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फसल की खेती (Crop Cultivation)

बारिश में लगाएं मक्का की ये 7 हाई-यील्ड वैरायटी, 85 से 112 दिनों में होंगी तैयार; 70 क्विंटल तक मिलेगी पैदावार    

20 अगस्त 2026, नई दिल्ली: बारिश में लगाएं मक्का की ये 7 हाई-यील्ड वैरायटी, 85 से 112 दिनों में होंगी तैयार; 70 क्विंटल तक मिलेगी पैदावार – बारिश का मौसम मक्का की खेती के लिए अहम माना जाता है, लेकिन अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चुनाव सबसे जरूरी है। हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग ने अलग-अलग क्षेत्रों और किसानों की जरूरत के हिसाब से मक्का की कई उन्नत किस्मों को अनुमोदित किया है। इनमें गिरिजा कम्पोजिट, बजौरा मक्का, एच.क्यू.पी.एम.-1, पी.एम.जैड.-4, बजौरा पॉप कार्न और पालम संकर मक्का-2 जैसी किस्में शामिल हैं। इनकी खासियत अलग-अलग है। 

इनमें कुछ किस्में कम समय में तैयार होती हैं, तो कुछ अच्छी पैदावार के साथ पॉपकॉर्न और स्वीट कॉर्न जैसे अलग-अलग उपयोग के लिए भी उपयुक्त हैं। वहीं, कुछ 68-78 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देने की क्षमता रखती हैं। यहां जानिए इनके अलग-अलग फायदे, खासियत और विशेषताएं।

1. गिरिजा कम्पोजिट

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गिरिजा कम्पोजिट को प्रदेश के निचले और मध्यवर्ती क्षेत्रों के साथ अधिक वर्षा वाले उन क्षेत्रों के लिए अनुमोदित किया गया है, जहां पानी का निकास नहीं होता। यह समय पर तैयार होने वाली और अधिक उपज देने वाली किस्म है। इसके पौधे मध्यम लंबाई के होते हैं। तना मोटा और पत्ते गहरे हरे व सीधे होते हैं, जिससे पौधे गिरते नहीं हैं। एक पौधे पर दो भुट्टे लगते हैं और उनके ऊपर कसा हुआ छिलका होता है। दाने हल्के नारंगी रंग के और कठोर होते हैं। यह किस्म 110 दिनों में तैयार हो जाती है और इसकी उपज करीब 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

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2. बजौरा मक्का

बजौरा मक्का जल्दी तैयार होने वाली किस्म है। यह मध्यवर्ती और ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके दाने चमकीले, नारंगी और कठोर होते हैं। भुट्टे पौधे के बीच में लगते हैं, जिससे इन्हें तोड़ना आसान रहता है और पौधे गिरते नहीं हैं। यह किस्म मेडिस टर्सिकम झुलसा रोग सहनशील है। यह 85 से 94 दिनों में तैयार हो जाती है और इसकी उपज करीब 35-38 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

3. एच.क्यू.पी.एम.-1

एच.क्यू.पी.एम.-1 अधिक पैदावार देने वाली उच्च गुणवत्ता वाली प्रोटीन से भरपूर सिंगल क्रॉस हाइब्रिड मक्का किस्म है। इसमें सामान्य मक्का की तुलना में जरूरी अमीनो एसिड लाइसीन और ट्रिप्टोफेन की मात्रा दोगुनी पाई जाती है। इससे कुपोषण की समस्या के समाधान के साथ पशु, मुर्गी और दाना उद्योग को भी बढ़ावा मिल सकता है।

इसके भुट्टे लंबे और गोलाकार होते हैं। दाने पीले और पिचके यानी डेंट प्रकार के होते हैं। पौधे मध्यम ऊंचाई के, पत्ते मध्यम चौड़े और गहरे हरे रंग के होते हैं। तने मोटे होते हैं और भुट्टा पौधे के बीच में लगता है, इसलिए हवा से गिरने की समस्या कम होती है। इसकी औसत पैदावार 68-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह मेडिस टर्सिकम झुलसा रोग अवरोधी है और 110-112 दिनों में तैयार हो जाती है। यह प्रदेश के निचले और मध्यवर्ती क्षेत्रों में 1200 मीटर ऊंचाई तक उपयुक्त है।

