रबी फसलों में जल प्रबंधन

Share
  • दीपक चौहान (वैज्ञानिक-कृषि अभियांत्रिकी)
  • डॉ. मृगेन्द्र सिंह ( वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख)
  • डॉ. अल्पना शर्मा (वैज्ञानिक), डॉ. बृजकिशोर प्रजापति (वैज्ञानिक)
  • भागवत प्रसाद पंद्रे (कार्यक्रम सहायक)
    कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर
    deepakchouhan22@gmail.com

6 दिसंबर 2021, रबी फसलों में जल प्रबंधन – सभी स्रोतों को मिलाकर विश्व में कुल 1384 मिलियन किमी जल उपलब्ध है। उक्त जल का लगभग 97.16 प्रतिशत भाग समुद्र के लवणीय जल के रूप में पाया जाता है, जोकि सिंचाई के लिये अनुपयुक्त है। केवल 2.84 प्रतिशत जल सिंचाई के लिये उपयुक्त है। विश्व के शुद्ध स्रोतों का भी मात्र 0.52 प्रतिशत भाग सतही स्रोतों के रूप में पाया जाता है और सिंचाई के रूप में फसलों के उत्पादन हेतु उपयोग किया जा सकता है। भूमिगत जल स्रोत, जोकि 8.062 मिलियन किमी है, का भी मात्र 9.86 प्रतिशत भाग ही उपयोग किया जा सकता है। इन आँकड़ों से यह निष्कर्ष निकलता है कि मानव एवं उसके सहायक जीवों का जीवन-यापन इस सीमित जल भण्डार पर ही निर्भर करता है।

फसलोत्पादन हेतु भूमि में जल के समुचित ढँग से उपयोग करने की कला को उचित जल प्रबंधन की संज्ञा दी जाती है। जल प्रबंधन के अंतर्गत सिंचाई एवं जलनिकास को सम्मिलित किया जाता है। पौधों के जीवन काल में जल का महत्वपूर्ण स्थान है। संरचना की दृष्टि से 84-99 प्रतिशत तक पौधों में जल पाया जाता है। पौधों की विभिन्न शारीरिक क्रियाओं को जल प्रभावित करता है। फसलों की वृद्धि एवं विकास हेतु भूमि में नमी का होना नितान्त आवश्यक है। यदि वर्षा हो जाती है, तो भूमि को नमी प्राप्त हो जाती है, अन्यथा वर्षा के अभाव में फसल की वृद्धि एवं विकास दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। फसल की अधिकतम एवं उच्चकोटि की उपज प्राप्त करने हेतु उचित मात्रा एवं उचित अंतराल पर सिंचाई करनी पड़ती है, जो सिंचाई की सुनिश्चित व्यवस्था से ही सम्भव है, वर्षा से नहीं। अत: पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिये सिंचाई की आवश्यकता होती है।

सिंचाई का महत्व

  • पौधों का 80-90 प्रतिशत भाग पानी का बना होता है और रसायनिक रूप में पानी, पौधों का एक अंग होता है।
  • कोशिका द्रव का मुख्य भाग (80-90 प्रतिशत) पानी है। अत: कोशिका विभाजन बिना जल के सम्भव नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि पौधों की पूर्ण वृद्धि जल पर ही निर्भर है।
  • बीज के अन्दर भ्रूण का अंकुरण बिना जल के नहीं हो सकता है।
  • पौधों में जल वाहक का कार्य भी करता है। जड़ें पोषक तत्वों को घोल के रूप में चूसती हैं व जल के माध्यम से चूसे गये पोषक तत्व ही पौधों के अन्य आवश्यक भागों में पहुँचते हैं।
  • प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया में जल एवं कार्बन डाइऑक्साइड कच्चे पदार्थ के रूप में प्रयोग होते हैं, जो प्रकाश की उपस्थिति में पर्णहरित द्वारा कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तित हो जाते हैं अर्थात् पौधों के लिये कार्बोहाइड्रेट आवश्यक पदार्थ भी जल की उपस्थिति में ही बनते हैं।
  • पत्तियों में निर्मित होने वाले कार्बोहाइड्रेट का पत्तियों से दूसरे भागों में स्थानान्तरण भी जल द्वारा ही होता है।
  • जल पौधों की कोशिकाओं को फुलाकर रखता है, जिसके फलस्वरूप कोशिकाएँ आकार में वृद्धि करके फसलों के पकने के समय में वृद्धि कर सकती हैं जिसके फलस्वरूप बाजार की मांग के अनुसार फसलें काटी जा सकती है।
  • खेत में पानी लगाने से फसलों के हानिकारक कीट जैसे दीमक आदि को नष्ट किया जा सकता है।
  • जल पौधों की जलोत्सर्जन क्रिया के लिये भी आवश्यक है। इस प्रक्रिया में पौधे अपने आप को वातावरण के अधिक तापमान (लू), कम तापमान (पाला) आदि से सुगमता से बचा सकते हैं।
  • निरन्तर भूमि की सिंचाई करने से मृदा कणों के आकार में कमी होती है, जो फसलों की बढ़वार के लिये उपयुक्त है।
  • भूमि में फसलों की वृद्धि हेतु अनेक लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु जैसे राइजोबियम, जीवांश पदार्थ को सड़ाने वाले सूक्ष्म जीवाणु जैसे नाइट्रोसोमोनास, नाइट्रोसो को कम करके अनेक लाभदायक फफूंदियाँ, एलगी, एंजाइम भी मृदा नमी की उपयुक्त अवस्था पर ही पनपते हैं।
  • लवणीय या ऊसर मृदा के सुधार के लिये विषैले प्रभाव के तत्वों का उदीलन सिंचाई द्वारा ही सम्भव है या सिंचाई जल में घोलकर इन विषैले लवणों को खेत से बाहर निकालते हैं।
सिंचाई कब करें ?

