गर्मी- वर्षा में गन्ने की देखभाल

व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें

(अ) गन्ने की स्थापित फसल की देखभाल:-
शरद कालीन गन्ना:- अक्टूबर नवम्बर में बोई गई फसल इस समय भरपूर बढऩ अवस्था में हैं। अधिकतर कल्ले फूट चुके हैं। एवं गन्ने की पोरियां निचले भाग में दिख रही हैं। यह अवस्थानुसार हल्की मिट्टी या भारी मिट्टी चढ़ाने का अवसर है। आप फास्फोरस युक्त खाद की पूरी मात्रा (5 क्विं. सुपर/हेक्टेयर) गन्ना लगाते समय ही दे चुके होंगे। पोटाश खाद की आखिरी एक तिहाई (50 किलो पोटाश) मात्रा एवं नत्रजन की आखिरी मात्रा भी इसी समय देकर मिट्टी चढ़ायें।
बसंतकालीन गन्ना:- मार्च तक लगा गन्ना इस समय कल्ले फोडऩे की अवस्था में है। इसमें भी नत्रजन एवं पोटाश का आखिरी डोज़ देकर जून प्रथम सप्ताह तक आखिरी मिट्टी चढ़ानेे की तैयारी करें।
निंदाई-गुड़ाई कार्य :- गन्ने की कतारों के बीच रोटरी हो या डोरा आदि चलाकर निंदाई गुढ़ाई का लाभ प्राप्त करें। साथ ही मिट्टी को ढ़ीला कर हल्की/भारी मिट्टी चढ़ाने का प्रयास करें । ध्यान रहे कि खाद की सारी मात्रा खासकर यूरिया का प्रयोग अभी करें एवं वर्षा ऋतु में उर्वरकों को प्रयोग न करें।
जड़ी प्रबंधन:- गन्ने में अनुसंशित जड़ी प्रबंधन अवश्य करें। किसी भी हालत में सूखी पत्तियाँ न जलायें । पलवार सिंचाई की मांग को कम करेगी। गेप फिलिंग करने हेतु पॉलीबेग पौधों का ही प्रयोग करें। खाद देने हेतु क्रो बार (लोहे का नोकदार खन्ता) से हर 2 पौधों के बीच जड़ों तक गहरा छेदकर नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश का मिक्चर डालें। इससे कम खाद में भी अधिक लाभ मिलेगा।
सूक्ष्म पौषी तत्व:- बीजू एवं जड़ी वाले गन्ने में ग्रीष्मकाल में 15 दिन के अन्तर से बहु सूक्ष्मपौषी तत्वों के दो छिड़काव अवश्य करें। इसके साथ यूरिया 2 प्रतिशत, पोटाश 3 प्रतिशत एवं कीटनाशी भी आवश्यकता अनुसार मिलाया जा सकता है।
सिंचाई:- 7 से 10 दिन में सिंचाई करें। अगर कम पानी उपलब्ध हो तो कतार छोड़ तरीका अपनाएं। पलवार बिछायें।
(ब) कीटों से बचाने का यही सही समय:-
कुछ प्रमुख कीटों के प्रकोप एवं प्रबंधन की जानकारी निम्नलिखित है।
भूमिगत कीट:-
दीमक:
1. सारा साल सक्रिय – शिशु अधिकतर वर्षा में नई कालोनी बनाते हैं। रानी दीमक-5 से 15 वर्ष जीवित रहती है। सूखे की दशा में अधिक नुकसान होता है।
2. गन्ने के कटे भागों -ऑखों-निचली पोरियों को दीमक खोखला कर मिट्टी भरती जाती है।
3. गन्ने दूर से पीले दिखते हैं।
4. अंकुरण में 40-60 प्रतिशत एवं उपज में 18 से 42 प्रतिशत हानि संभावित हैं।
व्हाईट ग्रब:
5. प्रौढ़ अक्सर नवम्बर माह में सक्रिय होते हैं। जून से दिसम्बर तक अधिक नुकसान करते हैं।
6. ग्रब सफेद कुन्डल जैसे होते हैं, सिर नारंगी रंग का, नीचे कांटे जैसे उभार होते हैं।
7. यह जड़ों, जड़ों के सिरो, भूमि में तने के भाग को क्षति पहुंचाते हैं।
8. 10-100 प्रतिशत तक उपज में कमी आती है।
9. जडें काली पड़ जाती है। पौधे उकटा रोग की तरह सूखने लगते हैं। पत्तियाँ पीली पडऩे लगती है एवं गन्ने सूखने लगते हैं।
भूमिगत कीटों का नियंत्रण
भौतिक:-
10. ग्रब जैसे भूमिगत कीटों हेतु गहरी जुताई एवं फसल चक्र अपनाना श्रेयस्कर है।
दीमक के बमीटों को नष्ट करें जिससे कीट संख्या में कमी आ सके।
