इस तरह करें बैंगन में कीट एवं व्याधि का नियंत्रण

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इस तरह करें बैंगन में कीट एवं व्याधि का नियंत्रण – बैंगन को आम लोगों की सब्जी कहा जाता है। पूरे साल व देश के लगभग सभी भागों में बहुतायत से उगाये जाने वाली फसल है। यह पोषकीय एवं औषधीय गुणों से भरपूर सब्जी है, जिसका उदर विकारों एवं दर्द आदि में चिकित्सकीय उपयोग है। यह एक अच्छी पैदावार व अधिक आमदनी देने वाली फसल है, परन्तु इसे कई रोग एवं कीड़े प्रभावित करते हैं, जिसके कारण फल बेचने की दृष्टि से अनुपयुक्त हो जाते है। अत: समय रहते इन्हें नियंत्रित कर अधिक उत्पादन व आय अर्जित कर सकते है।

तना एवं फल बेधक कीट

यह बैंगन का सबसे खतरनाक कीड़ा हैं, जो बहुत अधिक हानि पहुँचाता हैं। इसकी लटें कोमल टहनियों व तनों में छेद करके सुरंग बनाती हुयी अंदर घुस जाती हैं, जिससे ऊपर की टहनियाँ/कोपलें मुरझाकर लटक जाती हैं तथा पौधों की बढ़वार रूक जाती हैं। सुंडी फलों में छेद करके उन्हें कांणे कर देती हैं, जिससे उनका बाजार भाव नहीं मिल पाता है। वर्षा तथा बसंत ऋतु में इसका प्रकोप अधिक होता हैं, जिससे कभी-कभी पूरी फसल नष्ट हो जाती हैं।

नियंत्रण के उपाय-

  • ग्रसित शाखाओं/कोपलों तथा फलों के अंदर सूंडियां रहती है, जिनको तोड़कर नष्ट कर दें।
  • ट्राइकोग्रामा मित्र कीट के 50,000 अण्डे (2.5 ट्राइको कार्ड) प्रति हेक्टेयर 45 दिन की फसल से 6 बार एक सप्ताह के अंतराल पर खेत में छोड़ें।
  • खड़ी फसल में छिड़काव हेतु मैलाथियॉन 50 ई.सी. 2.5 मिली प्रति लीटर पानी में घोल कर 10-12 दिन के अंतराल पर छिड़कें।
  • अंगमारी एवं फल सडऩ रोग- पत्तियों पर धूसर या भूरे रंग के धब्बे तथा धब्बों के बीच का हिस्सा हल्के रंग का होना इसकी मुख्य पहचान हैं। फलों पर गड्ढेदार धब्बे बन जाते हैं तथा अंदर का भाग सड़ जाता है।

नियंत्रण के उपाय-

  • फसल चक्र अपनाएं तथा एक खेत में तीन साल से अधिक फसल नहीं लें।
  • फसल के पूर्व अवशेषों (ठूंठों) को एकत्र कर जला दें।
  • यदि खुद के बीज काम लेना हो तो स्वस्थ, रोगरहित तथा बिना दाग वाले फलों से ही बीज लेकर उगायें।
  • बीजों को कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें।
  • रोग दिखने पर 2.5 ग्राम डायफोलाटन या जाइनेब या ब्लाइटॉक्स- 50 या कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 10-12 दिन पर छिड़कें।
  • छोटी पत्ती रोग- रोगग्रस्त पत्तियों छोटी, चिकनी, मुलायम व पीली दिखाई देती हैं तथा पूरा पौधा झाड़ीनुमा पीलापन लिए दिखाई देता है।

नियंत्रण के उपाय-

  • रेागी पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें, खुले में न फेंकें।
  • नर्सरी में पौधों को रोगग्रसित होने से बचाने हेतु 40 मैश या इससे छोटे छिद्र वाली एग्रोनेट जाली से ढक कर रखें।
  • मैलाथियॉन (फल आने पर) 1.5 से 2.0 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • टेट्रासाइक्लिन या क्लोरोम्फेनिकॉल 100 पी.पी.एम. (एक ग्राम दवा 10 लीटर पानी में) घोल कर छिड़कें।
  • रोगरोधी किस्में जैसे- पंत रितुराज, अर्काशील, एस-16, ए.बी.-2 आदि को अपनायें।

कीटनाशियों की छिड़काव करते समय सावधानियां-

  • छिड़काव सांयकाल के समय करें क्योंकि इस समय मधुमक्खियों तथा अन्य पर परागण करने वाले कीटों की संख्या फसल पर कम होती है।
  • साग-सब्जी के लिए डण्टल एवं टहनियों कीटनाशियों के छिड़काव करने से पहले तोड़ें।
  • कीटनाशियों के छिड़काव के बाद सात दिन तक इंतजार करें, इस बीच डंटल साग-सब्जी के लिए न तोड़ें। इसके बाद फल को 3-4 बार साफ पानी से अच्छी तरह धोकर ही साग-सब्जी के लिए इस्तेमाल करें। ऐसा करने से जहरीले अवशेषों की मात्रा कम हो जाती है।
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