खेत में जिंक की कमी नहीं, उपलब्धता की समस्या है: क्षारीय मिट्टी की छिपी हुई चुनौती
22 जून 2026, नई दिल्ली: खेत में जिंक की कमी नहीं, उपलब्धता की समस्या है: क्षारीय मिट्टी की छिपी हुई चुनौती – हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई सिंचित क्षेत्रों में किसान एक दिलचस्प लेकिन गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं। खेत में उर्वरकों की कमी नहीं है, सिंचाई भी पर्याप्त है, लेकिन फसलों में पीलापन दिखाई देता है। धान में जिंक की कमी, गेहूं में कमजोर वृद्धि, बागवानी फसलों में आयरन की कमी और सब्जियों में पीली पत्तियां आम होती जा रही हैं।
पहली नजर में यह पोषक तत्वों की कमी लगती है, लेकिन कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि कई मामलों में समस्या पोषक तत्वों की अनुपस्थिति नहीं बल्कि उनकी अनुपलब्धता होती है।
क्षारीय मिट्टी का पीएच सामान्यतः 7.5 से अधिक होता है। ऐसी मिट्टियों में जिंक, आयरन, मैंगनीज और कॉपर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व रासायनिक रूप से ऐसे रूप में बदल जाते हैं जिन्हें पौधे आसानी से अवशोषित नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप मिट्टी में पोषक तत्व मौजूद होने के बावजूद फसलें उनकी कमी के लक्षण दिखाने लगती हैं।
जिंक की कमी आज भारतीय कृषि की सबसे व्यापक सूक्ष्म पोषक तत्व समस्या बन चुकी है। धान में जिंक की कमी होने पर पत्तियों पर पीली धारियां दिखाई देती हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। गेहूं, मक्का और कपास जैसी फसलों में भी इसका प्रभाव उत्पादन पर दिखाई देता है।
आयरन की कमी विशेष रूप से सब्जियों और बागवानी फसलों में गंभीर समस्या बनती जा रही है। नई पत्तियां पीली हो जाती हैं जबकि उनकी नसें हरी बनी रहती हैं। कई किसान इसे रोग समझकर फफूंदनाशकों का छिड़काव कर देते हैं, जबकि वास्तविक समस्या पोषक तत्व की होती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार क्षारीय मिट्टी में साधारण सूक्ष्म उर्वरकों की तुलना में केलेटेड उर्वरक अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं। Zn-EDTA और Fe-EDTA जैसे स्रोत उच्च पीएच में भी पोषक तत्वों को उपलब्ध बनाए रखते हैं। यही कारण है कि आधुनिक फर्टिगेशन प्रणालियों में इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
जैविक पदार्थों की कमी भी इस समस्या को बढ़ाती है। जब मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर घटता है तो सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता और कम हो जाती है। गोबर खाद, कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट जैसे स्रोत न केवल मिट्टी की संरचना सुधारते हैं बल्कि सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद करते हैं।
क्षारीय मिट्टियों में खेती का भविष्य केवल एनपीके प्रबंधन तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले वर्षों में सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रबंधन उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना आज नाइट्रोजन और फास्फोरस का प्रबंधन माना जाता है। जो किसान मिट्टी की वास्तविक स्थिति को समझकर उर्वरक चयन करेंगे, वे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकेंगे।
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