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मानव स्वास्थ्य एवं किसान के लिए वरदान

  • गरिमा राय
    भारतीय समन्वित औषधि संस्थान, जम्मू
  • ज्ञानेंद्र कुमार राय
    जैवप्रौद्यौगिकी स्कूल, शेर-ए-कश्मीर कृषि एवं प्रौद्यौगिकी विश्वविद्यालय, जम्मू
  • रंजीत रंजन कुमार
    जैव रसायन संभाग, भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली

 

20 सितम्बर 2021, जैविक खेती – संसार की बढ़ती हुई जनसंख्या एक विकट समस्या बनती जा रही है, आज की बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन की आपूर्ति के लिए अत्यधिक खाद्य उत्पादन की होड़ में अनेक तरह-तरह की रसायनिक खादों, हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक परिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है, परिणामस्वरूप भूमि की उर्वराशक्ति खराब हो रही है, साथ ही साथ वातावरण प्रदूषित हो रहा है जिसका सीधा असर मनुष्य के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।

आदिकाल से प्राकृतिक वातावरण अनुरूप तथा मानव स्वास्थ्य के अनुकूल खेती की जाती थी, जिससे परिस्थितिकी तंत्र प्रभावित नहीं होता था तथा जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच संतुलन बना रहता था, जिससे भूमिगत जल, मृदा, वायु तथा वातावरण भी प्रदूषित नहीं होता था। भारत वर्ष में प्राचीनकाल से समन्वित कृषि की जाती थी जिसमे पशुपालन, बागवानी, कुक्कुट पालन, मछली पालन साथ-साथ किया जाता था। परन्तु आज कृषि के बदलते परिवेश में समन्वित कृषि धीरे-धीरे कम हो गया, गोबर की खाद की कमी होने लगी तथा अधिक कृषि उत्पादन हेतु तरह-तरह की रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग हो धड़ल्ले से हो रहा है जिसके परिणामस्वरुप जैविक और अजैविक पदार्थों के का संतुलन बिगड़ रहा है, और वातावरण प्रदूषित कर रहा है, जो सीधे मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।

जैविक खेती में फसल चक्र, हरी खाद, जैविक खाद और जैविक कीट नियंत्रण जैसी तकनीकों पर निर्भर करती है। शासकीय परिभाषा के अनुसार, जैविक खेती उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग करती है (जिसमें शाकनाशी, कीटनाशक और कवकनाशी शामिल हैं) जिन्हे प्राकृतिक माना जाता है (जैसे कि जानवरों से हड्डी का भोजन या फूलों से पाइरेथ्रिन), लेकिन यह विभिन्न के उपयोग को बाहर या सख्ती से सीमित करता है। विधियों (सिंथेटिक पेट्रोकेमिकल उर्वरकों और कीटनाशकों सहित; पौधों के विकास नियामकों जैसे हार्मोन, पशुधन में एंटीबायोटिक का उपयोग, आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव, मानव सीवेज कीचड़, और नैनोमैटेरियल्स। जैविक कृषि विधियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विनियमित किया जाता है और कई देशों द्वारा कानूनी रूप से लागू किया जाता है, जो कि 1972 में स्थापित जैविक कृषि संगठनों के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय छाता संगठन, इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट्स द्वारा निर्धारित मानकों पर आधारित है। अप्रैल 1995 तक यूएसडीए की परिभाषा है- जैविक कृषि एक पारिस्थितिकी उत्पादन प्रबंधन प्रणाली है जो जैव विविधता, जैविक चक्र और मिट्टी की जैविक गतिविधि को बढ़ावा देती है और बढ़ाती है। यह ऑफ-फार्म इनपुट के न्यूनतम उपयोग और प्रबंधन प्रथाओं पर आधारित है जो पारिस्थितिकी सद्भाव को बहाल, बनाए रखने और बढ़ाने के लिए है। 1990 के बाद से जैविक खाद्य और अन्य उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ा है, 2012 में दुनिया भर में $63 बिलियन तक पहुंच गया है। 25 इस मांग ने व्यवस्थित रूप से प्रबंधित कृषि भूमि में एक समान वृद्धि को प्रेरित किया है जो 2001-2011 में एक चक्रवृद्धि दर से बढ़ी है। 8.9 प्रतिशत प्रति वर्ष।

