जैविक खाद में खरपतवार का उपयोग

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जैविक खाद में खरपतवार का उपयोग

जैविक खेती आदिकाल से चली आ रही है, हमारे पूर्वजों ने अन्न उत्पादन के लिये जैविक खाद का ही उपयोग किया और स्वयं को तथा पर्यावरण को भी स्वच्छ रखने में सक्षम रहे। अनियंत्रित आबादी अधिक अन्न की मांग का कारण बनी और खेती में रसायनिक खादों का समावेश आवश्यक हो गया। जैविक खेती कृषि की वो पद्धति है जिसमें पर्यावरण को स्वच्छ तथा प्राकृतिक संतुलन को बनाये रखते हुए भूमि, जल एवं वायु को प्रदूषित किये बिना खेती में टिकाऊपन लाया जा सके। इस पद्धति का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि खाद्यान्नों की अधिक मांग को दरकिनार रखते हुए रसायनिक उर्वरकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया बल्कि अधिक अन्न उत्पादन के लिये उर्वरकों तथा जल का अनियंत्रित उपयोग का संतुलन करते हुए भूमि को स्वस्थ रखने के उद्देश्य से थोड़े-थोड़े क्षेत्र की दशा सुधारने के उद्देश्य से परिवर्तन लाया जा सके क्योंकि यह खेती रसायनिक खेती की अपेक्षा सस्ती, स्वावलंबन एवं स्थाई भी है। इसमें मिट्टी को एक जीवित माध्यम माना गया है। धीरे-धीरे ही सही पर जैविक खादों के उपयोग से लक्षित उत्पादन लाने के प्रयास कभी असफल नहीं होंगे। खेती में यांत्रिकीकरण के चलते एक क्रांति अवश्य आई ,परंतु खेती में पशुपालन का परम्परा पर भारी फर्क आया जो एक गलत कदम था। भारतीय खेती का पशुपालन को यदि एक अभिन्न अंग कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पशुपालन का प्रतिशत कम होने से जैविक खादों के उत्पादन पर विपरीत असर पड़ा क्योंकि जैविक खादों का उपयोग दिनों-दिन कम होने लगा। प्रकृति बहुत कुछ ले लेती है तो बहुत कुछ देने की क्षमता भी रखती है। खेती में फसलों के सबसे बड़े दुश्मन खरपतवारों को हम बेकार समझ पर फेंक देते हैं। वास्तविकता में खरपतवारों को यदि परिभाषित किया जाये तो वे पौधे जो अवांच्छनीय होते है और फसलों के साथ-साथ पनप कर भूमि से उपलब्ध कीमती पोषक तत्वों का बंटवारा करके फसलों को कमजोर करके 30 से 40 प्रतिशत उत्पादन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। भूमि से पोषक तत्वों के अलावा प्रकाश तथा जल का भी हिस्सेदार बन जाते हैं। लेकिन जैविक खेती में ये पौधे भी उपयोगी हो सकते हैं। अनेकों प्रकार के खरपतवारों में वायु से नत्रजन इकट्ठा करने की क्षमता रहती है जैसे सेजी, चिरोटा, बरसात में बहुत पैदा हो जाते हैं। खेत के अलावा मेढ़ों पर तथा पड़ती भूमि पर भी इन्हें देखा जा सकता है। इनके कारण भूमि में ना केवल नत्रजन को इकट्ठा किया जा सकता है बल्कि भूमि से कीमती मिट्टी के क्षरण को भी रोकने में भी इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। खरपतवारों में कुछ में औषधिगुण भी होते हैं जैसे बथुआ, गाजरघास इत्यादि इन्हें फूलने के पहले यदि जड़ समेत निकाल कर खाद के गड्ढों में ढाल दिया जाये तो अच्छा खाद तैयार हो सकता है। चिरोटा में ‘लेटरोनिया आइसिनिया’ नामक पदार्थ होता है। जो नाडेप विधि से कम्पोस्ट बनाने में सडऩे की क्रिया में गति लाने में सक्षम होता है। और जैविक खाद जल्दी और अधिक उपयोगी होती है। पड़ती भूमि में लगे गाजरघास जो दिन दूना रात चौगुना के हिसाब से बढ़ता है को भी यदि फूलने के पहले जड़ समेत उखाड़ कर अधिक शीघ्रता से तैयार करने में सहायक होता है तथा पौधों में प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। हमारे देश में लगभग 1000 मिलियन टन इस तरह का ‘बायोमास’ उपलब्ध रहता है। जिसका यदि उचित प्रबंधन करके जैविक खाद तैयार किया जा सके तो इस बात की जरा भी शंका नहीं रहेगी।कार्बनिक खादों की कमी देश में हैं। खरपतवारों का उपयोग करके एक तीर से दो शिकार फसलों को खरपतवारों से छुटकारा और जैविक खादों की उपलब्धि में इजाफा।

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