का तरीका – देशभर में बांस की खेती तेजी से लोकप्रिय होती जा रही है। यह सिर्फ मुनाफे का जरिया नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद और कम मेहनत वाली खेती का मॉडल है। बांस ऐसी फसल है जो न मौसम की मार झेलती है, न मिट्टी की क्वालिटी पर ज्यादा निर्भर करती है और न ही बार-बार खाद या सिंचाई की जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि अब पूर्वोत्तर और मध्य भारत के कई किसान बांस की खेती को बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बांस के पौधों को पकने में तीन से पांच साल लगते हैं। इसके बाद हर एकड़ से सालाना औसतन 1.5 लाख से 3 लाख रुपये तक की आमदनी संभव है। उदाहरण के तौर पर, 10 एकड़ के बांस बागान से जीवनकाल में 60 से 80 लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है। शुरुआती चार सालों में आमदनी कम होती है, लेकिन पांचवें साल के बाद लगातार कटाई की जा सकती है। प्रति एकड़ औसतन 15 से 20 टन बांस की पैदावार होती है और बाजार भाव 3,000 से 5,000 रुपये प्रति टन तक होता है।
लागत कितनी होती है?
बांस की खेती में शुरुआती निवेश बहुत ज्यादा नहीं है। एक एकड़ में लगभग 400 से 500 पौधे लगाए जाते हैं और प्रति पौधा लागत 50 से 100 रुपये तक आती है। खेत तैयार करने, गड्ढे खोदने, मजदूरी और शुरुआती खाद पर खर्च जोड़कर एक एकड़ की कुल लागत लगभग 60,000 से 95,000 रुपये होती है। पहले तीन साल थोड़ी देखभाल और सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन उसके बाद पौधे खुद बढ़ते हैं और बार-बार कटाई संभव होती है।
सरकारी मदद और सब्सिडी
केंद्र सरकार ने बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) शुरू किया है। इस मिशन के तहत सरकार पौधे की लागत पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देती है। किसानों को प्रशिक्षण, बाजार से जोड़ने और बांस आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन भी दिया जाता है। विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों में यह योजना काफी सफल रही है।
आवेदन का तरीका
बांस की खेती में आवेदन करना भी आसान है। किसान राष्ट्रीय बांस मिशन की वेबसाइट पर पंजीकरण फॉर्म भर सकते हैं, अपने खेत और जमीन की जानकारी अपलोड कर सकते हैं और सब्सिडी के लिए ऑनलाइन आवेदन जमा कर सकते हैं। इसके अलावा नजदीकी कृषि कार्यालय से संपर्क कर तकनीकी मदद और प्रशिक्षण भी लिया जा सकता है।
बांस दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली घास मानी जाती है। यह वातावरण से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है और ऑक्सीजन छोड़ता है। साथ ही मिट्टी के कटाव को रोकता है और बंजर भूमि को उपयोगी बनाता है। यही कारण है कि बांस को ग्रीन इकॉनमी क्रॉप के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है।
किसानों के लिए सुनहरा अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि बांस की खेती कम मेहनत और ज्यादा रिटर्न वाला मॉडल है। कम उपजाऊ या अनुपयोगी जमीन वाले किसान भी इसे अपनाकर स्थायी आमदनी कमा सकते हैं। सही वैरायटी चुनकर और बाजार से जुड़े रहकर यह खेती न केवल आय का स्रोत बन सकती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकती है।
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