मूंगफली में कीट-रोग प्रबंधन

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21  अगस्त 2021, मूंगफली में कीट-रोग प्रबंधन – 

कीट रोमिल इल्ली- रोमिल इल्ली पत्तियों को खाकर पौधों को अंगविहीन कर देता है। पूर्ण विकसित इल्लियों पर घने भूरे बाल होते हैं। यदि इसका आक्रमण शुरू होते ही इनकी रोकथाम न की जाय तो इनसे फसल की बहुत बड़ी क्षति हो सकती है।

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इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक है कि खेत में इस कीड़े के दिखते ही जगह-जगह पर बन रहे इसके अण्डों या छोटे-छोटे इल्लियों से लद रहे पौधों या पत्तियों को काटकर या तो जमीन में दबा दिया जाय या फिर उन्हें घास-फूँस के साथ जला दिया जाय। इसकी रोकथाम के लिए क्विनालफास 1 लीटर कीटनाशी दवा को 700-800 लीटर पानी में घोल बना प्रति हेक्टेयर छिडक़ाव करें।

माहो-

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सामान्य रूप से छोटे-छोटे भूरे रंग के कीड़े होते हैं। तथा बहुत बड़ी संख्या में एकत्र होकर पौधों के रस को चूसते हैं। साथ ही वाइरस जनित रोग के फैलाने में सहायक भी होती है। इसके नियंत्रण के लिए इस रोग को फैलने से रोकने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 1 मि.ली. को 1 लीटर पानी में घोल कर छिडक़ाव कर दें।

लीफ माइनर-

लीफ माइनर के प्रकोप होने पर पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे दिखाई पडऩे लगते हैं। इसके गिडार पत्तियों में अन्दर ही अन्दर हरे भाग को खाते रहते हैं और पत्तियों पर सफेद धारियाँ सी बन जाती हैं। इसका प्यूपा भूरे लाल रंग का होता है इससे फसल की काफी हानि हो सकती हैं। मादा कीट छोटे तथा चमकीले रंग के होते हैं मुलायम तनों पर अण्डा देती है। इसकी रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 1 मि.ली. को 1 लीटर पानी में घोल छिडक़ाव कर दें।

कीटों की रोकथाम
  • सफेद लट, बिहार रोमिल इल्ली, मूंगफली का माहू व दीमक प्रमुख है। सफेद लट की समस्या वाले क्षेत्रों में बुवाई के पूर्व कार्बोफ्यूरान 3 जी 20-25 कि.ग्रा/हेक्टेयर की दर से खेत में डालें।
  • दीमक के प्रकोप को रोकने के लिये क्लोरोपायरीफॉस दवा की 3 लीटर मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
  • रस चूसक कीटों (माहू, थ्रिप्स व सफेद मक्खी) के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मि.ली./प्रति लीटर या डायमिथोएट 30 ई.सी. का 2 मि.ली./ ली. के मान से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रयोग करें।
  • पत्ती सुरंगक कीट के नियंत्रण हेतु क्विनालफॉस 25 ई.सी. का 1 लीटर/ हेक्टेयर का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडक़ाव करें।
रोग

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बीज सडऩ- कुछ रोग उत्पन्न करने वाले कवक जब बीज उगने लगता है उस समय इस पर आक्रमण करते हैं। इससे बीज पत्रों, बीज पत्राधरों एवं तनों पर गोल हल्के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। बाद में ये धब्बे मुलायम हो जाते हैं तथा पौधे सडऩे लगते हैं और फिर सडक़र गिर जाते हैं। फलस्वरूप खेत में पौधों की संख्या बहुत कम हो जाती है और जगह-जगह खेत खाली हो जाता है। खेत में पौधों की भरपूर संख्या के लिए सामान्य रूप से मूंगफली के प्रमाणित बीजों को बोना चाहिए। अपने बीजों को बोने से पहले 2.5 ग्राम थाइरम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर लें।

रोजेट- रोजेट (गुच्छ रोग) मूंगफली का एक विषाणु (वाइरस) जनित रोग है इसके प्रभाव से पौधे अति बौने रह जाते हैं साथ पत्तियों में ऊतकों का रंग पीला पडऩा प्रारम्भ हो जाता है। यह रोग सामान्य रूप से विषाणु फैलाने वाली माहो से फैलता है अत: इस रोग को फैलने से रोकने के लिए पौधों को जैसे ही खेत में दिखाई दें, उखाडक़र फेंक दें। इस रोग को फैलने से रोकने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 1 मि.ली. को 3 लीटर पानी में घोल कर छिडक़ाव कर दें।
टिक्का- यह इस फसल का बड़ा भयंकर रोग है। आरम्भ में पौधे के नीचे वाली पत्तियों के ऊपरी सतह पर गहरे भूरे रंग के छोटे-छोटे गोलाकार धब्बे दिखाई पड़ते हैं ये धब्बे बाद में ऊपर की पत्तियों तथा तनों पर भी फैल जाते हैं। संक्रमण की उग्र अवस्था में पत्तियाँ सूखकर झड़ जाती हैं तथा केवल तने ही शेष रह जाते हैं। इससे फसल की पैदावार काफी हद तक घट जाती है। यह बीमारी सर्कोस्पोरा परसोनेटा या सर्कोस्पोरा अरैडिकोला नामक कवक द्वारा उत्पन्न होती है। भूमि में जो रोगग्रसित पौधों के अवशेष रह जाते हैं उनसे यह अगले साल भी फैल जाती है इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 को 2 किलोग्राम एक हजार लीटर पानी में घोलकर/हे. की दर से दस दिनों के अन्तर पर दो-तीन छिडक़ाव करें।

रोग नियंत्रण

मूंगफली में प्रमुख रूप से टिक्का, कॉलर और तना गलन और रोजेट रोग का प्रकोप होता है। टिक्का के लक्षण दिखते ही इसकी रोकथाम के लिए डायथेन एम-45 का 2 ग्रा./लीटर पानी में घोल बनाकर छिडक़ाव करें। छिडक़ाव 10-12 दिन के अंतर पर पुन: करें। रोजेट वायरस जनित रोग हैं, इसके फैलाव को रोकने के लिए फसल पर इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मि.ली./लीटर पानी के मान से घोल बनाकर छिडक़ाव करें।

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