रसायनिक:-
11. क्लोरोपायरीफास 10 जी. / 25 कि./हे या क्लोरोपाइरोफास 20 ई.सी. / 2 मिली./लीटर पानी में मिलाकर नालियों में छिडकें। अधिक प्रकोप में वाईफोन्थ्रिन (मारकर) 400 मि.ली. को 2-3 लीटर पानी में 20-25 किलो रेत में मिलाकर नालियों में भुरकें व सिंचाई करें।
छेदक कीट:-
शीघ्र तना छेदक
1. मार्च से जुलाई माह तक सक्रिय रहते हैं।
2. छोटे पौधों में सतह के पास छेद एवं मध्य शिरा का सूखना मुख्य लक्षण है।
शिरा छेदक
3. उपज में 21 से 37प्रतिशत एवं शक्कर मात्रा में 0.2 से 4.1 प्रतिशत कमी।
4. फरवरी से अक्टूबर तक में सक्रिय रहते हैं।
5. नई पत्तीयों में छेद। ऊपरी आखों से अंकुरण गुच्छों के रूप में होता है।
तना छेदक
6. अप्रैल से अगस्त तक सक्रिय रहता है।
7. उपज में 30 प्रतिशत तक कमी आती है।
8. पोरियों पर छोटे छेद-3-4 पोरियों में दिखते हैं एवं गांठों में सुरंग पाई जाती है।
इन्टरनोड छेदक
9. जून से सितम्बर तक सक्रिय रहता है।
10. इल्ली जड़ों के पास काटती है जहां से गन्ना हल्के झटके से टूटता है।
11. इसके लक्षण है कि गाठों पर जड़ों का ऊगना। छेदक अन्दर खाता है, बाहर गन्दगी फैली रहती है।
जड़ छेदक
12. 30-35 प्रतिशत उपज में एवं रिकवरी में भारी कमी आती है।
13. यह अपै्रल से जून तक सक्रिय रहता है।
14. बढऩ स्टेज में शिरा सूखना जो बाहर खिंचता नहीं है। पत्त्यिाँ पीली पड़ जाती है।
15. इल्ली जड़ों एवं निचली सतह पर गन्नों को खाती है।
छेदक कीटों की रोकथाम:-
उपरोक्त कीटों की रोकथाम के लिये कार्बोफ्यूरान 3जी या फॉरेट 10 जी दानेदार को 25-30 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने की जड़ों के पास देें। ध्यान रहे दवा डालने के बाद तुरन्त हल्की सिंचाई अवश्य करें व नमी बनाये रखें। ताकि दवा का प्रभाव कीटों पर समुचित रूप से हो सकें। प्रकोप को रोकने एवं तुरन्त असर के लिये क्विनालफॉस/क्लोरोपाईरीफॉस 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव भी करें।
रस चूसक कीट:- पाईरिल्ला
1. 30-35 प्रतिशत उपज में नुकसान के साथ 2-3 प्रतिशत रिकवरी में कमी।
2. सक्रियता मार्च से सितम्बर तक।
3. शिशु व प्रौढ़ पत्तियों से रस चूसते हुऐ, रसीला पदार्थ छोड़ते है जिस पर काली फफूंद आती है। पत्तियां पीली पड़ जाती है।
मिलीबग (चेपा कीट)
4. गांठों के पास मिलीबग चिपके रहते हैं एवं रस चूसते हैं। लसलसा पदार्थ पोरियों पर फैला रहता है। चीटों के गन्नों पर ऊपर नीचे आने जाने से प्रकोप का पता चलता है।
ब्लेकवग
5. प्रौढ़ काले रंग के होते हैं जबकि शिशु गुलाबी होती है दोनों पत्तियों से रस चूसते हैं। जड़ी में इसका प्रकोप अधिक होता है। पत्तियां पीली पड़ जाती हैं।
सफेद मक्खी
6. प्रौढ़ व शिशु सफेद काले रंग के छीटों जैसे अण्डाकार होते हैं एवं पत्तियों की निचली सतह पर चिपके रहकर रस चूसते है।
7. उपज में 50-80 प्रतिशत तक नुकसान एवं शक्कर रिकवरी में 1.5 से 2 प्रतिशत की कमी आती है व पौधा पीला पड़ता जाता है।
स्केल (पपड़ी) कीड़ा
पपड़ी की तरह गन्ने की पोरियों पर चिपके रहते हैें व रस चूसते हैं पत्तियां पीली होकर सूखने लगती है उपज में 40: तक एवं शक्कर रिकवरी में 1.5 से 2 प्रतिशत की कमी आती है। द्य यह कीट मार्च से अक्टूबर तक सक्रिय रहता है। वर्षा ऋतुु में इसका प्रकोप काफी तीव्र रहता है।

