Soybean Farming: सूखा हो या जलभराव, सोयाबीन की फसल बचाएगी BBF और रिज-फरो तकनीक
09 जुलाई 2026, नई दिल्ली: Soybean Farming: सूखा हो या जलभराव, सोयाबीन की फसल बचाएगी BBF और रिज-फरो तकनीक – खरीफ सीजन में मौसम का मिजाज लगातार बदल रहा है। कई इलाकों में पर्याप्त बारिश नहीं होने से सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण खेतों में जलभराव की समस्या सामने आ रही है। ऐसे हालात में भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IISR), इंदौर ने किसानों को सलाह दी है कि वे सोयाबीन की बुवाई ब्रॉड बेड एंड फरो (BBF), रिज-फरो (Ridge-Furrow) या रेज्ड बेड पद्धति से करें। इससे फसल को विपरीत मौसम की परिस्थितियों से काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
संस्थान ने 6 से 12 जुलाई 2026 की साप्ताहिक एडवाइजरी में कहा है कि मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए परंपरागत समतल बुवाई के बजाय आधुनिक बुवाई तकनीकों को अपनाना किसानों के लिए अधिक लाभकारी रहेगा।
क्या है BBF और रिज-फरो तकनीक?
वैज्ञानिकों के अनुसार, BBF (Broad Bed and Furrow) तकनीक में चौड़ी क्यारियां बनाई जाती हैं, जिनके बीच नालियां रहती हैं। वहीं रिज-फरो पद्धति में ऊंची मेड़ों (रिज) पर बुवाई की जाती है और उनके बीच पानी निकासी के लिए फरो यानी नालियां बनाई जाती हैं। ये दोनों तकनीकें खेत में जल प्रबंधन को बेहतर बनाती हैं।
सूखे और जलभराव दोनों से मिलता है बचाव
एडवाइजरी के मुताबिक, कम बारिश होने पर नालियों में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे फसल को सूखे के दौरान भी आवश्यक नमी मिलती रहती है। वहीं अधिक बारिश की स्थिति में अतिरिक्त पानी नालियों के माध्यम से बाहर निकल जाता है, जिससे खेत में जलभराव नहीं होता और पौधों की जड़ें सड़ने से बच जाती हैं।
कीट प्रबंधन में भी मिलती है मदद
संस्थान ने किसानों को सलाह दी है कि यदि BBF या रिज-फरो पद्धति से बुवाई की गई है, तो नालियों में सुवा (डिल) या गेंदा (मैरीगोल्ड) की बुवाई भी करें। ये पौधे हानिकारक कीटों को आकर्षित करते हैं, जिससे सोयाबीन की मुख्य फसल पर कीटों का दबाव कम होता है और कीटनाशकों की आवश्यकता भी घट सकती है।
देर से बुवाई में भी कारगर तकनीक
वैज्ञानिकों ने बताया कि जिन क्षेत्रों में अभी सोयाबीन की बुवाई बाकी है, वहां किसान कम अवधि में पकने वाली किस्मों का चयन करें। देर से बुवाई की स्थिति में 30 सेंटीमीटर कतार दूरी और 90 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर रखने की सलाह दी गई है। साथ ही, बुवाई तभी करें जब क्षेत्र में कम से कम 100 मिमी बारिश हो चुकी हो।
बदलते मौसम में वैज्ञानिकों की सलाह मानना जरूरी
भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। ऐसे में BBF, रिज-फरो और रेज्ड बेड जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर किसान सोयाबीन की फसल को सूखे और जलभराव दोनों से बचा सकते हैं। समय पर अपनाई गई यह तकनीक फसल की बेहतर बढ़वार, पौधों की सुरक्षा और उत्पादन बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकती है।
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