मिर्च में पीली माईट का प्रबंधन
लेखक: डॉ. अभिषेक शुक्ला, डॉ. डी.एम. ड़ामसीया तथा हरेश काछेला, कीट विज्ञान विभाग, कृषि महाविधालय, नवसारी कृषि विश्वविधालय, वघई-394 730, गुजरात
25 जून 2026, नई दिल्ली: मिर्च में पीली माईट का प्रबंधन – मिर्च (केप्सीकम एनम लिनियस) हमारे यहाँ पर उगाये जाने वाली एक महत्वपूर्ण नकदी मसाला फसल है। मसाला के तौर पर इसका व्यापक तौर पर प्रयोग होता है, साथ ही साथ सब्जी के तौर पर भी इसका व्यापक पैमाने पर भी इसका प्रयोग किया जाता है। विश्व में मिर्च की खेती लगभग 0.17 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में होती है, जिससे 0.71 मिलियन टन उत्पादन होता है। भारतीय परिपेक्ष में मिर्च की खेती 8.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में करी जाती है जिससे लगभग 18.72 लाख टन सूखी मिर्च का उत्पादन होता है।
हमारे देश में मिर्च एक महत्वपूर्ण नकदी मसाला फसल है जिसकी खेती सिंचित तथा असिंचित कृषि क्षेत्रों में बड़े ही व्यापक पैमाने पर करी ज़ाती है। भारत में मिर्च की खेती आंध्रप्रदेश, ओड़ीशा, महाराष्ट्र, बंगाल , कर्नाटक, राजस्थान तथा तमिलनाडु राज्यों में होती है। वैश्विक स्तर पर भारत मिर्च का सबसे बड़ा उत्पादक राष्ट्र है तथा संपूर्ण विश्व का 25 प्रतिशत मिर्च उत्पादन भारत में ही होता है।
हमारे देश से लगभग 1,00,000 टन मिर्च का अमेरिका, श्रीलंका, बांग्लादेश, कनाडा और सिंगापुर आदि देशों में विविध रूपों जैसे ताजा मिर्च, मिर्च पाउड़र, तथा ओलियोरेजिन के रूप में निर्यात किया जाता है। मिर्च के निर्यात से लगभग 366.80 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा का अर्जन भी होता है। मिर्च की फसल पर 51 से भी अधिक नाशीजीवों का प्रकोप देखा गया है। इनमें पत्तियां खाने वाले कीट, फलों को खाने वाले कीट तथा रस चूसने वाले कीट प्रमुख हैं। इन रस चूसने वाले नाशीजीवों में पीली माईट (पोलीफेगोटार्सोंनेमस लेटस), थ्रिप्स (सिर्टोंथ्रिप्स डोर्सोंलिस), एफ़िड (एफिस गोसीपी) आदि का स्थान प्रमुख है। ये नाशीजीव मिर्च की सभी अवस्थाओं में फसल को भारी मात्रा में नुकसान पहूंचाते है। रस चूसने वाले इन नाशीजीवों में पीली माईट (पोलीफेगोटार्सोंनेमस लेटस) का प्रमुख स्थान है।
ये माईट टार्सोंनेमिडी कुल से संबंधित है तथा इसे पीली-मकड़ी, ट्रोपिकल माईट या ब्रॉड माईट के नाम से सारी दुनिया में जाना जाता है। ये माईट मिर्च की एक प्रमुख नाशीजीव है जो कि प्राय: सभी स्थानों पर मिर्च कि फसल को ग्रसित करके, फसल को भारी मात्रा में नुकसान पहुंचाती है। इस माईट के द्वारा रस चूसने से मिर्च में शीर्षभाग लम्बी हो जाती है जिससे वो चूहों कि पुंछ (रेट-टेल) के समान हो जाती है, इसके बाद पत्तियां टेढ़ी-मेढ़ी हो कर विकृत हो जाती है। यदि मिर्च कि फसल में इस माईट का प्रकोप पुष्पन से फल उत्पादन कि अवस्था के बीच में हो तो मिर्च कि फसल का उत्पादन काफी कम हो जाता है तथा एक या दो बार ही फलों कि तुड़ाई संभव हो पाती है तथा लगभग 75 से 80 प्रतिशत तक उपज में कमी आ ज़ाती है। मिर्च में पीली माईट का बहुत अधिक प्रकोप होने कि दशा में पौधों कि बढ़वार पूर्ण रूप से रुक जाती है तथा पौधों कि असमय मृत्यु हो जाती है जिसके कारण संपूर्ण फसल तथा उपज चोपट हो जाती है। मिर्च के अतिरिक्त ये माईट विश्व भर के 104 से भी कृषि तथा अन्य जंगली पौधों को ग्रसित करती हुई देखी गयी है।
पीली माईट का वितरण संपूर्ण विश्व के मिर्च उत्पादक देशों में देखने को मिलता है। इसकी प्रमुख उपस्थिति भारत, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका जैसे देशों में दर्ज़ करी गई है। हमारे देश भारत में इस माईट का प्रकोप प्राय: सभी मिर्च उत्पादक राज्यों जैसे आंध्रप्रदेश, ओड़ीशा, महाराष्ट्र, बंगाल , कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात तथा तमिलनाडु में देखी गयी है।
