उत्तरप्रदेश में नई पद्धति से गन्ने की खेती दे रही बेहतर आमदनी

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  • दीपान्विता गीता नियोगी

4 अक्टूबर 2021, उत्तरप्रदेश में नई पद्धति से  गन्ने की खेती दे रही बेहतर आमदनी –

उत्तरप्रदेश के बिजनौर जिले के खानपुर गांव के निवासी नरेंद्र कुमार बीते दो दशक से गन्ने की खेती करते हैं। वह कहते हैं, ‘मेरे पिता ने बेहतर आमदनी के लिए गन्ने की खेती शुरू की। अभी हम लोग करीब 3.23 हेक्टेयर खेत में गन्ने की खेती करते हैं।’  पर बीते कुछ सालों में पानी की खपत को देखते हुए नरेंद्र कुमार ने गन्ने की खेती का तरीका बदला है। अब वे ट्रेंच विधि से खेती कर रहे हैं ताकि कम से कम पानी की जरूरत हो। इसमें पतली नाली के डिजाइन में एक सिरे से दूसरे सिरे में खुदाई होती है और किनारे किनारे मेढ़ बनाये जाते हैं।

उत्तरप्रदेश के 15 जिलों में 22.34 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती है। ‘हमारे गांव में 70 प्रतिशत किसान गन्ने की खेती करते हैं। मैंने ट्रेंच तकनीक से चार साल पहले खेती करना शुरू किया। इसकी मदद से 18 फीसदी तक पानी की बजत होने लगी,’ कुमार ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया। कुमार की तरह गांव के कुछ और किसानों ने ट्रेंच विधि को अपनाया। पारंपरिक सिंचाई के तरीके में पानी को खेत तक पहुंचाने में काफी बिजली की आवश्यकता होती थी। करुला नदी के आसपास खेती करने वाले 300 किसानों ने यह तरीका अपनाया और बचा हुआ पानी नदी में वापस छोडऩे लगे। करुला रामगंगा नदी की सहायक नदी है।

  • उत्तरप्रदेश में गन्ने की सिंचाई के लिए पानी की काफी खपत होती है। नदी से पानी निकालने की वजह से गन्ना उत्पादन वाले इलाकों में कई नदियों के सूखने की भी रिपोर्ट आई है।
  • कुछ किसान गन्ने की खेती के लिए कम पानी की खपत वाला तरीका अपना रहे हैं। इस तरीके को ट्रेंच विधि कहते हैं। कुछ जिलों में किसानों ने 2017 से ही इसे अपनाना शुरू कर दिया।
  • इस तरीके से उत्तरप्रदेश के 300 किसानों ने गन्ने की फसल में पानी की खपत कम की है जिससे वर्ष 2019 से 2021 के बीच छ: करोड़ लीटर पानी की बचत हुई है।

करुला नदी की हालत इतनी बुरी हो गई थी कि अक्टूबर और जून के महीने में नदी का बहाव खत्म हो जाता था। उत्तर प्रदेश में फ्लड इरिगेशन के बदले ट्रेंच विधि से खेती की शुरुआत 10 साल पहले हो गई थी। हालांकि, किसानों में तब इस पद्धति को अपनाने को लेकर हिचकिचाहट थी।

नदी का संरक्षण

गंगा की सहायक नदी रामगंगा उत्तरप्रदेश की एक बेहद प्रदूषित नदी मानी जाती है। नदी बचाने के लिए डब्लूडब्लूएफ इंडिया ने कृषि में पानी की खपत कम करने का प्रयास शुरू किया। गन्ना किसानों को नहरों के जरिए पानी पहुंचता है जिससे उन्हें सिंचाई में आसानी होती है। कई बार सिंचाई के दौरान पानी की बर्बादी भी होती है। उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के साथ मिलकर डब्लूडब्लूएफ-इंडिया ने बिजनौर जिले में किसानों के साथ काम करना शुरू किया।

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‘खेती में पानी की खपत की वजह से देश की ज्यादातर नदियां गर्मी में दम तोडऩे लगती है। भारत में 80 प्रतिशत तक पानी खेती के काम में उपयोग होता है। कई जानकारों को लगता है कि खेती में पानी का ठीक से इस्तेमाल नहीं होता है। जितना पानी नदी से निकाला जाता है उतने का इस्तेमाल नहीं हो पाता, डब्लूडब्लूएफ के रिवर्स, वेटलैंड्स और वाटर पॉलिसी के डायरेक्टर सुरेश बाबू बताते हैं। बाबू कहते हैं कि नदी को पुनर्जीवित करने का काम वर्ष 2017 में शुरू हुआ। आज गन्ना किसान रामगंगा मित्र बनकर नदी को बचाने के अभियान से जुड़े हुए हैं।
रिवर्स, वेटलैंड्स और वाटर पॉलिसी, डब्लूडब्लूएफ-इंडिया के एसोसिएट डायरेक्टर नितिन कौशल ने बताया कि सिंचाई की व्यवस्था सरकार की ओर से नि:शुल्क होती है। शायद इसी वजह से पानी बचाने की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता।