4. पी.एम.जैड.-4

पी.एम.जैड.-4 अधिक पैदावार देने वाली मध्यम अवधि की संकर किस्म है। यह सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसका पौधा मध्यम ऊंचाई का होता है और पत्तियां चौड़ी तथा आधी झुकी हुई होती हैं। भुट्टे लंबे और मोटे होते हैं तथा पौधे के बीच में लगते हैं। इसके दाने मोटे, सेमी फ्लिंट और सुनहरी पीले रंग के होते हैं। एक भुट्टे में करीब 400 दाने होते हैं। यह किस्म हरे भुट्टे और दाने दोनों के लिए उपयुक्त है। तना मोटा होने के कारण पौधे के गिरने की संभावना कम रहती है। इसकी औसत पैदावार 78 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह 96-105 दिनों में तैयार हो जाती है। अच्छी पैदावार के कारण यह प्रदेश में लोकप्रिय है और हर क्षेत्र में उगाई जाती है। हाइब्रिड किस्म होने के कारण इसका बीज हर बार नया इस्तेमाल करना होता है।

5. बजौरा पॉप कार्न

बजौरा पॉप कार्न विशेष प्रकार की मक्का किस्म है, जो पॉपकॉर्न के लिए उपयुक्त है। यह हिमाचल प्रदेश के निचले और मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। भूनने पर यह करीब 20 गुना ज्यादा फूल जाती है। इसके दाने छोटे, मोती जैसे गोल, सख्त, चमकीले और संतरी-पीले फ्लिंट होते हैं। 1000 दानों का वजन करीब 120 ग्राम होता है। पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं और भुट्टे लंबे व पतले होते हैं। इसकी औसत पैदावार 25-28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह 95-100 दिनों में तैयार हो जाती है। यह प्रमुख पत्ता झुलसा रोगों के प्रति सहनशील है। विभाग के अनुसार, यह सामान्य दाने वाली मक्का की तुलना में 6-7 गुना अधिक आय दे सकती है और इसे नकदी फसल के रूप में अपनाया जा सकता है।

6. बजौरा स्वीट कार्न

बजौरा स्वीट कार्न मीठी मक्का है, जिसका उपयोग ताजा खाने और प्रोसेस्ड उत्पादों के लिए किया जाता है। इसमें सामान्य मक्का की तुलना में शर्करा की मात्रा अधिक होती है। परागण के 18-21 दिन बाद इसमें शर्करा की मात्रा अधिकतम होती है और यही हरे भुट्टे की तुड़ाई के लिए उपयुक्त समय है। इसके दानों का छिलका सामान्य मक्का की तुलना में पतला होता है, जिससे दाने अधिक मुलायम रहते हैं। पौधों के तने मध्यम ऊंचाई और मोटे होते हैं। प्रत्येक पौधे के मध्य में 1-2 भुट्टे लगते हैं। दाने पीले-सुनहरे रंग के होते हैं और इनमें 20-22 प्रतिशत शर्करा होती है। यह किस्म 100-105 दिनों में तैयार होती है और इसकी औसत पैदावार 28-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह निचले और मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।

7. पालम संकर मक्का-2

पालम संकर मक्का-2 अधिक पैदावार देने वाली मध्यम अवधि की सिंगल क्रॉस संकर किस्म है। यह हिमाचल प्रदेश के निचले और मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसकी पत्तियां चौड़ी, गहरे हरे रंग की और झुकी हुई होती हैं। पौधा मध्यम ऊंचाई का होता है और भुट्टे बीच में लगते हैं। इसके दाने पीले और सेमी फ्लिंट होते हैं। यह किस्म टर्सिकम और मेडिस लीफ ब्लाइट के लिए अवरोधी है। इसकी औसत उपज 68-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

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