इस माईट का जीवन चक्र अंडा, लार्वा, निम्फ़ तथा वयस्क अवस्थाओं से पूर्ण होता है। पीली माईट अपने सफ़ेद, पारदर्शी, चमकीले अंडे मिर्च की शीर्ष पत्तियों, नई कोपलों, कोमल तनों, छोटे फलों तथा कई बार फूलों पर भी देती है। इस माईट के अंडों पर 6 कतारों वाले उभरे धब्बे (ट्यूबरीकल्स) स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते है तथा इन धब्बों की 7 लाईन प्रत्येक अंडे पर देखी जा सकती है। पीली माईट अधिकतर मध्यशिरा तथा कोमल पत्तियों के नजदीक ही अंडे देती है। मादा माईट प्रति दिन लगभग 6 अंडे देती है। इन अंडों से 24 से 72 घंटों में लार्वा बाहर निकाल आता है। अंडों से निकला लार्वा सुस्त व धीमा होता है तथा ये लार्वा अवस्था 1 से 2 दिनों तक की होती है, पूर्ण विकसित लार्वा कुछ समय निष्क्रिय होकर शांत हो जाती है तथा इसे आराम अवस्था के नाम से जाना जाता है। ये अवस्था कुछ घंटों (2 से 3 घंटों) की होती है तथा इसमे से निम्फ़ बाहर निकलता है।
निम्फ़ अवस्था 2 से 3 दिनों तक की होती है, पूर्ण विकसित निम्फ़ कुछ समय निष्क्रिय होकर शांत हो जाती है तथा इसे निमफ़ोक्रिसायलीस अवस्था के नाम से जाना जाता है जहाँ ये कुछ समय तक आराम अवस्था में रहता है तथा फिर इनसे वयस्क पीली माईट बाहर निकाल आती है। वयस्क मादा माईट अंडाकार होती है जबकि वयस्क नर का उदर भाग कुछ तीखा होता है। नर माईट का आकार मादा की तुलना में छोटा होता है तथा वे बहुत सक्रिय होते है। नर तथा मादा 3 से 4 और 4 से 8 दिनों जीवित रहते है। मादा माईट प्राय: लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों ही प्रकार से प्रजनन करती है। लैंगिक प्रजनन में नर तथा मादा दौनों ही पैदा होते है जबकि अलैंगिक प्रजनन से केवल नर माईट ही पैदा होती है।
पीली माईट का प्रकोप मिर्च की शीर्ष अथवा ऊपरी कोमल पत्तियों पर शुरू होता है, इसके बाद पत्तियां टेढ़ी-मेढ़ी होने लगती है तथा बाद में विकृत हो जाती है, ये सामान्य पत्तियों की तुलना में आकार में छोटी हो जाती है। नई निकलने वाली पत्तियां भी इस माईट से पुन: ग्रसित हो जाती है तथा पौधों का आकार भी छोटा रह जाता है। यदि पुष्पन के समय पर इस माईट का प्रकोप होता है तो पौधों से फूल असमय ही गिर जाते है जिससे उपज पर प्रतिकूल असर पड़ता है। माईट ग्रस्त मिर्च के पौधे आकार में छोटे तथा कमज़ोर दिखाई देते है।
इस माईट के प्रकोप से उपज में 20 से 50 प्रतिशत तक का नुकसान होता है। जब पीली माईट तथा मिर्च के थ्रिप्स का प्रकोप एक साथ होता है तो इन दौनों से मिले जुले प्रकोप के कारण उपज में 50 प्रतिशत से भी अधिक का नुकसान होता है, जिससे मिर्च उत्पादकों को भारी आर्थिक नुकसान होता है। जब पीली माईट का प्रकोप बहुत अधिक होता है तब उपज में 96 प्रतिशत तक का नुकसान होता देखा गया है।
प्रबंधन उपाय:
- इस माईट का प्रकोप प्राय: छायादार तथा खराब जल निकास वाले स्थानों पर बहुधा अधिक होता है अत: मिर्च की खेती ऐसे खेतों में करनी चाहिए जहाँ पर जल निकासी का उचित प्रबंधन होना चाहिए।
- पीली माईट के प्रकोप को कम करने के लिए प्रतिरोधक किस्म जैसे गुंटूर टाईप को उगाना चाहिए।
- मिर्च की फसल में समन्वित पोषक तत्वों का उचित प्रबंधन तथा उचित सिचाई जल प्रबंधन का उपाय करना चाहिए।
- मिर्च के खेतों में परभक्षी माईट, एम्बलीसियसओवेलिस काफी सक्रिय होती है तथा पीली माईट का भक्षण करके उसकी संख्या को कम करने में मदद करती है अत: इसकी सही पहचान करके इस परभक्षी माईट का संरक्षण तथा संवर्धन करना चाहिए।
- पीली माईट के जैविक नियंत्रण हेतु माईटभक्षी फफूंदी, हिर्सुटेला थोम्प्सेनी का प्रयोग करना चाहिए।
- मिर्च में पीली माईट का बहुत अधिक प्रकोप होने की दशा में स्पायरोमेसीफेन 240 एससी @ 100 सक्रिय तत्व/हेक्टेयर का छिड़काव करना चाहिए।
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