गन्ना किसान नहर के अलावा भूजल का भी इस्तेमाल सिंचाई के लिए करते हैं। मुजफ्फरनगर और मेरठ जैसे जिलों में सिंचाई के लिए भूतल सिंचाई या फ्लड इरिगेशन का तरीका वर्षों से अपनाया जा रहा है,’ कौशल कहते हैं। इन इलाकों में भी ट्रेंच विधि से सिंचाई की शुरूआत 10 वर्ष पहले हुई थी, लेकिन बहुत कम किसानों ने इसे अपनाया। ‘हमने पुराने ट्रेंच विधि के डिजाइन में कुछ बदलाव कर किसानों की समस्याओं का समाधान किया। ट्रेंच के आकार में भी बदलाव किया गया,’ कौशल बताते हैं।

गन्ना खेतों में इंटरक्रॉपिंग

शुरुआत में गन्ना किसानों के साथ नदी बचाने को लेकर काम करने में मुश्किलें आईं। ‘कुछ किसानों का साथ मिला तो बाकी उनसे प्रभावित होकर साथ आ गए,’ बाबू ने बताया। रिवर बेसिन मैनेजमेंट, डब्लूडब्लूएफ-इंडिया के सीनियर कॉर्डिनेटर राजेश कुमार बाजपेयी मुरादाबाद जिले की जिम्मेदारी संभालते हैं। उन्होंने बताया कि किसानों को खेत पर जाकर इसके फायदे समझाए गए ताकि अधिक से अधिक किसान इसे अपनाएं। करुला नदी 90 किलोमीटर लंबी है। यह मुरादाबाद और बिजनौर जिले से होकर बहती है। पहले नहर से पानी लेने के लिए किसानों को भुगतान करना होता था, लेकिन 2012 के बाद इसे नि:शुल्क कर दिया गया,‘ उन्होंने बताया।

पानी बचाने के साथ-साथ ट्रेंच विधि की वजह से इंटरक्रॉपिंग यानी एक ही जमीन पर कई तरह की फसलें उगाने में भी सहायता मिली। उदाहरण के लिए किसानों ने गन्ने के खेत में सरसों और मूंग भी उगाना शुरू किया। डब्लूडब्लूएफ इंडिया के मुताबिक पानी का समुचित उपयोग 34 प्रतिशत तक बढ़ गया। ‘जमीन में नमी रहने की वजह से मैंने एक से अधिक फसल लेना शुरू किया। ट्रेंच में जब हम पानी देते हैं तो फसल की जरूरत के मुताबिक ही पानी खर्च होता है। दूसरी फसल लेने के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता नहीं होती है। खेत में नमी बनी रहती है। और अक्टूबर महीने में सरसों या दूसरी फसल बिना सिंचाई के ही हो जाती है। इस तरह से पैसों की बचत भी हो रही है, कुमार ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया।

खानपुर गांव के किसान चमन सिंह 1.61 हेक्टेयर में खेती करते हैं। वे 1.21 हेक्टेयर में गन्ना उगाते हैं और बची हुई जमीन में धान लगाते हैं। कहते हैं, ‘मैं ट्रेंच के बीच चार से पांच फीट की दूरी रखता हूं, और बीच में मूंग या सरसो लगाता हूं। इस तरह बिना अतिरिक्त खर्च किए मेरे जैसे किसानों की आमदनी बढ़ रही है।‘ कौशल ने बताया कि 2017 में काम शुरू करने के दो साल बाद 2019 में करुला नदी में पानी वापस जाना शुरू हुआ। ‘मई 2019 से लेकर मार्च 2021 तक 6 करोड़ लीटर पानी करुला नदी में छोड़ा गया है,’ उन्होंने बताया।

पानी की बचत

पानी की बचत के साथ-साथ गन्ने की फसल की गुणवत्ता भी बढ़ी और पैदावार में बढ़ोतरी देखी गईं। जो किसान नहर के अंतिर छोर पर खेती करते उन्हें पानी नसीब नहीं होता था, और वे भूजल का इस्तेमाल करते थे। अब पानी की बचत की वजह से उन किसानों के पास भी पानी पहुंच रहा है।

कोलासागर गांव के ऐसे ही एक किसान गंभीर त्यागी ने बताया कि 2017 के बाद उनकी पानी की समस्या दूर हो गई। मुझे पहले पानी नहीं मिल पाता था और पैदावार में कमी होती थी। अब मुझे अपने 0.404 हेक्टेयर खेत से 50 से 100 क्विंटल अधिक गन्ना मिल रहा है,‘ वह कहते हैं।

नहर से वापस नदी में पानी पहुंचाने के लिए नहर के अंतिम छोर से नदी तक नाला बनाया गया। इससे बचा हुआ पानी नदी तक पहुंचने लगा, कौशल ने बताया।
मुरादाबाद उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के ओम दत्त रावत कहते हैं कि किसानों को इंटरक्रॉपिंग से काफी फायदा हो रहा है।

हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के वैज्ञानिक जीवी रामंजनेयुलु कहते हैं कि ट्रेंच विधि काफी लाभकारी है। ‘जल संरक्षण में यह काफी सहायक है। इससे पानी की खपत कम होती है और पानी की बचत भी होती है। मिट्टी के प्रकार के मुताबिक इससे 10 से 30 फीसदी तक पानी की बचत होती है,’ उन्होंने कहा। ( मोंगाबे)

 

 

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