रस चूसक कीटों की रोकथाम

  • क्लोरोपाईरोफास/क्विनालफॉस 2 मि.ली. प्रति लि. पानी में घोलकर छिड़कें। कारगर असर हेतु जहां तक हो सके छिड़काव पत्तियों के दोनों तरफ होना चाहिये। जरूरत पड़े तो 15 दिन बाद दोहरायें।
  • मिलीबग एवं पपड़ी कीट हेतु गन्ने की पोरियों पर से पत्तियों छीलकर उपरोक्त दवाओं का छिड़काव गन्नों पर करें। फॉरेट दानेदार का प्रयोग भी असरकारक पाया गया है।

चूहा

  • भीगे अनाज के दानों पर तेल लगाकर जिंक फास्फाईड जहर को अच्छी तरह मिलायें व जिन्दा बिलों के पास रखें। पहले 1 या 2 दिन भ्रमित करने हेतु सादा चारा रखें। अनाज की जगह भजिया या पूडियां भी प्रयोग की जा सकती है।
  • बाकी बचे चूहों हेतु ब्रोमोडियोलान 0.005 की टिकिया बिलों के पास रखें।

कीट नियंत्रण हेतु जैविक प्रबंधन:-

  • पाईरिल्ला के सफल जैविक नियन्त्रण हेतु एपीरीकेनिया परजीवी से 5 लाख अण्डे या 5 हजार संखिया/ हेक्टर प्रकोपित फसल पर छोड़ें पाईरिल्ला अण्डों को नष्ट करने वाला टेट्रस्टिकस पाईरिल्ला ग्रसित अंडों के समूह युक्त पत्तों को काट कर जगह-जगह फैलायें।
  • सफेद मक्खी के सफल नियन्त्रण हेतु क्राईसोपरला 2500 अण्डे (लकड़ी का बुरादा एवं खाद्य के साथ) प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।
  • छेदक कीटों हेतु ट्राईकोग्रामा के 3 से 5 लाख अण्डे (15-20 ट्राईको कार्ड) प्रति हेक्टेयर खेत में लगायें।
  • पपड़ी कीडें़ के प्रबंधन हेतु कॉक्सीनिलिड परभक्षियों के 1500 वीटल (व्यस्क) प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।
  • अन्तरवर्तीय फसलों के लेने एवं पलवार बिछाने से छेदकों का प्रकोप कम होता है।

लाईट ट्रेप अवश्य लगायें:-

गन्ने के खेतो के पास 5&5 फुट का 3-4 इन्च गहरा गड्डा बनायें इसमें पॉलीथिन बिछाकर 1-2 इन्च पानी भरें, जिसमें कोई भी कीटनाशी डालें। बीचों-बीच 200 वाट का बल्ब लटकायें या लाईट ट्रेप रखें। इसे रात को 8 से 10 बजे तक ही चालू रखें। इसका प्रयोग सारा साल करें। सभी प्रकार के कीट प्रकाष से आकर्षित होकर नष्ट होंगे।

(स) गन्ने के रोगों पर नजऱ रखें:-

गन्ने में लाल सडऩ, उकटा, कण्डवा, घास जैसी बढ़वार (ग्रासी शूट) जैसी बीमारियां प्रमुख हैं। यह रोग गर्मी एवं वर्षा ऋतु में अधिक आसानी से दिखते हैं। इनका इलाज तो अच्छी जातियों का शुद्ध बीज, गर्म हवा उपचारित बीज का प्रयोग, बीजोपचार आदि ही हैं। खेत में उत्तम जल निकास लाल सडऩ आदि रोगों को फैलने से बचाता है।
रोगी पौधों को दिखते ही उन्हें निकाल कर नष्ट करें जिससे रोग आगे न फैल सके। रोगी फसल का बीज बिल्कुल प्रयोग न करें।

व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

five × two =

Open chat
1
आपको यह खबर अपने किसान मित्रों के साथ साझा करनी चाहिए। ऊपर दिए गए 'शेयर' बटन पर क्लिक करें।