जैविक खेती के घटक

हरी पत्ती की खाद – खाद के रूप में प्रयुक्त होने वाली हरी अपघटित सामग्री हरी खाद कहलाती है। इसे दो तरह से प्राप्त किया जाता है-हरी खाद की फसल उगाने से या बंजर भूमि, खेत की मेड़ और जंगल में उगाए गए पौधों से हरी पत्ती (टहनियों के साथ) को इक_ा करके।

फसल चक्र- फसल चक्र एक ही क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की फसलों की एक श्रृंखला को बढ़ते मौसम के क्रम में उगाने की प्रथा है। यह पोषक तत्वों के एक सेट, कीट और खरपतवार के दबाव और प्रतिरोधी कीट और खरपतवार के विकास की संभावना को कम करता है। एक ही फसल को एक ही स्थान पर कई वर्षों तक लगातार उगाना, जिसे मोनोक्रॉपिंग के रूप में जाना जाता है, धीरे-धीरे कुछ पोषक तत्वों की मिट्टी को समाप्त कर देता है और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी कीट और खरपतवार समुदाय का चयन करता है।
जैविक प्रबंधन -जैविक नियंत्रण अन्य उपयोगी जीवों, जैसे हानिकारक जानवरों, रोगजनकों और पौधों के प्रभावों को प्रतिबंधित करने की एक विधि है। सूक्ष्मजीव, कीड़े और पौधे जो हानिकारक जीवों को रोकते हैं।

पशुपालन– पशुपालन विज्ञान की वह शाखा है जो लाभ के लिए मनुष्यों द्वारा पशु, कुत्ते, भेड़ और घोड़ों जैसे कृषि पशुओं के प्रजनन, खेती और देखभाल के अभ्यास से संबंधित है। पशुपालन से तात्पर्य पशुधन पालन और चयनात्मक प्रजनन से है। यह कृषि की एक शाखा है।

कृमि खाद- वर्मीकम्पोस्ट (वर्मी-कम्पोस्ट) विभिन्न प्रकार के कृमियों, आमतौर पर लाल विग्लर्स, सफेद कीड़े, और अन्य केंचुओं का उपयोग करके अपघटन प्रक्रिया का उत्पाद है, जो सब्जी या खाद्य अपशिष्ट, बिस्तर सामग्री और वर्मीकास्ट को विघटित करने का मिश्रण बनाता है। इस प्रक्रिया को वर्मीकम्पोस्टिंग कहा जाता है, जबकि इस उद्देश्य के लिए कृमियों के पालन को वर्मीकल्चर कहा जाता है।

जैविक खेती का तुलनात्मक अध्य्यन

शोध अध्ययन में यह पाया गया की मिर्च की जैविक खेती करने से उसके गुणवत्ता जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स क्लोरोफिल में रसायनिक खेती के तुलना में ज्यादा मात्रा में पायी गयी है। जैविक आलू में शुष्क पदार्थ की मात्रा 17 प्रतिशत तक पायी गयी है, उच्च शुष्क पदार्थ के आलू की औद्यौगिक मांग ज्यादा होती है। एक शोध अध्ययन में फार्म यार्ड मैनुअर का 1000 क्ंिवटल प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करने पर धन की हुल्लिंग एवं मिलिंग प्रतिसत बाद जाता है। गुणवत्ता जैसे प्रोटीन और अमयलोज की भी मात्रा चावल में बाद जाती है। जैविक खेती से उत्पादन थोड़ा काम या बराबर होता है लेकिन सब्जी, अन्न व फल में मिनरल एवं अन्य पोषक तत्वों की वृद्धि हो जाती है। शोध अध्य्यन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव स्वत: एवं प्राकृतिक संतुलन हेतु जैविक खेती नितांत आवश्यक है। क्षेत्र परीक्षण से यह सिद्ध हो चुका है कि जैविक खेती पद्धति, रसायनिक कृषि की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात् जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णत: सहायक है। असिंचित क्षेत्रों में जैविक खेती और भी अधिक लाभदायक है क्योंकि मृदा जलधारण क्षमता बाद जाती है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम जाती ही है इसके साथ ही कृषक को आय अधिक प्राप्त होती है तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक मांग है। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। विश्व की बढ़ती हुई जनसंख्या, पर्यावरणीय प्रदूषण रोकने, मृदा की उर्वराशक्ति का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की अत्यन्त लाभदायक है।

 

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