रबी फसलों में सिंचाई योजना बनाते समय मिट्टी का प्रकार, फसल, फसल की किस्म, वृद्धि काल, मिट्टी में जीवांश पदार्थ की मात्रा और खेत में विगत वर्ष बोई गयी फसल आदि का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। जब भूमि में जल की इतनी कमी हो जाए कि पौधों की वृद्धि एवं विकास दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पडऩे की सम्भावना हो, उस अवस्था में आवश्यकतानुसार सिंचाई कर दें। अधिकतर फसलों की सिंचाई मृदा में 50 प्रतिशत उपलब्ध जल रहने पर करनी चाहिए। सिंचाई के सही समय का पता लगाने हेतु विभिन्न यंत्रों का उपयोग भी किया जाता है जैसे रेपिड मोयस्चर मीटर, टेनशियो मीटर आदि परन्तु कृषक इनके उपयोग से बिल्कुल अनविज्ञ है। इनका उपयोग अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों द्वारा किया जाता है।

सिंचाई कैसे करें ?

रबी फसलों की सिंचाई के लिये जल की क्षमता में वृद्धि हेतु यह नितान्त आवश्यक है कि सिंचाई हेतु उपयुक्त सिंचाई विधि का चयन किया जाए, जो कि भूमि की सतह, भूमि की किस्म, पानी की उपलब्धता, सिंचाई जल में लवणों की मात्रा और सिंचाई जल की वितरण पद्धति पर निर्भर करता है। फसलों की सिंचाई हेतु उपयुक्त सिंचाई विधि का चयन नितान्त आवश्यक है। अत: स्रोत से पानी सीधे खेत में नहीं छोड़ें, इसके लिये खेत को लंबाई ढलान की ओर 4-6 मीटर की नालियों का निर्माण कर लें और मेड़ के सहारे मुख्य नाली के क्रम से सिंचाई जल छोड़ें और भूमि ऊँची-नीची हो तो बौछारी सिंचाई करें। इससे कम जल से अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है।

सिंचाई का समय

जब पौधों की वृद्धि एवं विकास में उपलब्ध नमी के कारण महत्वपूर्ण कमी आनी शुरू हो जाए, तब ही सिंचाई कर दें। खेत में सिंचाई करने का अनुमान निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर भी लगाया जा सकता है:-
पौधों की बाहरी दशा के आधार पर:– विभिन्न पौधों में सिंचाई की आवश्यकता विभिन्न लक्षणों जैसे पत्तियों का मुरझाना, पत्तियों का रंग बदलना अथवा कम या अधिक गहरा हरे रंग आदि को देखकर लगाया जा सकता है।

मिट्टी के गुण

मिट्टी के भौतिक गुणों को देखकर सिंचाई के समय का पता लगाया जा सकता है। चिकनी मिट्टी में नमी की कमी के कारण दरारें पडऩी शुरू हो जाती हैं।

मृदा नमी माप कर:– फसल की सिंचाई का सही पता लगाने हेतु रेपिड मोयस्चर और टेनशियोमीटर का उपयोग किया जा सकता है।
पौधों के जीवन में क्रान्तिकारी अवस्थाओं के आधार पर:– समस्त फसलों के पौधों के जीवन काल में कुछ ऐसी क्रान्तिकारी अवस्थाएँ होती हैं जिनमें पौधे भूमि से पानी अधिक मात्रा में चूसते हैं। यदि इन अवस्थाओं में भूमि में पानी की कमी हो जाती है तो पौधों के विकास, बढ़वार एवं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इन अवस्थाओं को सिंचाई की दृष्टि से क्रान्तिक अवस्थायें कहते हैं।

Share
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published.