धान-गेहूं फसल चक्र या चक्रव्यूह

Share

1 मार्च, 2021, भोपाल । धान-गेहूं फसल चक्र या चक्रव्यूह – खेती में फसल चक्र का महत्व आदिकाल से जाना जा रहा है। उससे मिलने वाले लाभ से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। परंतु लाभकारी खेती की अंधी दौड़ में यदि सतत एक ही प्रकार या किस्म की फसलों को लगाने का सिलसिला चलाया जाता रहा तो परिणाम सफल फसल चक्र ना होकर चक्रव्यूह बन सकता है। जिससे बाहर निकलना चुनौती भी बन सकती है। चक्रव्यूह का संदर्भ द्वापर युग में जब महाभारत का युद्ध कौरव-पांडव के बीच चल रहा था तब सामने आया था, उसके पीछे की कहानी रोचक है। धनुर्धर अर्जुन महारानी सुभद्रा को युद्ध की बारीकियों के बारे में बता रहे थे उसमें चक्रव्यूह की रचना तथा उसे भेदना और बाहर आने का वृतांत था। महारानी सुभद्रा उस समय गर्भावस्था में थी अर्जुन कह रहे थे और सुभद्रा सुन रही थी। चक्रव्यूह को भेदने तक का वृतांत वे सुन सकी और निद्रा में समा गई उनके गर्भ में अभिमन्यु थे, जिन्होंने चक्रव्यूह को भेदने तक की कथा सुनी परंतु निकलने की कथा नहीं सुन पाये, परिणामस्वरूप 16 वर्ष बाद कौरव द्वारा निर्मित चक्रव्यूह को उन्होंने सफलता से भेदा परंतु बाहर जीवित नहीं आ सके। क्या धान केंद्र का फसल चक्र भी हमारे लिये एक चक्रव्यूह सा बन जायेगा जिससे निकलने का मौका हम चूक जायेंगे और उसके गंभीर परिणाम सामने आयेंगे। पंजाब की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी खासकर तवा कमांड क्षेत्र में जहां की भूमि काली गहरी है में भी धान-गेहूं फसल चक्र जोर पकड़ रहा है। धान की सुगंधित किस्मों को सफलता से लगाना और अधिक आमदनी पाने के लालच ने क्षेत्र के कृषकों को इस दिशा में तत्परता से दौडऩा शुरू कर दिया और आज की स्थिति में सोयाबीन का रकबा घट कर धान के रकबे में परिवर्तित होने लगा। आमतौर पर ऐसा होता है कि कृषक खेती से अधिक लाभ लेने के लालच में मिट्टी पर उसका क्या परिणाम होगा पर विचार नहीं कर पाते हैं।

60 के दशक से सदियों से खरीफ में काले पड़े खेतों में सोयाबीन का विस्तार चमत्कारी ढंग से हुआ और सोयाबीन-गेहूं फसल चक्र आर्थिक तथा भौतिक दशाओं में अच्छा साबित हुआ। क्षेत्र की गरीबी हटने लगी। सोयाबीन कम खर्च में अच्छा पैसा देने लगी, दो दशक तक यह फसल चक्र चलता रहा परंतु पिछले दशक से सोयाबीन की जगह धान ने ले ली जो कि कोई बुरी बात नहीं है परंतु धान-गेहूं एक ही वर्ग के धान्यों को लगाने से मिट्टी की दशा में परिवर्तन स्वाभाविक ही है जिस पर गंभीरता से विचार आज की आवश्यकता है। क्योंकि दोनों फसलों की जड़ें तीन इंच से गहरी नहीं जाता है अधिकतर जुताई ट्रैक्टर से की जाती है। जिसका हैरो भी तीन इंच से अधिक नहीं जाता है परिणामस्वरूप तीन इंच के नीचे की भूमि में कठोर परत जमने लगी है जो काफी कड़ी होती है। उसे भेद कर वर्षा जल या सिंचाई जल भीतर नहीं जा सकता है ना ही मिट्टी में छुपे पोषक तत्वों सरलता से ऊपर आ सकेंगे और फसल को उसका लाभ होना बंद होने लगेगा। परिणामस्वरूप आज जैसा उत्पादन भी नहीं मिल पायेगा अब जरूरत यह है कि नियम से दलहनी फसलों का समावेश धान-गेहूं फसल चक्र में किया जाये ताकि दलहनी की गहरी जड़ों से मिट्टी में उत्पन्न होने वाली कठोर परत के निर्माण पर रोक लग सके और भूमिगत बैक्टीरिया का आदान-प्रदान के साथ पोषक तत्वों के संचार पर रोक से बचा जा सके। आवश्यक होगा जायद में दलहनी का क्षेत्र और बढ़ाया जाये तथा खरीफ में धान की जगह दलहन अथवा रबी में गेहूं की जगह चने की फसल का विस्तार करके सफल फसल चक्र तैयार किया जाये और पनपने वाले इस चक्रव्यूह की रचना पर रोग लगाई जा सके और फसल चक्र के उद्देश्य तथा मायने को समझा जा सके।

Share
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published.