खम्बे पे चढ़ा अलोकतंत्र

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किसान आंदोलन की विद्रूपता पर तीखा व्यंग्य
– विजी श्रीवास्तव, मो. : 9425028979
 1 फरवरी 2021, भोपाल, खम्बे पे चढ़ा अलोकतंत्र – उसने खंबे पे चढ़के बता दिया कि थोड़ी सी छूट मिल जाए तो हम कितना चढ़ सकते हैं। बद्दिमागी की बुलंदियां ही कह लो-वहां से गिरता तो न जाने कितना ऊपर जा सकता था। यह जानते हुए भी वो करतब दिखाता रहा। हर जगह अपना झंडा गाडऩे की जिद हम भारतीयों को औरों से कुछ ज्यादा है। कोई उकसा भर दे तो हम आकाश में उल्टा टंग सकते हैं।

ऊपर जाकर उस खंबा आरोही ने क्या सोचा होगा, यह हर किसी के सोच का विषय है। अपनी सोच के हिसाब से तो हर कोई ऊंचा ही सोचता है। हो सकता है उसने सोचा हो कि मैंने किला फतह कर लिया है। सोचा होगा कि लो देखो, मैं कानून से भी ऊंचा हो गया। सोचा होगा कि आज तो देश के कृषि विकास को गगन चुम्बी बनाकर ही छोड़ूंगा।
उसने जो भी सोचा, ऊंचाई पर चढ़कर सोचा, इसलिए ऊंचा ही सोचा होगा। मैं चाहकर भी इतना ऊंचा नहीं सोच सकता। क्योंकि मैं आधारभूत सोच रखने वाला व्यक्ति हूं। बहुत मुश्किल से ऊंचा सोचने की कोशिश की तो भी उसकी सोच से आगे नहीं निकल पायां। पर ज्यादा नहीं मेरी सोच, उसकी सोच से लगभग दो फुट ही कम रह गई होगी। मैं उस खम्बिस्तानी के बारे में यहीं तक सोच सका कि इतने ऊपर रिसक-रिसक कर चढऩे वाले की पेंट क्यों नहीं फटी। इतनी ऊंचाई तक छिपकली की तरह चढऩे में अंग वस्त्र तो क्या, कुछ अन्य अंगों को क्षतिग्रस्त होने की भी भरपूर संभावना थी। मुझे अतिरिक्त उत्सुकता यह जानने में भी है कि उसके इतने मजबूत वस्त्र स्वदेशी थे कि उसकी विचार धारा की ही तरह विलायती।

वो जो चढ़ा था, पता नहीं किसका सिर चढ़ा था, कितना ही नकचढ़ा था पर दिमागी रूप से पैदल था यह तो पक्का है। उसकी झंडगी यानि झंडा बरदारी को जिसने भी देखा होगा, दूर से उन्हें खंबे पर चढ़ा बच्चा ही लगा होगा। ठीक है कि वो बच्चा था नहीं लेकिन इतना बड़ा बचपना करके उसने अपनी मानसिक उम्र तो बता ही दी।
कई लोगों ने सांसे थाम के सोचा होगा कि यह चढ़ तो गया है पर उतरेगा कैसे। वो भूल गए होंगे कि हमारे देश में चढऩे और उतरने का सिद्धान्त एक ही है। चढऩे वाले की टांग खींचकर लोग नीचे उतार लेते हैं। ऊपर चढऩे के लिए भी अपने ऊपर वाले की टांग थामने का फार्मूला उपयोगी रहता है। टंगे हुओं की टांग को पीछे वाले थामने लगें तो अगले की प्रगति खुद-बखुद हो जाती है। पर वो पोल क्लाइम्बर रैप्टाइल कुछ अलग ही निकला। बातों में फिसल जाने का अभ्यासी रहा होगा, इसलिए आराम से फिसल कर नीचे आ गया।

ऊंचाई की बात की जाए तो देश के कई सपूतों ने बहुत ऊंचाइयों को छूकर देश का नाम रोशन किया है। कल्पना चावला और राकेश शर्मा तो कितने ही आकाशों के पार निकल गए थे। राकेश शर्मा से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी ने पूछा था कि वहां से भारत कैसा लग रहा है ? राकेश शर्मा का उत्तर आज भी हर भारतीय को रोमांचित करता है-”यकीन से कह सकता हूॅ, सारे जहां से अच्छा।” किन्तु गणतंत्र दिवस के मौके पर सारे जहां ने एक भारतीय को जिस ऊंचाई पर चढ़ा देखा, वो बिल्कुल अच्छा नहीं था।

अपनी जिद पर अड़े रहकर उन्होंने गणतंत्र दिवस पर अपनी मर्जी की परेड की। झंडा लहराया। मलखंब किया। ट्रेक्टरों पर करतब दिखाए। तलवार और खडग़ घुमा कर अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन भी कर लिया। गणतंत्र आहत था, देश शर्मिन्दा था पर आसमान से जनरल डायर, कायदे आजम, भिंडरावाला, अजमल कसाब और पुराने वायसरायों ने फूल जरूर बरसाए होंगे।

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